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क्या बीजेपी 2019 में केरल जीत सकती है?

Siva Das द्वारा Siva Das
12 June 2018
in मत
बीजेपी केरल
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अगर बीजेपी को दक्षिण भारतीय राज्यों से अपनी इच्छा का राज्य चुनने का मौका दिया जाता है तो मुझे लगता है कि बीजेपी केरल को चुनेगी। बीजेपी उच्चतम साक्षरता दर और मानव विकास सूचकांक के आधार पर केरल को नहीं चुनेगी बल्कि ये अपनी पार्टी के सैकड़ों कार्यकर्ताओं की स्मृति और सम्मान में वापस भुगतान करने के मकसद से चुनेगी। वो कार्यकर्ता जिन्होंने राज्य में मार्क्सवादी तलवारों के नीचे अपना जीवन त्याग दिया। मोदी-शाह की जोड़ी की नजर पहले ही वामदलों के गढ़ केरल पर है। यदि बीजेपी सावधानीपूर्वक और पूर्णनिर्धारित रणनीति के साथ अपनी चाल चलती है तो 2019 के आम चुनावों में दशकों बाद इस राज्य के मतदाता का मत चौंका देने वाला हो सकता है।

राज्य और उसकी राजनीतिक गणना को जान लेते हैं:

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केरल देश का पहला राज्य है जहां वाम दलों ने सबसे पहले अपनी सरकार बनाई थी और अब ये आखिरी राज्य होगा जो वाम दलों को विदाई देगा। पार्टी ने पहले ही राज्य के अंदर अपनी लगातार कोशिशों और हस्तक्षेप की रणनीति से जगह बना ली है। करिश्माई नेताओं और 50 से 60 के दशक में सामाजिक परिस्थितियों से राज्य में साम्यवाद का उदय हुआ था। कभी अतीत में गौरवशाली माने जाने वाली पार्टी आज वर्तमान समय में अपनी छवि को धूमिल कर चुकी है। देश के बाकि राज्यों की तरह ही केरल में भी साम्यवाद अब प्रचलित नहीं रहा। पार्टी के समकालीन नेता अब भव्य जीवनशैली के प्रतीक हैं और पार्टी की छवि ‘वंचित पार्टी’ से ‘विशेषाधिकार की पार्टी’ में बदल चुकी है।

वहीं दूसरी तरफ कांग्रेस की स्थिति राज्य में अच्छी नहीं है। पार्टी के भीतर होती गुटबाजी से पार्टी कमजोर हुई है। इसकी स्थिति इतनी बदतर हो गयी है कि राज्य में कांग्रेस ही कांग्रेस की दुशमन बन गयी है। राष्ट्रीय स्तर पर पार्टी की अस्थिरता का प्रभाव राज्य इकाइयों पर इतना गहरा है कि कई निर्वाचन क्षेत्रों में जमीनी स्तर के कार्यकर्ताओं में ध्रुवीकरण देखने को मिल रहा है।

केरल राज्य के दो प्रमुख गठबंधन मोर्चा, वामपंथी राजनीतिक दलों का डेमोक्रेटिक फ्रंट (एलडीएफ) गठबंधन और कांग्रेस के अधीन बने यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट ये दोनों ही राज्य में 1982  से शासन करते आ रहे हैं। कांग्रेस और सीपीआईएम ने कभी चुनावी क्षेत्र में बीजेपी को पांव पसारने की इजाजत नहीं दी और जब बीजेपी राज्य में सीट जीतने की उम्मीद कर रही थी तब कांग्रेस और सीपीआईएम ने कमल के खिलने से पहले ही हाथ मिलाने का फैसला कर लिया। उनकी इस समझौते और अनुबंध की राजनीति को 2016 के विधानसभा चुनावों में बीजेपी ने कुचल कर रख दिया और बीजेपी के वरिष्ठ नेता ओ राजगोपाल ने सभी बाधाओं को पार करते हुए केरल के नेमोम निर्वाचन क्षेत्र में ऐतिहासिक जीत दर्ज कर विपक्ष की सभी रणनीतियों को धराशाही कर दिया। उल्लेखनीय है कि, 2006 के बाद से यहां बीजेपी के वोट शेयर में लगातार वृद्धि देखी गयी। ये वृद्धि 2006 के 4.75 वोट शेयर से लेकर 2011 के 6.03 तक देखी गयी। इसके अलावा, 2016 के विधानसभा चुनावों में वोट शेयर एनडीए के लिए 15.20% के उच्चतम स्तर तक पहुंच गया। उन्होंने नेमोम सीट पर जीत दर्ज की, वहीं 89 वोटों के कम अंतर से ही पार्टी की मंजेश्वरम में  हार हुई थी और राज्य के 6 अन्य निर्वाचन क्षेत्रों में दूसरे स्थान पर रही। ये पार्टी के लिए किसी उपलब्धि से कम नहीं थी जो राज्य की राजनीति में पकड़ बनाने के लिए कड़ी मेहनत कर रही थी।

हालांकि, राज्य को धर्मनिरपेक्षता, जाति और धार्मिक समुदायों के एक विशिष्ट उदाहरण के रूप में पेश किया जाता है जो चुनावी राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। जबकि भारतीय संघ मुस्लिम लीग (आईयूएमएल) ने मालाबार क्षेत्र में एक बड़ी अपील की है जहां मुस्लिमों का बोलबाला है, केरल कांग्रेस(एम) जोकि के.एम मनी की अगुवाई में ईसाई के वोटों पर निर्भर है। ओबीसी ईझव और नायर राज्य में प्रमुख हिंदू जाति हैं। ओबीसी ईझव एसएनडीपी (श्री नारायण धर्म परिपालन संघम) को मानते हैं और नायर एनएसएस (नायर सर्विस सोसाइटी) को मानते हैं। ईझव जो कुल आबादी का 20 फीसदी हैं वो परंपरागत रूप से सीपीआई (एम) की जीवन रेखा है, जबकि कांग्रेस को नायर, ईसाई और मुसलमानों का समर्थन मिलता है। हालांकि, बीजेपी ने कांग्रेस के नायर वोट बैंक में बदलाव कर महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, लेकिन वो शायद ही ईसाई और मुस्लिम वोट बैंकों पर कोई बढ़त बना सकेगी।

मौके और चुनौतियां :

1) बीजेपी की संभावना इस पर भी निर्भर करती है कि वो कितना ईझव वोट बैंक को लुभा सकती है। बीडीजेएस संगठन एसएनडीपी की राजनीतिक शाखा है जो इस लक्ष्य को हासिल करने में मदद कर सकती है। हालांकि, बीडीजेएस बीजेपी का सहयोगी है लेकिन दोनों के बीच के संबंध में कड़वाहट रही है।

2) बीजेपी की राज्य इकाई आंतरिक लड़ाई और गुटबंदी से रहित नहीं है। केरल बीजेपी के पूर्व अध्यक्ष कुम्मानम राजशेखरन को मिजोरम का राज्यपाल नियुक्त किया गया था, ऐसे में राज्य इकाई को नए चेहरे की जरूरत है जो इन आंतरिक विवादों के बावजूद स्थिति को संभाल सके और राज्य में गठबंधन मोर्चे के लिए सहयोगियों को एक साथ जोड़ सके।

3) केरल में 99 फीसदी मीडिया आउटलेट बीजेपी विरोधी हैं और इन वर्षों में बीजेपी और आरएसएस की छवि को धूमिल करने में मीडिया ने कोई कसर नहीं छोड़ी है लेकिन सोशल मीडिया के प्रसार ने कुछ हद तक बीजेपी की स्थिति में सुधार किया है।

4) मतदाताओं का ‘ऐज फैक्टर’ बीजेपी के पक्ष में हैं। 2019 में कई नए मतदाता होंगे जो पहली बार मतदान केन्द्रों पर वोट करेंगे। वो बुजुर्गों के विपरीत नई सोच वाले होंगे जो पार्टी की वर्तमान लोकप्रियता से आसानी से प्रभावित हो सकते हैं। युवाओं के बीच मोदी की लोकप्रियता को और बढ़ाकर बीजेपी अपने वोट बैंक को बढ़ा सकती है।

5) केरल में दक्षिणी क्षेत्र में आरएसएस की सबसे ज्यादा शाखा है जो स्पष्ट रूप से इंगित करता है कि हाल के वर्षों में संघ की गतिविधियों में बढ़ोतरी हुई है। वो वर्षों से बड़ी संख्या में सीपीआई (एम) और कांग्रेस दोनों ही पार्टियों से असंतुष्ट युवाओं को आकर्षित करने में सक्षम हुए हैं। मजबूत पकड़ बनाने के लिए कैडर का समर्थन बीजेपी के लाभ को बढ़ाने के लिए सकारात्मक कारक है।

6) उत्तर केरल में बढ़ते आवास और कांग्रेस और सीपीआईएम की चिंताजनक चुप्पी हिंदुओं को दोनों मोर्चों से दूर कर रही है। यदि बीजेपी इस असंतोष का लाभ नहीं उठा सकी और हिंदू वोटों के आधार को अपने पक्ष में नहीं कर सकी तो भविष्य में उन्हें कोई बचा नहीं पायेगा।

7) केरल में सरकार ने मंदिरों पर पूरी तरह से नियंत्रण कर रखा है। राज्य सरकार ने मंदिर मामलों के प्रबंधन के लिए ‘देवस्वम मंत्रालय’ का गठन किया था जो मंदिरों का नियंत्रण करता है। अधिकारियों पर बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार और मंदिर के धन का दुरूपयोग करने के आरोप लगाये गये हैं। राज्य सरकार द्वारा मंदिरों के कुप्रबंधन के खिलाफ अपनी आवाज उठाने में बीजेपी सबसे आगे थी और वो हिंदू समुदाय के विश्वास को जीत सकती है, अगर वो मंदिर के अधिकारों पर सरकार के अतिक्रमण का समाधान निकालने में सफल हो पाती है।

8) सामाजिक प्रतिबद्धता को बढ़ाने के लिए बीजेपी ने पहले ही कौशल विकास के लिए स्थानीय कार्यकर्म शुरू कर दिया है और छोटे पैमाने पर कार्य इकाइयों को शुरू करने के लिए बेरोजगार लोगों के छोटे समूहों को भी व्यवस्थित करना शुरू कर दिया। लोगों के साथ अपने जुड़ाव को बढ़ाने के लिए पूरे राज्य में ऐसे ही कार्यक्रम शुरू किये जाने चाहिए।

9) केरल में कैंपस राजनीति बड़े बदलाव से गुजर रही है। केएसयू और एसएफआई प्रमुख छात्रों का एक संघ हैं जो कैंपस में शासन करते हैं वो अब एबीवीपी से कठिन चुनौती का सामना कर रहे हैं। अधिकांश कॉलेज में एबीवीपी ने केएसयू को पूरी तरह से हटा दिया है और एसएफआई का मुख्य प्रतिद्वंद्वी बन गया है। युवाओं के बीच बढ़ती एबीवीपी की लोकप्रियता निश्चित रूप से लाखों नए मतदाताओं को प्रभावित करेगी जो 2019 में मतदान करने वाले हैं।

10) पिनाराई विजयन ने जबसे पद संभाला है तबसे राज्य में कानून व्यवस्था बिगड़ी है। मुख्यमंत्री-सह-गृह मंत्री पिनाराई विजयन राज्य के राजनीति रूप से सबसे अस्थिर जिला कन्नूर से हैं। मार्क्सवादी पार्टी जिसने कन्नूर में अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों को खत्म करने के लिए हिंसा का सहारा लिया था वो अब पूरे केरल में इसी तरीके को लागू करने की कोशिश कर रहे हैं। यही वजह है कि लोगों में कानून व्यवस्था को लेकर कड़वाहट भर गयी है।

आरएसएस की मजबूत होती पकड़ और युवाओं में मोदी की लोकप्रियता की वजह से त्रिपुरा वाली स्थिति केरल में भी संभव हो सकती है। बीजेपी के लिए त्रिपुरा की तुलना में केरल की जीत कठिन है क्योंकि केरल की आबादी का सामाजिक गठजोड़ त्रिपुरा से एकदम अलग तरह का है। यहां मुस्लिम और ईसाई अल्पसंख्यक मिलकर आबादी का 45 फ़ीसदी हिस्सा बनाते हैं जो बीजेपी के समर्थन में नहीं हैं। इन सभी के बावजूद बीजेपी की वर्तमान स्थिति बेहद अप्रत्याशित है। वो किसी भी बड़े विपक्ष को हरा सकती है या किसी भी दिन नकारात्मक बाजी को उलट सकती है। पार्टी के एक इंटरनल सर्वे ने लगभग 11 निर्वाचन क्षेत्रों में सर्वे किया है जहां बीजेपी को 2019 के चुनावों में फायदा हो सकता है। बीजेपी अपना ध्यान चलाकुडी, कासरगोड, कोझिकोड, पलक्कड़, त्रिशूर, तिरुवनंतपुरम, अट्टिंगल, कोल्लम, हवेलीकर, अलाप्पुझा और पठानमथिट्टा सीटों पर केंद्रित करेगी। हालांकि सभी 11 सीटों पर जीत हो ही जाए ऐसा संभव नहीं है फिर भी बीजेपी को 3-4 सीटों पर जीत जरुर मिल सकती है। यदि बीजेपी के खाते में केरल की 4 लोकसभा सीट भी आती है तो ये कांग्रेस और सीपीआईएम दोनों के लिए एक खतरे की घंटी होगी जो अपना आखिरी गढ़ बचाने के लिए कोशिशों में जुटे हुए हैं।

Tags: 2019 लोक सभा चुनावकेरलकेरल में भाजपाबीजेपी
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