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अमेरिका की अफ़ग़ानिस्तान से वापसी पर खुश न हो पाक, Taliban अमेरिकी हथियारों का करेगा इस्तेमाल

बाइडन ने तालिबान को 'तौफा' दिया है!

Shikhar Srivastava द्वारा Shikhar Srivastava
31 August 2021
in विश्व, साउथ एशिया
अफगानिस्तान पाकिस्तान
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अमेरिका अफगानिस्तान का युद्ध हार चुका है, तालिबान के खात्मे के उद्देश्य से शुरू किए गए युद्ध का नतीजा लगभग शून्य रहा। आज तालिबान का अफगानिस्तान की जमीन पर लगभग एकछत्र राज कायम हो चुका है। पंजशीर की पहाड़ियों के अतिरिक्त अफगानिस्तान का कोई कोना ऐसा नहीं है जहां तालिबान का शासन नहीं चल रहा हो। यह सर्वविदित है कि तालिबान की जीत में पाकिस्तान की सबसे बड़ी भूमिका रही है। पाकिस्तान ने अमेरिका की गोद में बैठ कर अमेरिका के ही पैसों से तालिबान को जीवित रखने का काम किया। पाकिस्तान को उम्मीद थी कि तालिबान के सहयोग से वह अफगानिस्तान को अपने प्रभाव में बनाए रखेगा, साथ ही तालिबान कश्मीर के मुद्दे पर पाकिस्तान को सहायता प्रदान करेगा। तालिबान के जरिए भारत में आतंकवाद फैलाने का पाकिस्तान का सपना तो पूरा होता नहीं दिख रहा है उल्टे जो हालात बन रहे हैं ऐसा लगता है कि तालिबान अब अपने सदाबहार मित्र पाकिस्तान के विरुद्ध भी सशस्त्र संघर्ष छेड़ सकता है। पाकिस्तान के खिलाफ यह संघर्ष किसी और की मदद से नहीं बल्कि अमेरिका द्वारा छोड़े गए हथियारों की मदद से की जाएगी।

पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच डूरंड लाइन को लेकर पुराना सीमा विवाद है। डूरंड लाइन के दोनों और पश्तो जनजाति के लोग रहते हैं। तालिबान मुख्यतः पश्तो जनजाति के लोगों का ही संगठन है। वहीं पाकिस्तान के पश्तूनिस्तान क्षेत्र में पाकिस्तानी सरकार के विरुद्ध लंबे समय से आक्रोश पल रहा है। ऐसे में डूरंड रेखा तालिबान और पाकिस्तान के बीच टकराव का कारण बन सकती है।

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तालिबानी प्रवक्ता जबीउल्लाह मुजाहिद ने हाल ही में बयान दिया है कि पाकिस्तान ने अपने अफगानिस्तान सीमा पर बॉर्डर फेंसिंग का काम शुरू किया है जिससे तालिबान सहमत नहीं है। साथ ही तालिबान ने सत्ता में काबिज होते ही आतंकी संगठन तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान के कई प्रमुख लोगों को जेल से छोड़ दिया है। तालिबान का रवैया देखकर लगता है कि अफगान पाक सीमा विवाद अब तनाव के दौर में आने वाला है। ऐसा इसलिए क्योंकि इस्लामाबाद के अनवरत प्रयास के बाद तालिबान ने आज तक डूरंड रेखा को स्वीकार नहीं किया है।

कुछ समय पूर्व तक तालिबान अपने सशस्त्र संघर्ष को चलाने के लिए पूरी तरह से पाकिस्तान पर निर्भर था। वैसे तो तालिबान की आय का स्त्रोत अफगानिस्तान में पैदा होने वाला है अफीम था लेकिन पाकिस्तान ने भी विभिन्न माध्यमों से तालिबान की फंडिंग की थी।

किंतु अब हालात बहुत बदल चुके हैं। सबसे बड़ा बदलाव यह है कि अब तालिबान के पास 85 बिलियन डॉलर की कीमत के अमेरिकी हथियार मौजूद है। साथ ही चीन जैसी आर्थिक महाशक्ति खनिज संसाधनों के लोभ में तालिबान के साथ सहयोग करने को तैयार है। अफगानिस्तान की जमीनी सच्चाई यह है कि तालिबान को अब सत्ता से बेदखल करना लगभग असंभव हो चुका है। ऐसे में रूस, अमेरिका सहित कई अन्य देश भी तालिबान को सहयोग को आतुर हैं। अब तालिबान को पाकिस्तान की आवश्यकता नहीं रह गई है।

Following the complete withdrawal of US troops from Afghanistan, video shows Taliban fighters entering a hangar at the Kabul airport and examining what was left behind by the US military https://t.co/E0xphBHi7D pic.twitter.com/fuiofJhYsc

— CNN (@CNN) August 31, 2021

कई मीडिया रिपोर्ट यहां तक दावा कर रही है कि अमेरिका ने तालिबान से किसी गुप्त समझौते के कारण जानबूझकर अपने हथियारों का जखीरा अफगानिस्तान की भूमि पर छोड़ा है। इस बात में सच्चाई इसलिए भी दिखती है क्योंकि CIA जैसा गुप्तचर विभाग इतनी भारी भूल नहीं करेगा। आज तालिबान के पास 75,000 के लगभग सैन्य गाड़ियां हैं, जिनमें ट्रक, आर्मर्ड व्हिहिकल, एन्टीमाइन गाड़ियां  भी शामिल हैं। 200 से अधिक एरोप्लेन और हेलीकॉप्टर तालिबान के कब्जे में है जिनमें 85% ब्लैक हॉक हेलीकॉप्टर हैं, जिसे अमेरिका का सर्वश्रेष्ठ हेलीकॉप्टर माना जाता है। इसके अतिरिक्त 6 लाख से अधिक मशीनगन और पिस्टल जैसे स्मॉल आर्म तालिबान के कब्जे में हैं। नाइटविजन कैमरा, बुलेट प्रूफ जैकेट, स्नाइपरराइफल, कल्पना करें कि इन हथियारों के साथ तालिबान कितना घातक संगठन बन गया है। ऐसे में पाकिस्तान के लिए यह संभव ही नहीं है कि वह चाह कर भी डूरंड रेखा पर अपनी मनमानी कर सके।

इस समय पाकिस्तानी सरकार और इमरान खान की पार्टी तालिबान की जीत पर फूले नहीं समा रहे हैं। इमरान खान सरकार को लगता है कि यह उनकी कूटनीतिक विजय है। किंतु, वह यह नहीं समझ पा रहे कि तालिबान उन्हें कई तरह से नुकसान पहुंचा सकता है। पश्तूनिस्तान के मुद्दे के अतिरिक्त पाकिस्तान में वहाबी विचारधारा का जैसा प्रभाव है, ऐसे में तालिबान को आदर्श मानकर पाकिस्तान में भी सरकार के खिलाफ तख्तापलट के लिए सशस्त्र संघर्ष कर सकता है।

तालिबान का जन्म पाकिस्तानी मदरसों में हुआ है। अमेरिका की अफगानिस्तान में प्रवेश से पूर्व दोनों के बीच बहुत ही अच्छे संबंध थे। किंतु, जब पाकिस्तान ने अमेरिका के दबाव में तालिबान के विरुद्ध सैन्य कार्रवाई शुरू की तो तालिबान ने पाकिस्तान में भी आतंकी हमले शुरू कर दिए थे। 2014 में पेशावर के सैनिक स्कूल में हुआ भयावह आतंकी हमला, जिसमें तीन चार साल के बच्चों की भी हत्या की गई थी, यह तालिबान का पाकिस्तान को जवाब था। इस आतंकी हमले के पीछे तहरीक-ए-तालिबान-पाकिस्तान का हाथ था जिसे अफगानिस्तानी तालिबान ने ही बनाया है।

इसी वर्ष मार्च महीने में अफगानी सुरक्षाबलों पर तालिबान की ओर से एक आतंकी हमला किया गया था। इस हमले को टीटीपी ने अंजाम दिया था। यह स्पष्ट है कि तालिबान और टीटीपी अब भी साथ मिलकर काम कर रहे हैं।

पाकिस्तानी अखबार द डॉन में छपे एक लेख में एक घटना के बारे में बताया गया है। तालिबानी सरगना मुल्लाहमोहम्मद ओमर ने पूर्व पाकिस्तानी जनरल और राजनेता नसरुल्लाह बाबर को भोजन पर आमंत्रित किया था। इसी दौरान जब बाबर ने ओमार से कहा कि तालिबान को डूरंड लाइन को स्वीकार कर लेना चाहिए जिससे सभी समस्याएं खत्म हो जाएंगी तो इसे लेकर ओमार इतना नाराज हुआ कि उसने बाबर को भोजन के बीच में ही निकल जाने को कह दिया। इतना ही नहीं हो ओमर ने बाबर को, जो खुद भी एक पश्तो है, उसे पश्तो लोगों की भावनाओं का सम्मान न करने के कारण गद्दार तक कह दिया।

बता दें कि पेशावर लंबे समय तक अफगानिस्तान की राजधानी रहा था। तालिबान एक आतंकी संगठन है लेकिन उसका गठन कट्टरपंथी इस्लाम और अफगानी राष्ट्रवाद की भावना से हुआ है। यही कारण है कि तालिबान को इतना व्यापक समर्थन मिलता है। तालिबान ने पहले रूसी आक्रमण के विरुद्ध सशस्त्र संघर्ष किया था। अब अमेरिका को भी पीछे हटने पर मजबूर किया है। ऐसे में पाकिस्तान का अफगानी राष्ट्रवादी भावना से टकराव तालिबान को उसके विरुद्ध भी सशस्त्र संघर्ष करने के लिए प्रेरित कर सकता है। इस्लामाबाद ने पहले ही अफगान तालिबान को नियंत्रण में रखने के लिए अमेरिकियों को अपनी सीमाओं के भीतर शिविर लगाने की अनुमति देने से इनकार कर दिया है। इस क्षेत्र में शक्ति शून्य होने के साथ, अफगान तालिबान और पाकिस्तान तालिबान दोनों निश्चित रूप से यह सुनिश्चित करेंगे कि पाकिस्तान  को सबसे अधिक नुकसान हो। अमेरिका से मिले हथियार से वह पहले ही ताकतवर हो चुका है तथा अब पाकिस्तान अपनी रक्षा भी नहीं कर पाएगा। वहीं टीटीपी को अफगानिस्तान में खुलकर काम करने का मौका मिल गया है, जल्दी ऐसा हो सकता है कि तालिबान और पाकिस्तान भी सैन्य टकराव में उलझ जाएं।

 

Tags: अमेरिकाडूरंड लाइनतालिबानपाकिस्तान
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