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टेलीकॉम के बाद अब बिजली सेक्टर में क्रांति लाएगी मोदी सरकार, मानसून सत्र में पेश होगा बिल

केवल एक-दो सरकारी कंपनियाँ नहीं, बिजली क्षेत्र में निजी खिलाड़ी भी उतरेंगे!

Abhinav Kumar द्वारा Abhinav Kumar
14 July 2021
in समीक्षा
बिजली संशोधन विधेयक
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संसद के आगामी मानसून सत्र में केंद्र ने लोकसभा में पेश किए जाने वाले 23 विधेयकों को सूचीबद्ध किया है। इनमें से छह बिल पहले ही पेश किए जा चुके हैं जबकि 17 नए होंगे। इसमें सबसे महत्वपूर्ण है बिजली (संशोधन) विधेयक, 2021। यह बिल power distribution business को लाइसेंस मुक्त करने और इस सेक्टर में टेलिकॉम सेक्टर की तरह प्रतिस्पर्धा पैदा करने का काम करेगा। यह उपभोक्ताओं को कई power distribution providers में से चयन की अनुमति देगा।

प्रस्तावित संशोधनों में हर एक आयोग में कानून की पृष्ठभूमि से एक सदस्य की नियुक्ति, बिजली के लिए अपीलीय न्यायाधिकरण (APTEL) को मजबूत करना, उपभोक्ताओं के अधिकारों और कर्तव्यों को तय करने के अलावा RPO के गैर-अनुपालन के लिए दंड भी शामिल है।

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बता दें कि, इसी वर्ष जनवरी में बिजली (संशोधन) विधेयक 2021 का एक प्रस्ताव कैबिनेट की मंजूरी के लिए भेजा गया था। यह बिजली डिस्ट्रीब्यूशन के क्षेत्र में एक बड़ा रिफॉर्म होगा। इस रिफॉर्म से उपभोक्ताओं को एक बड़ी ताकत ही नहीं मिलेगी बल्कि इस क्षेत्र में कार्य कुशलता भी बढ़ेगी।

और पढ़े: मंदिरों के 5 km के दायरे में बीफ बिक्री नहीं होगी, असम के CM हिमंता ने गौ संरक्षण विधेयक किया पेश

हालांकि, एक समस्या अवश्य होगी कि अभी इस क्षेत्र में उतने प्राइवेट प्लेयर नहीं है जिससे प्रतिस्पर्धा में कमी देखने को मिल सकती है। परंतु समय के साथ जैसे टेलीकॉम क्षेत्र में BSNL के बाद कई बड़े प्राइवेट प्लेयर्स ने निवेश किया, वैसे ही उम्मीद है कि इस क्षेत्र में भी निवेश करेंगे, जिससे प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी।

BSNL के बाद एयरटेल, वोडाफोन और फिर कुछ वर्षों बाद जियो के आने से टेलीकॉम का चेहरा ही बदल गया है। बता दें कि, 1985 में दूरसंचार विभाग (DoT) को Indian Post & Telecommunication Department से अलग कर दिया गया था।  डीओटी 1986 तक पूरे देश में दूरसंचार सेवाओं के लिए जिम्मेदार था। उसके बाद महानगर टेलीफोन निगम लिमिटेड (MTNL) और विदेश संचार निगम लिमिटेड (VSNL) को मेट्रो शहरों (दिल्ली और मुंबई) और लंबी दूरी की अंतरराष्ट्रीय दूरसंचार सेवाओं को चलाने के लिए डीओटी से अलग किया गया था।

तब टेलीफोन की मांग लगातार बढ़ रही थी और 1990 के दशक में भारत सरकार पर इस सेक्टर में निजी निवेश के लिए दबाव बढ़ रहा था।  1991 में उदारीकरण के बाद इस क्षेत्र में भी भरी बदलाव आया। Value Added Services के क्षेत्र में निजी निवेश की अनुमति दी गई और सेलुलर दूरसंचार क्षेत्र को निजी निवेश से प्रतिस्पर्धा के लिए खोल दिया गया। इसी समय नरसिम्हा राव के नेतृत्व वाली सरकार ने 1994 में राष्ट्रीय दूरसंचार नीति (NTP) की शुरुआत की, जिसने दूरसंचार बुनियादी ढांचे के स्वामित्व, सेवा और विनियमन के क्षेत्र में बदलाव किया।  धीरे-धीरे कई बदलाव आए जैसे Trai की स्थापना और BSNL में सरकार की हिस्सेदारी कम करना। मार्च 2000 के बाद, अटल सरकार ने निजी ऑपरेटरों के लिए नए द्वार खोले। सरकार ने [सेलुलर सेवा प्रदाताओं के लिए लाइसेंस शुल्क को और कम कर दिया और विदेशी कंपनियों के लिए स्वीकार्य हिस्सेदारी को बढ़ाकर 74% कर दिया।

इन सभी कारकों के कारण, सेवा शुल्क अंततः कम हो गया और कॉल की लागत में काफी कटौती की गई, जिससे भारत में हर आम मध्यम वर्गीय परिवार एक सेल फोन का खर्च उठा सके। उसके बाद कई निजी ऑपरेटरों, जैसे कि रिलायंस कम्युनिकेशंस, टाटा इंडिकॉम, वोडाफोन, लूप मोबाइल, एयरटेल, आइडिया आदि ने उच्च क्षमता वाले भारतीय दूरसंचार बाजार में सफलतापूर्वक प्रवेश किया। लोगों के पास कई विकल्प हो गए थे। इसी न सिर्फ प्रतिस्पर्धा बढ़ी बल्कि एक डिजिटल बदलाव आया।

उसी प्रकार बिजली (संशोधन) विधेयक भी अब पॉवर सेक्टर में भी क्रांतिकारी बदलाव लाने जा रहा है।

कुछ दिनों पहले पूर्व ऊर्जा मंत्री RK Singh ने कहा था कि, “हमने बिजली के वितरण को लाइसेंस मुक्त करने का प्रस्ताव रखा था।  विधेयक पर कैबिनेट नोट परिचालित किया गया था और सभी संबंधित मंत्रालयों ने इसे मंजूरी दे दी है। लेकिन कानून मंत्रालय के पास इससे जुड़े एक या दो प्रश्न हैं।”

बिजली (संशोधन) विधेयक के आने के बाद लाइसेंस लेने की आवश्यकता समाप्त हो जाएगी जिससे निजी कंपनियों के लिए बिजली वितरण के क्षेत्र में आने का मार्ग खुल जाएगा और इससे प्रतिस्पर्धा को भी बल मिलेगा। अगर देखा जाए तो इसका सीधा लाभ बिजली उपभोक्ताओं को होगा। न सिर्फ बिजली सेक्टर की कार्य कुशलता बढ़ेगी बल्कि उनके पास चुनने के लिए कई सर्विस प्रोवाइडर्स होंगे। आज के समय में कुछ सरकारी और कुछ निजी कंपनियों का ही पावर डिस्ट्रीब्यूशन के क्षेत्र में वर्चस्व है। किसी भी क्षेत्र के बिजली उपभोक्ताओं के पास भी उनके क्षेत्र में सर्विस दे रही किसी एक कंपनी से सर्विस लेने के अलावा दूसरा विकल्प नहीं होता है।

बिजली (संशोधन) विधेयक बिजली उपभोक्ताओं के अधिकारों और कर्तव्यों को भी निर्धारित करता है। पूर्व मंत्री ने आगे कहा था कि renewable purchase obligation का पालन न करने पर जुर्माना बढ़ाया जाएगा। RPO के तहत, डिस्कॉम और अन्य बड़े उपभोक्ताओं को अपने संबंधित नियामकों द्वारा निर्धारित अक्षय ऊर्जा का एक निश्चित अनुपात खरीदना होता है।  वे RPO दायित्व को पूरा करने के लिए अक्षय ऊर्जा प्रमाणपत्र भी खरीद सकते हैं।

और पढ़ें- पंजाब में बिजली संकट से घिरे उद्योगपतियों को सीएम योगी ने दिया बड़ा ऑफर

प्रस्तावित बिजली (संशोधन) विधेयक के पारित होने के बाद मौजूदा वितरण कंपनियां तो अपनी सेवाएं जारी रखेंगी ही, साथ ही साथ इस क्षेत्र में दूसरी बिजली वितरण कंपनियां भी पावर सप्लाई का बिजनेस कर सकेंगी। ऐसे में उपभोक्ताओं के पास कई सारी बिजली कंपनियों में से चुनाव करने का विकल्प होगा। यानी कुल मिला कर देखा जाए तो ये उपभोक्ताओं के लिए एक बेहतरीन खबर है। कई सर्विस प्रोवाइडर होने को स्थिति में सबसे अधिक फायदा उपभोगताओं का ही होता है।

हालांकि, एक समस्या अवश्य होगी कि अभी इस क्षेत्र में उतने प्राइवेट प्लेयर नहीं है जिससे प्रतिस्पर्धा में कमी देखने को मिल सकती है। परंतु समय के साथ जैसे टेलीकॉम क्षेत्र में BSNL के बाद कई बड़े प्राइवेट प्लेयर ने निवेश किया, वैसे ही उम्मीद है कि इस क्षेत्र में भी निवेश करेंगे जिससे प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी। BSNL के बाद एयरटेल, वोडाफोन और कुछ वर्षों के बाद फिर जियो के आने के बाद टेलीकॉम से का चेहरा ही बदल गया था।

बता दें कि 1985 में, दूरसंचार विभाग (DoT) को Indian Post & Telecommunication Department से अलग कर दिया गया था।  डीओटी 1986 तक पूरे देश में दूरसंचार सेवाओं के लिए जिम्मेदार था। उसके बाद महानगर टेलीफोन निगम लिमिटेड (एमटीएनएल) और विदेश संचार निगम लिमिटेड (वीएसएनएल) को मेट्रो शहरों (दिल्ली और मुंबई) और अंतरराष्ट्रीय लंबी दूरी की दूरसंचार सेवाओं को चलाने के लिए डीओटी से अलग किया गया था।

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