वंदे मातरम् को लेकर देश में चल रही बहस अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गई है। कर्नाटक संगीतकार टीएम कृष्णा ने 2026 में किए गए उस कानूनी बदलाव को चुनौती दी है, जिसके जरिए National Song यानी वंदे मातरम् को Prevention of Insults to National Honour Act, 1971 के तहत आपराधिक संरक्षण दिया गया है। याचिका में गृह मंत्रालय के उन निर्देशों को भी चुनौती दी गई है, जिनमें सरकारी और आधिकारिक कार्यक्रमों में वंदे मातरम् के पूरे छह अंतरों के गायन की व्यवस्था की गई है।
22 सितंबर 2026 को मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने केंद्र सरकार से जवाब मांगा। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने मौखिक तौर पर साफ संकेत दिया कि 1986 का ‘Bijoe Emmanuel’ फैसला अभी भी कानून है और धार्मिक कारणों से किसी व्यक्ति के वंदे मातरम् न गाने पर उसे आपराधिक परिणाम नहीं भुगतने चाहिए।
क्या वंदे मातरम् न गाने पर जेल होगी?
सिर्फ न गाने से ऐसा नहीं माना जा सकता। सुप्रीम कोर्ट की मौखिक टिप्पणी का महत्वपूर्ण हिस्सा यही है कि धार्मिक कारणों से किसी व्यक्ति के न गाने को अपने-आप आपराधिक कृत्य नहीं बनाया जाना चाहिए।
2026 के संशोधन में Prevention of Insults to National Honour Act की धारा 3 में National Song को भी शामिल किया गया है। इसके तहत किसी व्यक्ति द्वारा जानबूझकर National Anthem या National Song के गायन को रोकने या ऐसे गायन में लगी सभा में disturbance पैदा करने पर तीन साल तक की जेल, जुर्माना या दोनों का प्रावधान है।
यहां एक अहम अंतर है कि किसी कार्यक्रम में गायन को जानबूझकर बाधित करना और स्वयं गीत न गाना एक ही बात नहीं है। इसी अंतर पर आगे की कानूनी व्याख्या महत्वपूर्ण होगी। गृह मंत्रालय की आधिकारिक वेबसाइट पर 2026 के संशोधन कानून और National Flag, Emblem and Anthem से संबंधित आदेश उपलब्ध हैं।
‘Bijoe Emmanuel’ केस क्या है?
यह पूरा विवाद समझने के लिए 1986 का Bijoe Emmanuel v. State of Kerala फैसला सबसे महत्वपूर्ण है। इस मामले में Jehovah’s Witness समुदाय के तीन स्कूली बच्चों ने धार्मिक अंतरात्मा के आधार पर राष्ट्रगान नहीं गाया था, लेकिन वे सम्मानपूर्वक खड़े रहे थे। सुप्रीम कोर्ट ने उनके पक्ष में फैसला दिया और माना कि केवल राष्ट्रगान न गाने के कारण उन्हें दंडित नहीं किया जा सकता।
इस फैसले में Article 19(1)(a) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और Article 25 के तहत अंतरात्मा और धार्मिक स्वतंत्रता के पहलुओं पर विचार किया गया था। बाद के न्यायिक फैसलों में भी इस सिद्धांत का उल्लेख हुआ है। वर्तमान सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने इसी पुराने फैसले को महत्वपूर्ण माना है। कोर्ट ने कहा कि ‘Bijoe Emmanuel’ अभी तक कानून का हिस्सा है और उसी के अनुरूप स्थिति देखी जानी चाहिए।
विवाद छह अंतरों को लेकर क्यों है?
वंदे मातरम् के कुल छह अंतरों को लेकर वर्तमान विवाद खड़ा हुआ है। याचिकाकर्ता का कहना है कि अंतिम चार अंतरों में दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती जैसी हिंदू देवियों के संदर्भ आते हैं। उनका तर्क है कि किसी व्यक्ति को इन पंक्तियों का अनिवार्य रूप से गायन करने के लिए मजबूर करना उसकी धार्मिक अंतरात्मा और संवैधानिक स्वतंत्रता के सवाल खड़े कर सकता है।
याचिका में यह भी कहा गया है कि 1937 में कांग्रेस ने राष्ट्रीय सभाओं में वंदे मातरम् के पहले दो अंतरों तक गायन सीमित रखने की व्यवस्था स्वीकार की थी, क्योंकि बाद के हिस्सों को लेकर कुछ मुस्लिम सदस्यों ने आपत्ति जताई थी। याचिका के मुताबिक उस व्यवस्था को राजेंद्र प्रसाद, सुभाष चंद्र बोस, जवाहरलाल नेहरू और रवींद्रनाथ टैगोर जैसे नेताओं का समर्थन मिला था। हालांकि ये अभी सिर्फ याचिका में किए गए तर्क और ऐतिहासिक दावे हैं; इनका अंतिम कानूनी निर्धारण इस सुनवाई में नहीं हुआ है।
फिर 2026 के कानून में बदलाव क्या हुआ?
2026 के संशोधन ने 1971 के कानून में National Song को भी उस प्रावधान के दायरे में लाया है, जो National Anthem के गायन को जानबूझकर रोकने या गायन कर रही सभा में disturbance पैदा करने से संबंधित है। मौजूदा कानूनी प्रावधान में इस तरह के कृत्य के लिए अधिकतम तीन वर्ष की सजा, जुर्माना या दोनों का प्रावधान है। इसलिए असली संवैधानिक सवाल यह है कि National Song के सम्मान की कानूनी सुरक्षा और किसी व्यक्ति के conscience यानी अंतरात्मा के अधिकार के बीच सीमा कहां तय होगी।
क्या वंदे मातरम् गाने से इनकार करना और उसका अपमान करना एक ही है?
नहीं, यही इस मामले की सबसे महत्वपूर्ण कानूनी बारीकी है। याचिकाकर्ता का कहना है कि कानून में इस्तेमाल किया गया “disturbance” शब्द बहुत व्यापक हो सकता है और इसका इस्तेमाल scholarly criticism, artistic expression या वंदे मातरम् के इतिहास पर चर्चा करने वालों के खिलाफ भी किया जा सकता है।
दूसरी तरफ, मौजूदा कानून का शब्दांकन मुख्य रूप से जानबूझकर गायन रोकने या सभा में व्यवधान पैदा करने पर केंद्रित है। इसलिए किसी व्यक्ति का शांतिपूर्वक अलग खड़ा रहना और किसी कार्यक्रम को बाधित करना कानूनी रूप से अलग परिस्थितियां हो सकती हैं।
पहले भी क्या सुप्रीम कोर्ट में यह मामला आया था?
हां। याचिका खुद Muhammed Sayeed Noori v. Union of India मामले का उल्लेख करती है। 25 मार्च 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने जनवरी 2026 के गृह मंत्रालय के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर विचार करने से इनकार किया था। उस समय एक महत्वपूर्ण वजह यह थी कि वंदे मातरम् न गाने के लिए कोई आपराधिक सजा निर्धारित नहीं थी। अब स्थिति अलग है, क्योंकि 2026 के संशोधन के बाद National Song को आपराधिक प्रावधान के दायरे में लाया गया है। इसलिए टीएम कृष्णा की याचिका का तर्क है कि कानूनी स्थिति अब बदल चुकी है।
फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने कानून को रद्द नहीं किया है और न ही छह अंतरों पर अंतिम फैसला दिया है। कोर्ट ने केंद्र का जवाब मांगा है और सुनवाई के दौरान यह महत्वपूर्ण मौखिक टिप्पणी की है कि Bijoe Emmanuel के तहत संरक्षित धार्मिक अंतरात्मा के अधिकार को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
यानी इस मामले का असली फैसला सिर्फ यह तय नहीं करेगा कि वंदे मातरम् कैसे और कितने अंतरों में गाया जाएगा, बल्कि यह भी स्पष्ट कर सकता है कि राष्ट्रीय सम्मान की कानूनी सुरक्षा और किसी नागरिक की अंतरात्मा की स्वतंत्रता के बीच संवैधानिक सीमा कहां खींची जाती है।




























