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जब चीन को 1967 में आज के ही दिन भारत ने ‘नाथु ला’ और ‘चो ला’ में पटक पटककर धोया था

Animesh Pandey द्वारा Animesh Pandey
11 September 2019
in एशिया पैसिफिक, विश्व
चीन

(PC: indiatoday)

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अमेरिका के पूर्व सैन्य प्रमुख जनरल जॉर्ज एस पैटन ने क्या खूब कहा था, “एक उत्कृष्ट योजना को अगले हफ्ते अमल में लाने से अच्छा है एक अच्छी योजना को आक्रामक तरीके से बिना देर किए अमल में लाना!” ये कथन हमारे उन वीरों के ऊपर बिल्कुल सटीक बैठता है, जिन्होंने न केवल अपनी जान हथेली पर रखकर भारत को एक अप्रत्याशित विजय दिलाई, बल्कि चीन के अजेय छवि को भी मिट्टी में मिला दिया, जहां तानाशाह माओ ज़ेडोंग का राज चलता था।

आज ही के दिन 52 वर्ष पहले भारत ने चीनी फौज को नाथु ला की सपाट चोटियों पर धूल चटाई थी। लगातार चीनी गुंडई का सामना करने के बावजूद हमारे भारतीय वीरों ने अपना हौसला नहीं खोया, और तीन दिन के भीषण युद्ध के बाद चीनी फौज को घुटने टेकने पर विवश कर दिया।

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जिस समय ये युद्ध हुआ, वो भारत के लिए बड़ा कठीन समय था। इन्दिरा गांधी को प्रधानमंत्री बने एक साल भी नहीं हुआ था, और भारत ने हाल ही में अपने पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान पर दो तरफा विजय प्राप्त की थी, चाहे वो 1964 में टोक्यो ओलम्पिक का मैदान हो, या फिर 1965 का ऐतिहासिक युद्ध, जहां अमेरिकी हथियारों के दम पर कश्मीर पर कब्जा जमाने का ख्वाब देखने वाला पाकिस्तान के हाथ से लाहौर और सियालकोट भी फिसलता दिखाई दे रहा था। जिसके बाद पाक सीजफ़ायर की भीख मांगने यूएन पहुँच गया।

भारत 1962 की भांति पिछड़ा हुआ था, लेकिन उस वक्त चीन से किसी भी स्थिति में भिड़ने को तैयार था। वर्ष 1967 में भारत और चीन के बीच सिक्किम राज्य गले की फांस बना हुआ था। उस वक्त भी सिक्कीम को भारत का संरक्षण प्राप्त था, जो चीन की नजर में चढ़ा हुआ था। चीन इसे भी तिब्बत की तरह कब्ज़ियाना चाहता था, जबकि भारत बिना किसी राजनीतिक लाभ के एक दयालु राष्ट्र की भांति सिक्किम की रक्षा करना चाहता था।

जल्द ही नाथु ला स्थित भारत की सीमा पर कंटीले तार और बाड़ लगाने का काम 17वें माउंटेन डिविजन के कमांडिंग ऑफिसर मेजर जनरल सगत सिंह को सौंपा गया। ये निर्णय भारतीय सरकार ने चीन के निरंतर घुसपैठ के बाद लिया था। मेजर जनरल सगत बड़े ही निर्भीक स्वभाव के थे और उन्होंने इस युद्ध से पहले 1963 में चीन की धमकियों के बावजूद नाथु ला खाली करने से मना कर दिया था, क्योंकि उनके अनुसार नाथु ला प्राकृतिक सीमा पर ही स्थित था।

उस समय चीन में साम्यवाद अपने चरम पर था, और तब माओ त्से तुंग अथवा माओ ज़ेडोंग का चीन पर शासन था। 1962 के युद्ध में भारतीय सेना को हराने के बाद से उनके ऊपर अति आत्मविश्वास का भूत सवार था, और उन्हें लगता था कि उन्हे कभी भारतीय सेना चुनौती नहीं दे पाएगी, और उनकी यही सोच बाद में उनकी सबसे बड़ी भूल सिद्ध हुई।

13 अगस्त 1967 को भारतीय सेना ने चीनियों को सिक्किम की सीमा के पास गड्ढे खोदते पकड़ा। जब उन्होंने स्थानीय चीनी कमांडर से इसकी शिकायत की, तो चीनी कमांडर मानो कानो में तेल डालकर बैठा था। इसके बाद आग में पेट्रोल डालते हुए चीनियों ने कई और गड्ढे खोद डाले, और बॉर्डर पर स्थित 21 लाउडस्पीकर में 8 लाउडस्पीकर और शामिल कर दिये, जो भारत को मानो खुली चुनौती दे रहा हो।

इस बार घुसपैठ को गंभीरता से लेते हुए भारत ने अंतर्राष्ट्रीय सीमा के अपने क्षेत्र में बाड़ लगवाने का निर्णय किया था, जो पहले महज पत्थरों की एक लकीर से चिन्हित था। चीन के पास सैन्यबल ज़्यादा था, जबकि भारत के पक्ष में नाथु ला क्षेत्र में स्थित सेबु ला का कॉम्प्लेक्स था। 18 अगस्त को सीमा पर कंटीले तारों को लगाने का काम प्रारम्भ हुआ, तो भारतीय सेना की जवाब से आग बबूला हो चीनियों ने भारतीयों को डराने धमकाने का प्रयास किया, पर उनके सारे प्रयास विफल रहे।

पर बात तब बिगड़ गयी, जब 7 सितंबर 1967 को स्थानीय चीनी कमांडर ने सीमा पर बाड़ लगाने के लिए वहाँ पर स्थित 2 ग्रेनेडियर्स के कमांडिंग अफसर लेफ्टिनेंट कर्नल राय सिंह को धमकाने का प्रयास किया। जब लेफ्टिनेंट कर्नल राय साहब अपने स्थान पर अडिग रहे, तो चीनियों ने उनके साथ हाथापाई करने का प्रयास किया। इसपर भारतीय सैनिकों ने अपना आपा खो दिया और दोनों पक्षों में एक हिंसक झड़प हुई, जिसके कारण दोनों तरफ के कई सैनिक घायल हो गए।

परंतु असल युद्ध तो अभी बाकी था। 11 सितंबर 1967 को भारतीय सेना ने नाथु ला से सेबु ला स्थित बार्डर पर एक कंटीला बाड़ लगाने का निर्णय लिया। उन्हे बीच में रोकते हुए चीनी पक्ष के एक पॉलिटिकल कॉमिसार और चीनी सैनिकों ने अंजाम भुगतने की धमकी दी। उनकी धमकियों को दरकिनार करते हुये लेफ्टिनेंट कर्नल राय सिंह ने अपने आदमियों और अभियन्ताओं को काम जारी रखने की सलाह दी। जब चीनी सैनिकों ने राय सिंह के साथ बदतमीजी की, तो सैनिकों के बीच एक और झड़प हुई, जिसमें कॉमिसार को काफी चोटें आई। इस कृत्य पर आग बबूला होकर चीनी अपने बंकर की तरफ लौट गए, और भारतीय सैनिक अपने काम में वापस लग गए। परंतु उन्हें बिल्कुल भी आभास नहीं था कि आगे क्या होने वाला है।

चीनी क्षेत्र से पहले एक सीटी जैसी आवाज़ आई, जिसके बाद तो गोलियों की जैसे बरसात होने लगी। कोई कवर न होने के कारण भारतीय सैनिकों को काफी नुकसान झेलना पड़ा। इसके बावजूद लेफ्टिनेंट कर्नल राय ने अपना हौसला नहीं खोया, और आवश्यक कवर फायर देते हुये अपने सैनिकों को चीनियों से लड़ने का हौसला दिया। इसी बीच कैप्टन पृथ्वी सिंह डागर और मेजर हरभजन सिंह ने चीन के एमएमजी पोस्ट पर धावा बोलकर स्थिति संभालने का प्रयास किया, परंतु दोनों ही इस अभियान में वीरगति को प्राप्त हो गए। कैप्टन डागर को मरणोपरांत वीर चक्र से पुरुस्कृत किया गया, जबकि मेजर हरभजन सिंह को मरणोपरांत महावीर चक्र से सम्मानित किया गया।

चीन के हमले के बाद भारतीयों ने अपने पास जो कुछ भी था, उन सब से चीन को मुंहतोड़ जवाब दिया। राइफल के बेयोने से लेकर आर्टिलेरी शेल तक भारत ने चीन के विरुद्ध चलाया। युद्ध के दौरान लेफ्टिनेंट कर्नल राय सिंह ने अदम्य साहस का परिचय देते हुये स्वयं एमएमजी पोस्ट संभाला और पेट में गोलियां लगने के बावजूद उन्होने मोर्चा नहीं छोड़ा। जब तक उन्हें युद्धभूमि से नहीं ले जाया गया, वे अपने जवानों का हौसला बढ़ाते रहे।

युवा अफसर सेकंड लेफ्टिनेंट अत्तर सिंह ने स्थिति बिगड़ने पर खुद मोर्चा संभाला और जवानों का हौसला बढ़ाते हुए उन्होंने दुश्मनों से सीधा मोर्चा लिया। अदम्य साहस का परिचय देने के लिए सेकंड लेफ्टिनेंट अत्तर सिंह को वहीं युद्धभूमि पर कैप्टन के पद तक प्रोन्नति दी गयी। लेफ्टिनेंट कर्नल राय सिंह जीवित रहे, और उन्हे भारत के दूसरे सर्वोच्च युद्ध सम्मान महावीर चक्र से 1968 में सम्मानित किया गया।

पर शायद चीन ने अभी भी कोई सबक नहीं सीखा था। 30 सितंबर को चो ला के एक ऐसे ही क्षेत्र में 10 जम्मू और कश्मीर राइफल्स के सिख सिपाहियों और चीनी सैनिकों में झड़प हो गयी। भारतीय संतरी ने आपा खोने पर एक चीनी सैनिक को ऐसे मारा कि उसका ट्यूनिक बटन ही निकल आया।

इस झड़प के बारे में क्षेत्र के कमांडिंग अफसर मेजर केबी जोशी को काफी देर से पता चला। परंतु नाथु ला की झड़प के बारे में जानकारी होने के नाते उन्होंने स्थिति को समझने में ज़रा भी विलंब नहीं किया। स्थिति का जायजा लेने के लिए मेजर जोशी सुबह सुबह ही राय गैप क्षेत्र पर स्थित डे कॉय कंपनी के पोजीशन का मुआयना करने पहुँच गए। पॉइंट 15450 पर भारतीय संतरी का जहां से उन्हे पोस्ट दिखाई दिया, तो मेजर जोशी ने ये भी पाया कि पोस्ट को चीनी सैनिकों के एक सेक्शन ने घेर रखा था। वहाँ तैनात अफसर लेफ्टिनेंट राठौर को जब मेजर जोशी ने स्थिति से अवगत कराया, तो उन्हे पता चला कि वहाँ पर स्थित कॉमिसार और स्थानीय कमांडर तो पहले ही पोस्ट पर नज़रें गड़ाए बैठा है।

वहीं दूसरी ओर चो ला पर तैनात गोरखा राइफल्स के नायब सूबेदार ज्ञान बहादुर लिम्बू की एक चीनी सैनिक से तीखी झड़प चल रही थी। चीनी सैनिक ने ज्ञान बहादुर लिम्बू को लात दिखाई तो ज्ञान ने अपना पैर पत्थर पर वापस जमाते हुये उसे खुलेआम चुनौती दे डाली। इसी समय चीनी कमांडर ने सबक सिखाने के लिए अपने सैनिकों को पोजीशन लेने के लिए कहा, और चीनी संतरियों में से एक ने ज्ञान को बाँह में राइफल की बेयोने मारते हुये घायल कर दिया। परंतु यहीं उन्होंने एक भारी भूल कर दी। ज्ञान बहादुर लिम्बू ने घायल होने के बावजूद दोनों संतरियों के दोनों हाथ अपनी खुखरी से काट दिया, जिसके बाद चीनियों ने क्रोधित हो फायरिंग शुरू कर दी।

पोस्ट के कमांडर लांस नायक कृष्ण बहादुर ने चीनी सैनिकों को मोर्चा जमाने से पहले ही उनपर धावा बोल दिया। गोली लगने के बावजूद उन्होंने अपने जवानों को प्रोत्साहित रखा। इसी बीच राइफलमैन देवी प्रसाद लिम्बू ने मानो एक अंतर्यामी योद्धा का रूप धारण कर लिया हो, और वीरगति प्राप्त करने से पहले अकेले दम उन्होंने अपनी खुखरी से पाँच चीनी सैनिकों के सर धड़ से अलग कर दिये। इसके लिए उन्होने मरणोपरांत वीर चक्र से पुरुस्कृत किया गया।

पॉइंट 15540 पर चीन द्वारा किए गए हमले में लेफ्टिनेंट राठौर घायल हो गए। इसके बावजूद उन्होने मोर्चा संभाले रखा, परंतु जल्द ही उन्हे छाती और पेट में गोलियों की बौछार हुई, और वे भी वीरगति को प्राप्त हो गए। इस समय मेजर जोशी ने कमान अपने हाथ में ली और पॉइंट 15450 पर स्थित चीनी बंकरों पर उन्होंने बड़े सलीके से मोर्टर फायर करना शुरू कर दिया।

J&K राइफल्स की टुकड़ी को आरसीएल फायर के कारण काफी नुकसान उठाना पड़ा। मेजर जोशी के सहायक भी इसी पसोपेश में मारे गए। परंतु जब मेजर जोशी ने अकेले ही दो चीनी सैनिक मार गिराए, तो चीनी पीछे तो हट गए, परंतु युद्ध जारी रहा। भारतीय सैनिकों के शौर्य से चोट खा चुके चीनी सैनिक युद्ध का क्षेत्र बदलना चाहते थे, और उन्होंने कुछ देर के लिए फायरिंग रोक दी। परंतु हमारे सैनिकों ने उनकी एक न चलने दी, और टिमजोंग क्षेत्र में फायरिंग कर लड़ाई जारी रखी। मेजर जोशी ने तब तक फायरिंग जारी रखी, जब तक उनका सारा एम्यूनिशन खत्म नहीं हो गया। सुबह 11:30 बजे तक सारे चीनी सैनिक पॉइंट 15450 से पीछे हट गए।

परंतु प्वाइंट 15540 अभी भी चीन के कब्जे में था। इसलिए शाम 5 बजे एक ऑपरेशन लॉंच हुआ, जिसका नेतृत्व कैप्टन पारुल्कर और उनकी बी कंपनी ने किया, पर वे शुरुआत में अंधेरे की वजह से डगमगा रहे थे। शाम 6 बजकर 40 मिनट पर मेजर जोशी ने कैप्टन पारुल्कर और उनकी प्लाटून को उत्तर-पश्चिम की दिशा से धावा बोलने को कहा, जबकि बाकी कंपनी और मोर्टर लिए जवानों को सामने से धावा बोलने के लिए तैयार रहने के लिए कहा।

परंतु जब चीनी सेना ने स्थिति भाँपी, तो उन्हे अपना विनाश साफ दिखाई दे रहा था, और वे बिना एक गोली चलाये वहाँ से भाग खड़े हुए। पूरे युद्ध के दौरान चीन ने आधिकारिक तौर पर 300 से ज़्यादा सैनिक गँवाए जबकि भारतीय सेना के केवल 65 सैनिक वीरगति को प्राप्त हुये। इस युद्ध के बाद चीन की कथित अजेय छवि मिट्टी में मिल चुकी थी, और इन दो युद्धों ने यह सिद्ध कर दिया कि भारतीय सैनिक किसी से कम नहीं, इस युद्ध के वीर शहीदों की हम जितनी प्रशंसा करें, वो कम होगी।

जय हिन्द! वंदे मातरम!

Tags: चीनभारतभारतीय सेनायुद्ध
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29 January 2026

पचहत्तर वर्ष पहले, जब चीनी सेनाएं मध्य तिब्बत की ओर बढ़ रही थीं, तब 14वें दलाई लामा तिब्बत के आधुनिक इतिहास के एक निर्णायक मोड़...

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