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कम कर दरों के अलावा आगामी आम बजट में हम इन 7 बड़े फैसलों की उम्मीद कर सकते हैं

Vikrant Thardak द्वारा Vikrant Thardak
15 June 2019
in Uncategorized
निर्मला सीतारमण

(PC: Moneycontrol)

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वर्ष 2019 लोकसभा चुनावों में जब लोग अपना वोट डाल रहे थे, तब भाजपा को यह पूर्ण विश्वास था कि सत्ता में उसकी वापसी जरूर होगी, और इसी लिए नई सरकार बनने से पहले ही मोदी सरकार द्वारा वित्त मंत्रालय के अधिकारियों को आने वाले वित्त वर्ष के बजट की तैयारी करने के लिए कह दिया गया था। निर्मला सीतारमण देश की नई वित्त मंत्री हैं जिसका मतलब है कि नई सरकार का पहला आम बजट अब सीतारमण ही पेश करेंगी। मोदी सरकार वर्ष 2014 के मुक़ाबले इस बार और ज़्यादा बड़े जनादेश के साथ आई है, यानि सरकार के पास देश की अर्थव्यवस्था से संबन्धित बड़े फैसले लेने की ज़्यादा स्वतंत्रता होगी। ऐसे में हम उम्मीद कर सकते हैं कि इस साल के आम बजट में सरकार कुछ अहम घोषणायें कर सकती है।

उपभोग 

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जैसा हम सब जानते हैं, भारतीय अर्थव्यवस्था उपभोग आधारित है, जबकि चीन और पूर्वी एशिया के देशों की अर्थव्यवस्था मुख्यतः निर्यात और निवेश पर आधारित है। भारत में पिछले कुछ समय में हमें लागत में कमी देखने को मिली है जिसकी वजह से भारतीय अर्थव्यवस्था की विकास दर को गहरा झटका पहुंचा है। इस समस्या का जल्द से जल्द समाधान आवश्यक है। सरकार चाहे तो प्रत्यक्ष कर और अप्रत्यक्ष कर दरों को कम कर सकती है ताकि बाज़ार में चीजों के दाम कम हो सकें और लोग ज़्यादा समान खरीदने के लिए प्रेरित हों। इसके अलावा सरकार को अपने खर्च में भी वृद्धि करनी होगी। अमेरिका ने कॉर्पोरेट टैक्स दर को 30 प्रतिशत से घटाकर 21 प्रतिशत कर दिया है, और भारत को इसे कम से कम 25 प्रतिशत तक कम तो करना ही चाहिए। इसके अलावा आय कर छूट सीमा को 5 लाख से बढाकर 8 लाख रुपये किया जा सकता है।

कृषि

आइए अब जरा कृषि पर बात कर लेते हैं। मोदी सरकार को चाहिए कि पीएम किसान योजना का लाभ जमीन-रहित मजदूरों को भी दिया जाए। इसके अलावा सरकार को एमएसपी यानि मिनिमम सपोर्ट प्राइस के नाम पर जारी लूट को तुरंत रोकने की जरूरत है। एमएसपी का लाभ सिर्फ बड़े-बड़े किसानों और व्यापारियों को ही मिलता है जबकि छोटे किसानों को इससे कोई लाभ नहीं पहुंचता। छोटे किसानों को अपनी फसल व्यापारियों को बेचनी पड़ती है और फिर व्यापारी ही एमएसपी योजना का लाभ उठाते हैं। सरकार को छोटे किसानों के फायदे के लिए किसी बेहतर और अधिक पारदर्शी योजना का शुभारंभ करने की आवश्यकता है।

निर्यात

सरकार को अर्थव्यवस्था को मजबूती प्रदान करने के लिए निर्यात को बढ़ावा देने की भी जरूरत है। मोदी सरकार की ‘मेक इन इंडिया’ योजना के तहत देश को ‘दुनिया की फैक्ट्री’ बनाने का लक्ष्य रखा गया है। इस योजना का मकसद आयात को कम करके निर्यात को बढ़ावा देने का है। वित्त मंत्री को चाहिए कि नए बजट में निर्यातकों को निर्यात करने पर छूट दी जाए। इसके लिए भारत में औद्योगीकरण को और ज़्यादा बढ़ावा देने की जरूरत है ताकि देश में बेरोज़गारी दर कम हो सके और मैनुफेक्चरिंग ग्रोथ रेट को बढ़ाया जा सके। भारत की अर्थव्यवस्था की विकास दर को दोहरे अंकों में ले जाना तभी संभव हो सकेगा।

निजीकरण

नए वित्त मंत्री को चाहिए कि नुकसान अर्जित कर रही सरकारी कंपनियों से जल्द से जल्द विनिवेश किया जाए और सार्वजनिक क्षेत्रों की कंपनियों का निजीकरण कर दिया जाए। देश में कुल 331 केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियां यानि CPSEs हैं, जिसमें वर्ष 2017 के अंत तक भारत सरकार ने 12 लाख 50 हज़ार 373 करोड़ रुपयों का भारी–भरकम निवेश किया है। इन सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों में से बीएसएनएल, एयर इंडिया, और महानगर टेलीकॉम निगम लिमिटेड जैसी कंपनियां सरकार के लिए बोझ बनी हुई है, क्योंकि ये कंपनियां सरकार के लिए मुनाफे की बजाय नुकसान अर्जित कर रही हैं और इन कंपनियों में बड़ी मात्रा में सरकारी पैसे का दुरुपयोग होता है। स्थिति लगातार बिगड़ते ही जा रही है। आलम यह है कि वर्ष 2007-08 में नुकसान अर्जित करने वाली कंपनियों की संख्या जहां सिर्फ 54 थी, वहीं वर्ष 2016-17 में इस कंपनियों की संख्या 82 तक पहुंच गई। प्रधानमंत्री मोदी इस दिशा में पहले ही अपनी सरकार का रुख स्पष्ट कर चुके हैं। पीएम मोदी ने एक बार कहा था ‘व्यवसाय करना सरकार का व्यवसाय नहीं है’।

जीएसटी 2.0

जीएसटी को सफलतापूर्वक लागू करने का मुश्किल काम सरकार पहले ही कर चुकी है। जीएसटी के माध्यम से अप्रत्यक्ष कर प्रणाली में एक बड़ा सुधार हुआ है। अब नई सरकार को चाहिए कि रियल एस्टेट, बिजली, ईंधन और अल्कोहल को भी जीएसटी के दायरे में लाया जाए और टैक्स की 5 स्लैब्स (शून्य , 5%, 12%, 18% और 28%) को कम करके तीन स्लैब्स तक लाया जाए।

नया जमीन अधिकरण कानून

इसके अलावा मोदी सरकार को कृषि और जमीन संबंधी क्षेत्रों पर भी फ़ोकस करने की आवश्यकता है। उदाहरण के तौर पर देश में जमीन अधिग्रहण से संबन्धित कानून बड़े जटिल हैं और सरकार द्वारा जमीन का अधिग्रहण करना एक बड़ा कठिन काम है। इसकी वजह से सरकार की कई महत्वपूर्ण परियोजनाएं अधर में लटक जाती हैं। सरकार को इसके लिए नए कानून बनाने की आवश्यकता है ताकि जमीन अधिग्रहण जैसी महत्वपूर्ण प्रक्रिया में पारदर्शिता आ सके। नए वित्त मंत्री को सभी राज्यों को अपने विश्वास में लेकर इस दिशा में सुधारवादी कदम उठाने की सख्त आवश्यकता है।

नया श्रम कानून

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण को इसके बाद श्रम कानून में बड़े बदलाव करने की सख्त जरूरत है। कहने को तो इस वक्त देश में श्रम संबन्धित 37 केंद्रीय कानून हैं, लेकिन क़ानूनों में जटिलता होने की वजह से ना तो कभी इन क़ानूनों को सही से लागू किया गया, और ना ही पालन! आज़ादी के बाद मार्क्सवादी नीतियों का अनुसरण करने वाली सरकारों ने ‘पूंजी’ से ज़्यादा ज़ोर ‘श्रम’ करने पर दिया। इसके बाद आई सरकारों ने भिन्न-भिन्न क्षेत्रों के लिए ढेरों क़ानून पारित कर डाले लेकिन श्रमिकों की शारीरिक (मानसिक) और वित्तीय सुरक्षा जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर कभी ध्यान नहीं दिया गया। मोदी सरकार को पुराने और जटिल क़ानून की जगह नए कानून बनाने की आवश्यकता है जो नई चुनौतियों और मुश्किलों का सही से निवारण कर सके।

निवेश बाज़ार में अतिरिक्त सुरक्षा

सरकार को वित्तीय क्षेत्रीय में कई अहम बदलाव करने की जरूरत है ताकि व्यवसायों को सस्ते दरों पर पूंजी उपलब्ध कराई जा सके। भारत में ‘कॉस्ट ऑफ कैपिटल’ दुनियाभर के कई देशों के मुक़ाबले काफी ज़्यादा है। हालांकि, जबसे शक्तिकांत दास आरबीआई के गवर्नर बने हैं, तब से केंद्रीय बैंक लैंडिंग रेट्स को लेकर काफी उदार हुआ है। अब नए वित्त मंत्री को निवेश बाज़ार में भी निवेशकों को सुरक्षा प्रदान करने की आवश्यकता है ताकि लोग अपनी जमा की गई राशि को बाज़ार में निवेश कर सकें। इससे भारत की अर्थव्यवस्था को जोरदार बल मिलेगा। इससे कंपनियों को पूंजी के लिए बैंकों पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा।

पिछली बार का अंतरिम बजट, अंतरिम वित्त मंत्री पीयूष गोयल ने पेश किया था जिसको लेकर उनका काफी सराहना हुई थी। अब हमें आशा है कि निर्मला सीतारमण भी अपने बेहद शानदार वक्ता कौशल से सबकी उम्मीदों पर खरा उतरेंगी।

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