अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कुछ दिन पहले को Truth Social पर चांद की तस्वीर के साथ लिखा—“The Moon Is Ours”। तस्वीर में चांद की सतह, पीछे पृथ्वी और अमेरिकी झंडा दिखाई दे रहा था। बयान ने तुरंत यह सवाल खड़ा कर दिया कि क्या अमेरिका सचमुच चांद पर अपना दावा कर सकता है? जवाब है—नहीं। कम से कम मौजूदा अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष कानून के तहत कोई देश चांद को अपनी संप्रभु जमीन घोषित नहीं कर सकता।
लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती। असली पेच इससे कहीं ज्यादा दिलचस्प है—अगर चांद किसी देश का नहीं है, तो वहां मौजूद पानी, बर्फ, खनिज और दूसरी प्राकृतिक संपदाओं का क्या होगा? क्या कोई देश या निजी कंपनी उन्हें निकालकर इस्तेमाल कर सकती है? यहीं से अंतरिक्ष कानून की सबसे बड़ी बहस शुरू होती है।
चांद पर झंडा लगाने से जमीन आपकी नहीं होती
1967 का Outer Space Treaty अंतरिक्ष के लिए सबसे महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय कानूनी ढांचे में से एक है। इसके Article II में साफ कहा गया है कि बाहरी अंतरिक्ष, चांद और दूसरे celestial bodies पर किसी देश की संप्रभुता, कब्जे या किसी दूसरे तरीके से राष्ट्रीय स्वामित्व का दावा नहीं किया जा सकता। यानी कोई देश चांद पर उतरकर अपना झंडा लगा दे, वहां बेस बना दे या किसी इलाके में लंबे समय तक काम करे—इससे वह इलाका उसका राष्ट्रीय क्षेत्र नहीं बन जाता।
Article I भी उतना ही महत्वपूर्ण है। इसके मुताबिक चांद समेत अंतरिक्ष की खोज और इस्तेमाल सभी देशों के हित में होना चाहिए और सभी देशों को समान आधार पर इसके इस्तेमाल और खोज की स्वतंत्रता होनी चाहिए।
यानी कुल मिलाकर अंतरराष्ट्रीय कानून की मौजूदा बुनियादी व्यवस्था में Moon को किसी देश का ‘नया राज्य’ या ‘नया क्षेत्र’ बनाने की गुंजाइश नहीं है। पर मौजूदा ट्रंप अमेरिका किस समझौते को मानेगा ये कहना भी मुश्किल है।
फिर अमेरिका चांद पर इतना जोर क्यों दे रहा है?
क्योंकि आने वाले दशकों में चांद सिर्फ वैज्ञानिक अनुसंधान की जगह नहीं रह सकता। वहां मौजूद संसाधन भविष्य की अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था के लिए बेहद महत्वपूर्ण हो सकते हैं। सबसे ज्यादा चर्चा Water Ice यानी पानी की बर्फ की होती है। चांद के ध्रुवीय इलाकों के कुछ स्थायी रूप से छाया वाले क्षेत्रों में पानी की बर्फ मौजूद होने के संकेत मिले हैं। भविष्य में इसे पीने के पानी, ऑक्सीजन और हाइड्रोजन आधारित रॉकेट ईंधन में बदला जा सकता है।
इसका मतलब यह हुआ कि चांद पर पानी सिर्फ पानी नहीं रहेगा बल्कि वह भविष्य के लूनार बेस और मार्स मिशन के लिए ईंधन और जीवन-समर्थन संसाधन बन सकता है।
इसके अलावा चांद की मिट्टी में मौजूद खनिज और धातुएं भविष्य के निर्माण और अंतरिक्ष ढांचे में उपयोगी हो सकती हैं। हालांकिललेकिन यहां एक जरूरी बात है कि बड़े पैमाने पर चांद की खनन अर्थव्यवस्था अभी तकनीकी और आर्थिक रूप से साबित नहीं हुई है।
अमेरिका ने 2015 में ही अलग रास्ता खोल दिया था
अमेरिका ने 2015 में Commercial Space Launch Competitiveness Act के जरिए अपने नागरिकों और कंपनियों को अंतरिक्ष संसाधनों को commercially recover और use करने का अधिकार देने वाला कानूनी ढांचा बनाया। अमेरिकी कानून का तर्क यह है कि आप चांद की जमीन के मालिक नहीं बन सकते, लेकिन वहां से निकाले गए संसाधन का इस्तेमाल कर सकते हैं। यानी चांद की जमीन और चांद से निकाली गई सामग्री को कानूनी रूप से अलग-अलग देखा जा सकता है। यही अंतर भविष्य में सबसे बड़ी कानूनी बहस का आधार बन सकता है।
NASA का Artemis कार्यक्रम इसी भविष्य की तैयारी है
NASA का Artemis Programme सिर्फ इंसानों को दोबारा चांद पर उतारने की योजना नहीं है। इसमें भविष्य में चंद्र संसाधनों के इस्तेमाल की संभावनाएं भी शामिल हैं।
2020 में NASA ने Commercial Lunar Payload Services जैसे कार्यक्रमों के जरिए निजी कंपनियों को चंद्र सतह से सामग्री इकट्ठा करने के काम में शामिल किया। लक्ष्य यह समझना है कि चांद के संसाधनों का इस्तेमाल भविष्य के मिशनों के लिए कैसे किया जा सकता है।
इसी व्यापक रणनीति के लिए अमेरिका ने Artemis Accords बनाया। यह Outer Space Treaty की जगह लेने वाली संधि नहीं है, बल्कि उसके सिद्धांतों के साथ काम करने वाला एक अंतरराष्ट्रीय ढांचा है। इसमें सुरक्षित, शांतिपूर्ण और पारदर्शी अंतरिक्ष गतिविधियों तथा अलग-अलग मिशनों के बीच coordination पर जोर दिया गया है। 31 अगस्त 2026 को Türkiye इसके 71वें signatory के रूप में शामिल हुआ था। इसके बाद NASA के मुताबिक 14 सितंबर को Djibouti के शामिल होने से संख्या 72 हो गई।
‘Safety Zone’ क्या चांद पर कब्जे का नया तरीका है?
यहीं एक और दिलचस्प सवाल पैदा होता है।
Artemis Accords में Safety Zones की अवधारणा है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि एक देश या कंपनी की गतिविधि दूसरे मिशन में खतरनाक हस्तक्षेप न करे। मसलन, अगर कोई कंपनी चांद की सतह पर खनन कर रही है, तो दूसरी कंपनी उसके बेहद करीब जाकर उसी क्षेत्र में गतिविधि शुरू न कर दे।
Artemis framework का आधिकारिक उद्देश्य इसे सुरक्षा और coordination के तौर पर देखना है, न कि territorial ownership के रूप में। लेकिन जैसे-जैसे चांद पर गतिविधियां बढ़ेंगी, Safety Zone और वास्तविक नियंत्रण के बीच की सीमा अंतरराष्ट्रीय कानून की बड़ी बहस बन सकती है।
Moon Agreement ने संसाधनों पर और सख्त रुख अपनाया
1979 का Moon Agreement इस मामले में Outer Space Treaty से आगे जाता है। इसमें चांद और उसके प्राकृतिक संसाधनों को “common heritage of mankind” माना गया है और चांद की सतह, subsurface तथा वहां मौजूद प्राकृतिक संसाधनों पर किसी राज्य या निजी संस्था के स्वामित्व को स्वीकार नहीं किया गया है। लेकिन समस्या यह है कि Moon Agreement को Outer Space Treaty जितना व्यापक समर्थन नहीं मिला। अमेरिका जैसे प्रमुख अंतरिक्ष शक्ति ने इसे स्वीकार नहीं किया है। यही कारण है कि आज lunar mining को लेकर दुनिया में एक पूरी तरह सर्वमान्य कानूनी व्यवस्था मौजूद नहीं है।
तो आखिर चांद से निकाली गई चीज किसकी होगी?
यही इस पूरी कहानी का सबसे बड़ा अनुतरित सवाल है । एक व्याख्या कहती है कि चांद की जमीन पर मालिकाना हक और वहां से निकाले गए संसाधन का मालिकाना हक अलग चीजें हैं। अगर कोई कंपनी किसी इलाके से पानी या खनिज निकालती है तो इससे जरूरी नहीं कि वह उस जमीन की मालिक बन जाए।
वहीं दूसरी व्याख्या यह चिंता उठाती है कि अगर शक्तिशाली देश और बड़ी कंपनियां चांद के सबसे मूल्यवान संसाधन वाले क्षेत्रों को पहले ही घेरने लगें, तो यह Outer Space Treaty की उस मूल भावना को कमजोर कर सकता है जिसमें अंतरिक्ष को सभी देशों के लिए खुला बताया गया है।
ट्रंप का ‘The Moon Is Ours’ कितना मायने रखता है?
कानूनी तौर पर इस एक सोशल मीडिया पोस्ट से अमेरिका को चांद पर कोई territorial अधिकार नहीं मिल जाता। Outer Space Treaty की Article II की भाषा इसके बिल्कुल उलट है। लेकिन राजनीतिक और रणनीतिक स्तर पर यह बयान उस बदलती दुनिया की तरफ जरूर इशारा करता है जहां चांद दोबारा अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा का केंद्र बन रहा है।
यानी ट्रंप का “The Moon Is Ours” कानूनी रूप से चांद को अमेरिका का नहीं बना सकता। लेकिन यह एक ऐसी बहस जरूर खोलता है, जिसका जवाब आने वाले वर्षों में अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष कानून, नई तकनीक और चांद पर उतरने वाली अगली पीढ़ी तय करेगी।


























