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हॉन्ग कॉन्ग, दक्षिण चीन सागर, लद्दाख- कोरोना काल में जिनपिंग ने अपनी गुंडई से चीन विरोधी आवाज दबाने का हर ट्रिक आजमा रहा

Abhinav Kumar द्वारा Abhinav Kumar
22 May 2020
in मत
शी जिनपिंग
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चीन लंबे समय से हाँग काँग के लोकतंत्र समर्थकों पर अत्याचार करता आया है। चीन ने इन लोकतंत्र समर्थकों की आवाज को पूरी तरह से समाप्त करने का निर्णय ले लिया है। शी जिनपिंग की सरकार अब एक नए कानून को लाने जा रही है जिसके बाद वह देश द्रोह जैसे मामले से और सख्ती से निपटेगी साथ ही साथ हाँग काँग में हो रहे हिंसक प्रदर्शन को दबाने के लिए और ज्यादा अधिकार प्राप्त हो जाएंगे।

चीन और लोकतंत्र को एक दूसरे का विपरीतार्थक शब्द अगर कहा जाए तो इसमें कोई समस्या नहीं होगी। चीन की कम्युनिस्ट सरकार न सिर्फ लोकतंत्र का गला घोटने में माहिर है, बल्कि अपने विरोधियों को भी समाप्त करने में सबसे आगे है। शी जिनपिंग भी उसी विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं और अपने खिलाफ उठने वाले सभी विरोधी स्वरों को कुचल देना चाहते हैं।

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दरअसल, वर्ष 2019 में हाँग काँग में लोकतंत्र की मांग के साथ ही वहां चीन से आजादी की मांग ने जोर पकड़ा था। हालात को काबू में करने के लिए चीन को वहां पर सैनिक सड़कों पर उतारने पड़े थे। अब फिर से यह आंदोलन ज़ोर पकड़ने लगा है और इसे कुचलने के लिए शी जिनपिंग राष्ट्रीय सुरक्षा कानून पारित कराने वाले हैं।

ये कानून देशद्रोह, अलगाव और तोड़फोड़ रोकने की आड़ लेकर लाया जा रहा है लेकिन इसका वास्तविक मकसद कुछ और है। हाँग काँग के लोकतंत्र समर्थकों का कहना है कि चीन इस कानून का सहारा लेकर उनकी आवाज खत्म कर देना चाहता है।

हाँग काँग के लोकतंत्र समर्थक लेजिस्लेटर Dennis Kwok ने कहा है कि इस कानून के साथ हाँग काँग का अस्तित्व खत्म हो जाएगा। साल 2003 में एक बार इसे लागू करने की कोशिश की गई थी लेकिन तब हाँग काँग में 5 लाख लोग विरोध में सड़क पर आ गए थे। हांगकांग के मिनी constitution में अनुच्छेद 23 के तहत लिखा है कि चीनी सरकार अपने खिलाफ देशद्रोह, अलगाव, तोड़फोड़ को रोकने के लिए इस तरह के कानून को बना सकती है। लेकिन ये आर्टिकल हाँग काँग में कभी लागू नहीं किया गया क्योंकि लोगों को भय था कि इसे लागू करते ही उनकी स्वायत्ता खत्म हो जाएगी। अब फिर से चीन इसे पारित करने जा रहा है इसका यह मतलब होगा कि इस आर्टिकल के आधार पर चीन अपनी मनमानी कार्रवाई को अंजाम दे सकेगा और लोकतंत्र के समर्थकों की आवाज को कुचलने के लिए शी जिनपिंग कुछ भी करेंगे।

चीन के इस कदम को वैश्विक स्तर पर कड़ी आलोचना का सामना करना पड़ रहा है पर शी जिनपिंग आलोचना को सुनना नहीं, बल्कि उसे दबाने में विश्वास रखते हैं। हाँग काँग के आखिरी ब्रिटिश गवर्नर क्रिस पैटन ने चीन के इस कदम को “शहर की स्वायत्तता पर व्यापक हमला” बताया है तो वहीं, अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने कहा कि अगर बीजिंग इन प्रस्तावों को आगे बढ़ाता है तो अमेरिका कड़ाई से प्रतिक्रिया देगा।

चीन का यह नया कदम ऐसे समय में आया है जब पूरी दुनिया कोरोना से त्रस्त है और साथ में दक्षिण चीन सागर और पूर्वी चीन सागर में तनाव बढ़ा हुआ है।

चीन अपने विरोध को सिर्फ अपने देश में ही नहीं कुचलना चाहता बल्कि वह वैश्विक स्तर पर ऐसा कर रहा है। चीन ने अपने कई Vessel की मदद से पूर्वी चीन सागर और दक्षिण चीन सागर के अन्य देशों जैसे जापान और वियतनाम के Exclusive Economic Zones और क्षेत्रीय जल में घुसपैठ कर उन पर विरोध न करने का दबाव बना रहा है। चीनी नेवी पिछले कुछ समय से मलेशिया के इलाके में भी घुसपैठ करने की कोशिश कर रही है। यही नहीं कुछ दिनों पहले चीन ने फिलीपींस के अधिकार क्षेत्र में आने वाले हिस्से को अपने हैनान प्रांत का जिला घोषित कर दिया था। ताइवान के प्रति चीन की मानसिकता से तो पूरा विश्व वाकिफ है। यानि कुल मिला कर देखा जाए तो शी जिनपिंग इस क्षेत्र से अपने खिलाफ उठने वाली आवाज को डरा धमका कर चुप करा देना चाहते हैं।
कोरोना के बाद से ही चीन के खिलाफ पूरे विश्व में विरोधी स्वर बढ़ने लगे थे उसी से तिलमिला कर शी जिनपिंग ने अन्य देशों को इस तरह से डराने की कोशिश की।

शी जिनपिंग सिर्फ south china sea तक ही सीमित नहीं रहे, बल्कि बढ़ते हुए ऑस्ट्रेलिया की आवाज भी दबाने की कोशिश की। कोरोना के मामले पर चीन के खिलाफ स्वतंत्र जांच की मांग करने वाले देशों में ऑस्ट्रेलिया सबसे प्रखर था। पहले तो चीन ने आर्थिक प्रतिबंधों की धमकी दे कर ऑस्ट्रेलिया को चुप कराने की कोशिश की लेकिन जब शी जिनपिंग ने देखा कि यह देश चुप नहीं होने वाला है तो उन्होंने ऑस्ट्रेलिया से आने वाले जौ पर इम्पोर्ट ड्यूटी बढ़ा दिया और फिर अन्य उत्पादों पर भी इसी प्रकार की कर्रवाई की धमकी दी है।

इसके बाद चीन ने भारत को भी WHA में विरोधी स्वर अपनाने से रोकने के लिए बार्डर पर दबाव बनाना शुरू किया था। सिक्किम और लद्दाख दोनों क्षेत्रों में चीन ने आक्रामकता दिखाई थी जिसका जवाब भारतीय सेना ने उसी के अंदाज में दिया जिससे चीन की PLA को पीछे हटना पड़ा। यहाँ पर भी चीन का एक ही मकसद था और वह विरोधी स्वर को कुचलने का था।

कोरोना के कारण चीन में लगाए गए लॉक डाउन से भी जिनपिंग के खिलाफ माहौल बनना शुरू हो चुका था और लोग सड़क पर उत्तरने लगे थे। उसी विरोध को दबाने के लिए उन्होंने चाल चलते हुए भारत के साथ बार्डर पर तनाव बढ़ाया जिससे चीन में चीनी राष्ट्रवादी भावना बढ़े और उनके खिलाफ बढ़ रहा विरोध भारत तथा अन्य देशों के खिलाफ भावना में बदल जाए।

चीन की एक-पार्टी प्रणाली में किसी भी प्रकार के विरोध या आलोचना की अनुमति नहीं होती है, लेकिन कोरोना के कारण पनपे विरोध को शी जिनपिंग महसूस कर सकते हैं  इसी कारण से वे इन विरोधो को दबाने का भरपूर प्रयास कर रहे हैं।

यह स्पष्ट है कि कोरोनावायरस महामारी के कारण चीन और CCP में शी जिनपिंग की लोकप्रियता और स्थिति को भयंकर झटका लगा है। इसीलिए वे इन असंतोष को शांत करने के लिए अन्य साधनों के माध्यम से ध्यान भटकना चाहते है जिससे उनके खिलाफ विरोध समाप्त हो जाए। समुद्री विवाद हो या भारत के साथ सीमा तनाव है या फिर हाँग काँग में स्वायत्तता समाप्त करना हो यह सब शी जिनपिंग चीन में अपने खिलाफ बढ़ रहे विरोध को दबाने के लिए कर रहे हैं।

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