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तो इस वजह से कश्मीर मुद्दे पर चीन ने बदला अपना रुख, दिया भारत का साथ

Vikrant Thardak द्वारा Vikrant Thardak
9 October 2019
in विश्व
कश्मीर

PC: Asia Sentinel

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चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग इस शुक्रवार यानि 11 अक्टूबर से 13 अक्टूबर तक भारत के दौरे पर आने वाले हैं, और इस दौरे से ठीक पहले ही कश्मीर मुद्दे पर चीन के रुख में नरमी देखने को मिली है। जो चीन कल तक कश्मीर पर हमारे पड़ोसी देश पाक की जुबान बोल रहा था, वह अब अचानक से दोनों पक्षों को बातचीत करने के लिए कह रहा है। चीन के रूख में यह बदलाव इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि ठीक अगले शुक्रवार को चीन के राष्ट्रपति शी दो दिन के लिए भारत आने वाले हैं। अब तक चीन, चीन और भारत के बीच किसी भी महत्वपूर्ण द्विपक्षीय बातचीत से पहले दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ाने की नीति पर काम करता आया है ताकि बातचीत के दौरान भारत पर दबाव बढ़ाया जा सके, लेकिन अब की बार ठीक उल्टा हुआ है। दरअसल, चीन इस बार प्रधानमंत्री मोदी और शी जिनपिंग की मुलाक़ात से ठीक पहले शांति की बात कर रहा है। बड़ा सवाल यह है कि वह ऐसा क्या कारण है जिसने चीन को अपनी इस नीति में बदलाव करने पर मजबूर किया है?

चीन का पाक प्रेम किसी से छुपा नहीं है, और वह हमें कश्मीर मुद्दे पर देखने को मिल चुका है। अभी पिछले हफ्ते ही पाकिस्तान में मौजूद चीन के राजदूत ने कश्मीर को लेकर एक ऐसा बयान दिया था जिसने भारत को बेहद नाराज़ कर दिया था। दरअसल, बीते शु्क्रवार को इस्लामाबाद में चीनी राजदूत याओ जिंग ने कहा था कि ‘कश्मीरियों को उनके बुनियादी अधिकार और इंसाफ़ दिलाने में मदद के लिए भी हम काम कर रहे हैं।’ इसपर भारत ने अपनी कड़ी आपत्ति जताई थी और चीन से पूछा था कि क्या कश्मीर पर चीन के रुख में कोई बदलाव आया है? क्योंकि इससे पहले चीन दोनों पक्षों द्वारा बातचीत की वकालत करता आया है जो काफी हद तक भारत का भी रुख रहा है। भारत की नाराजगी के बाद अब चीन के विदेश मंत्रालय ने इस बात को स्पष्ट किया कि कश्मीर मुद्दे पर उसकी नीति में कोई बदलाव नहीं आया है। वहीं भारत में चीन के राजदूत सुन वीदोंग (sun weidong) ने मंगलवार को कहा कि भारत और चीन को आपसी विवादों को क्षेत्रीय स्तर पर बातचीत के जरिए शांतिपूर्ण ढंग से सुलझाना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि दोनों देशों को क्षेत्र में शांति और स्थिरता कायम करने के लिए मिलकर काम करना चाहिए।

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दोनों देशों के राष्ट्राध्यक्षों की मुलाक़ात से ठीक पहले चीन का यह शांति राग अलापना बिलकुल नई बात है। यह वही चीन है जो अक्सर किसी भी द्विपक्षीय बातचीत से पहले अपने पड़ोसी देशों के साथ बॉर्डर पर तनाव को बढ़ा देता है ताकि बातचीत में उसका पलड़ा भारी हो सके और वह सामने वाले देश पर अपना दबाव बढ़ा सके। उदाहरण के तौर पर जब वर्ष 2014 में मोदी सरकार आने के बाद पहली बार चीन के राष्ट्रपति जिनपिंग भारत के दौरे पर आए थे तो चीनी सेना ने चुमार और डेमचोक जैसे बॉर्डर इलाकों में घुसपैठ करने की कोशिश की थी। इसके अलावा जब वर्ष 2017 में भारत और चीन के बीच डोकलाम विवाद हुआ था तो उसके कुछ महीनों बाद ही पीएम मोदी और राष्ट्रपति जिनपिंग के बीच अहम मुलाक़ात होने वाली थी।

अगर इतिहास को देखा जाए तो भी हमें इसी तरह के उदाहरण देखने को मिलते हैं। वर्ष 1992 में चीन के दौरे पर जाने वाले भारत के पहले राष्ट्रपति आर वेंकटरमन जब चीन गए थे तब चीन ने एक मेगाटन के न्यूक्लियर हथियार का टेस्ट किया था। इसी तरह वर्ष 2007 में जब चीन के विदेश मंत्री भारत के दौरे पर आने वाले थे, तब चीन ने anti-sattelite missile का टेस्ट किया था। साफ है कि अब तक चीन दूसरे देशों को डरा-धमकाकर अपनी बात मनवाने की नीति पर काम करता आया था, लेकिन जहां तक भारत की बात है तो चीन को अब अपनी इस नीति को बदलने पर मजबूर होना पड़ रहा है। अब चीन ‘पंचशील समझौते’ के आधार पर भारत के साथ रिश्तों को आगे बढ़ाने की बात कर रहा है।

अब यहां सवाल तो ये भी उठता है कि आखिर ऐसा हुआ कैसे? वो क्या कारण था जिसने गुंडागर्दी करने वाले चीन को एक मासूम बच्चे की तरह बर्ताव करने पर मजबूर कर दिया? दरअसल, अब यह बात चीन को भी समझ आ चुकी है कि उसका हित पाकिस्तान के साथ नहीं बल्कि भारत के साथ रहने में है। पाक की वजह से उसे अब तक अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बदनामी ही मिली है। इस बात में कोई दो राय नहीं है कि भारत का हित चीन के साथ रिश्तों को मधुर करने में ही है। लेकिन यह भी सच है कि ताली कभी एक हाथ से नहीं बजती है। चीन को भी यह समझना होगा कि उसका हित भी भारत के साथ अच्छे संबंध रखने में ही है।

अभी चीनी उत्पादों का सबसे बड़ा बाज़ार अगर कोई है तो वह अमेरिका है। अमेरिका चीन का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है और चीन हर साल अमेरिका को तकरीबन 480 बिलियन डॉलर का निर्यात करता है। यह उसके कुल एक्स्पोर्ट्स का लगभग 20 प्रतिशत है। इसके अलावा चीन में बने समान को इम्पोर्ट करने के मामले में भारत विश्व में सातवें नंबर पर आता है, जो लगभग हर साल चीन से लगभग 80 बिलियन डॉलर के समान को आयात करता है।

हालांकि, ट्रम्प प्रशासन आने के बाद चीन को अमेरिका से व्यापार करने में भारी मुसीबतों का सामना करना पड़ रहा है। अमेरिका ने चीन से आयात होने वाले सामान पर भारी टैक्स लगा दिया है जिसकी वज़ह से अमेरिका में चीन में बने समान महंगे हो गए है और चीन की कंपनियों को दूसरे देशों की कंपनियों से मुक़ाबला करने में परेशानी हो रही है। इसकी वजह से चीन की कंपनियों को बड़ा नुकसान झेलना पड़ रहा है। अमेरिका के बाद अब भारत ही ऐसा एक राष्ट्र है जहां चीन अपने व्यापारिक रिश्तों को और मजबूत कर सकता है, क्योंकि भारत 133 करोड़ लोगों का देश है जो कि दुनिया के सबसे बड़े बाज़ारों में से एक है। ऐसे में चीन इस बात को समझ चुका है कि पाकिस्तान के साथ रहके उसका कुछ नहीं होने वाला और उसकी भलाई भारत के साथ रिश्तों को मजबूत करने में ही है। इसके अलावा सैन्य, आर्थिक और राजनीतिक स्तर पर पाक, भारत के सामने कहीं नहीं ठहरता। ऐसे में कोई भी देश पाकिस्तान की खातिर भारत के साथ अपने रिश्तों के साथ समझौता नहीं करना चाहेगा और चीन को भी यह बात अब भली-भांति समझ में आ चुकी है।

Tags: कश्मीरचीनभारत
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