भारत में जिस कचरे को अब तक समस्या माना जाता रहा है, वही आने वाले वर्षों में देश की ऊर्जा जरूरत पूरी करने में काम आ सकता है। गोबर, पराली और शहरों के गीले कचरे से गैस बनेगी और इस गैस का इस्तेमाल CNG की तरह किया जा सकेगा केंद्र सरकार ने हाल ही में ₹23,731 करोड़ के बजट आवंटन के साथ ‘नेशनल सर्कुलर बायोएनर्जी स्कीम’ यानी GOBARdhan Scheme (Galvanising Organic Bio-Agro Resources Dhan) को मंजूरी दी है। यह योजना वित्त वर्ष 2026-27 से 2035-36 तक यानी 10 सालों के लिए लागू की जाएगी। इंडियन बायोगैस एसोसिएशन (IBA) का दावा है कि यह केवल एक सरकारी खर्च नहीं, बल्कि रणनीतिक राष्ट्रीय निवेश है जो भारत के विदेशी मुद्रा भंडार को बचाएगा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को रफ्तार देगा। आइए जानते हैं कि यह योजना भारत का विदेशी मुद्रा बिल कैसे घटाएगी और कैसे कचरे व पराली से पैसा बनाएगी।
देश का गैस आयात बिल 5 $ बिलियन कैसे कम होगा?
भारत फिलहाल अपनी प्राकृतिक गैस (Natural Gas / LNG) की कुल जरूरतों का लगभग 50% हिस्सा विदेशों से आयात करता है। वित्त वर्ष 2024-25 में ही भारत का एलएनजी (LNG) इंपोर्ट बिल $15.2 बिलियन (करीब ₹1.28 लाख करोड़) था। वेस्ट एशिया संकट और डॉलर के मुकाबले रुपये की गिरावट के कारण यह बोझ और बढ़ गया है। IBA के अनुसार, इस योजना के तहत आने वाले वर्षों में कम से कम 1,500 चालू कंप्रेस्ड बायो-गैस (CBG) प्लांट तैयार होंगे। घरेलू स्तर पर CBG का उत्पादन बढ़ने से प्राकृतिक गैस के आयात में कम से कम एक-तिहाई (33%) की कमी आएगी। इससे करीब $5 Billion की बचत होगी। यही नहीं इसके साथ साथ CBG प्लांट से बायोगैस के साथ-साथ उच्च गुणवत्ता वाला प्राकृतिक खाद भी बनती है। इसके इस्तेमाल से महंगे रसायनों और आयातित फास्फेटिक/पोटाशिक उर्वरकों पर निर्भरता घटेगी, जिससे उर्वरक आयात बिल में कम से कम $1 Billion की और कमी आएगी।
CBG क्या है ?
जब जैविक चीजों को ऑक्सीजन की गैर-मौजूदगी में सड़ाया जाता है। तो इस प्रक्रिया से Biogas बनती है। इसके बाद गैस से अशुद्धियां और CO₂ हटाई जाती हैं और इसे दबाव के साथ Compress किया जाता है। यही Compressed Bio-Gas यानी CBG है। इसकी खास बात यह है कि इसका इस्तेमाल कई जगह CNG की तरह किया जा सकता है यानि इसे गाड़ियों में ईंधन के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। अभी तक जिस गैस के लिए अभी हम प्राकृतिक गैस पर निर्भर हैं, उसका एक हिस्सा देश के अपने कचरे से तैयार किया जा सकता है।
भारत के पास इसका कितना बड़ा ‘रॉ मटीरियल’ उपलब्ध है?
एनर्जी अल्टरनेटिव्स इंडिया (EAI) के रिसर्च के अनुसार, भारत बायो-वेस्ट के मामले में दुनिया के सबसे समृद्ध देशों में से एक है। देश में करीब 73 करोड़ टन से ज्यादा कृषि अवशेष पैदा होता है । वहीं देश में करीब 15 करोड़ से ज्यादा मवेशी हैं । इसके अलावा शहर में करीब हर साल 6 -6.5 करोड़ टन शहरी गीला कचरा होता है ।
CBG Blending Mandate क्या है और निवेशकों को इससे क्या फायदा होगा?
सरकार ने देश में CBG की खपत बढ़ाने के लिए चरणबद्ध Blending Mandate तय किया है। इसका मतलब है कि ऑटोमोटिव CNG और पाइप्ड नेचुरल गैस (PNG) में CBG मिलाना अनिवार्य होगा।वित्त वर्ष अनिवार्य CBG ब्लेंडिंग
FY 2025-26 1%
FY 2026-27 3%
FY 2027-28 4%
FY 2028-29 5%निवेशकों को क्यों आकर्षित कर रही है CBG?
सरकारी कंपनिया जैसे IOCL, BPCL और HPCL नियमित तौर पर कम्प्रेस्ड बायोनैचुरल गैस (CBG) खरीदेगी। जिससे प्रोजेक्ट लगाने वालों को निश्चित दाम और निश्चित ग्राहक मिलेंगे। इसमे कुछ राज्य सरकारों ने इंसेंटिव देना भी शुरु किया है जैसे महाराष्ट्र जैसे राज्यों ने ₹500 करोड़ की अलग CBG पॉलिसी लागू की है, जिससे सेटअप कॉस्ट कम होती है। वहीं विदेशों की तुलना में भारत में प्लांट लगाने और लेबर का खर्च काफी कम है। देश की सबसे बड़ी कार निर्माता कंपनी मारुति सुज़ुकी इंडिया ने भी हाल ही में चार कंप्रेस्ड बायोगैस (CBG) निर्माण परियोजनाएँ शुरू करने पहले चरण में 561 करोड़ रुपये के निवेश को मंजूरी दी गई है।
किसान के लिए क्या बदलेगा ?
गोबरधन योजना केवल ऊर्जा सुरक्षा नहीं, बल्कि ग्रामीण समृद्धि का बड़ा जरिया है। न केवल इससे किसानो और पशुपालकों की अतिरिक्त आय भी होगी। जैसे किसानों के लिए पहले पराली और अन्य कृषि अपशिष्ट जो पहले अनुपयोगी था, अब बिकेगा।
केमिकल फर्टिलाइजर की जगह स्लरी और जैविक खाद (FOM) के उपयोग से जमीन की उर्वरक क्षमता बढ़ेगी।
पर्यावरण को क्या फायदा होगा ?
पराली जलाने (Stubble Burning) की समस्या कम होगी, जिससे दिल्ली-NCR समेत पूरे उत्तर भारत को सर्दियों में जहरीले धुएं से राहत मिलेगी।1,500 से अधिक प्लांट्स के निर्माण, कचरा कलेक्शन, सप्लाई चेन और प्लांट ऑपरेशन में लाखों स्किल्ड व सेमी-स्किल्ड नौकरियां पैदा होंगी।
क्या सिर्फ 1,500 प्लांट लगाने से लक्ष्य हासिल हो जाएगा ?
यहीं इस पूरी योजना की सबसे बड़ी चुनौती है।दरअसल CBG प्लांट लगाना पहला कदम है। उसे लगातार चलाने के लिए हर दिन पर्याप्त मात्रा में गोबर, पराली और गीला कचरा चाहिए। इसके लिए गांवों और शहरों से कचरा इकट्ठा करने, उसे अलग करने और प्लांट तक पहुंचाने का मजबूत नेटवर्क जरूरी होगा। इसके अलावा प्लांट की लागत, जमीन, कर्ज, गैस की कीमत और तैयार CBG की बाजार मांग भी अहम होगी।
कैसे होगी GOBARdhan Scheme सफल ?
इसलिए GOBARdhan Scheme की सफलता सिर्फ ₹23,731 करोड़ के सरकारी निवेश से तय नहीं होगी। असली परीक्षा यह होगी कि कचरे से बनने वाली गैस कितनी सस्ती और लगातार उपलब्ध होती है और कितने CBG प्लांट लंबे समय तक व्यावसायिक रूप से सफल रहते हैं।
अगर यह मॉडल बड़े स्तर पर सफल होता है तो भारत को एक साथ कई फायदे मिल सकते हैं। गैस आयात पर खर्च होने वाली विदेशी मुद्रा घट सकती है, किसानों को कृषि अवशेष से अतिरिक्त कमाई मिल सकती है, ग्रामीण इलाकों में रोजगार बढ़ सकता है और पराली व गीले कचरे की समस्या कम हो सकती है। यानी आने वाले वर्षों में कचरा सिर्फ कचरा नहीं रहेगा, बल्कि ऊर्जा और कमाई का संसाधन बन सकता है।






























