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भारत ने भारी-भरकम FDI के साथ वैश्विक रेटिंग एजेंसियों के मिथक को तोड़ दिया है

Yashwant Singh द्वारा Yashwant Singh
27 September 2021
in अर्थव्यवस्था
भारत में निवेश
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पूर्व में भारत के राजनेताओं ने पश्चिमी देशों को भारत की गरीबी और उसकी अविकसित काया को ही सबसे ऊपर दिखाया है। भारत के विकास की बजाय यहाँ की गरीबी और घटिया मेडिकल सिस्टम से लेकर बीमारू जनता और खराब बुनियादी ढांचे को बेचा है। इन्हीं कारणों से आज भी कई देश भारत की छवि दुनियाभर में ‘एक गरीब’ देश की तरह ही देखते हैं। यही कारण है कि अर्थव्यवस्था को लेकर और निवेश को लेकर रेटिंग के मामले में कई रेटिंग एजेंसियां पक्षपाती रुख रखती हैं। हालांकि, मोदी सरकार ने अब अपने शासनकाल में इसे बदला है और आज कृषि से लेकर निवेश तक भारत की छवि बदल रही है।भारत में भर-भरकर विदेश निवेश आ रहा है और अब जल्द ही भारत सरकार अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसी मूडीज इन्वेस्टर्स सर्विस से रेटिंग अपग्रेड की मांग भी कर सकती है।

वास्तव में भारत ने इन रेटिंग एजेंसियों द्वारा फैलाया गया जो मिथक था, वो तोड़ दिया है। भारत की रेटिंग में कटौती करते हुए, अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसी मूडीज ने लंबे समय तक आर्थिक मंदी और इसकी बिगड़ती वित्तीय स्थिति को संबोधित करने में नीतिगत चुनौतियों का हवाला दिया था। ऐसे ही Fitch ने भी भारत की रेटिंग को घटा दिया था। ये केवल एक रेटिंग एजेंसी की बात नहीं है, बल्कि ऐसी कई हैं जो भारत को रेटिंग देने के मामले में पक्षपाती रही हैं। हालांकि, इसके बावजूद भारत में विदेशी निवेश में कोई कमी नहीं रही हैं।

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कम रेटिंग्स के बावजूद भारत में सितंबर महीने यानी सितम्बर में कुल 21 हजार करोड़ से ज्यादा निवेश आकर्षित करने में सफल रहा है। डिपॉजिटरी के आंकड़ों के मुताबिक, विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) ने इक्विटी में 13,536 करोड़ रुपये और ऋण सेगमेंट में 8,339 करोड़ रुपये का निवेश किया है। इसके परिणामस्वरूप 1 सितंबर से 24 सितंबर की अवधि के बीच भारत के पूंजी बाजार में 21,875 करोड़ रुपये का शुद्ध निवेश हुआ। यह सिर्फ इस महीने की कहानी नहीं है, विदेशी निवेशकों ने पिछले महीने भी 16,459 करोड़ रुपये का निवेश किया था। जून में भी भारत का विदेशी निवेश उच्चतम स्तर पर था।

आकंड़ों की मानें तो कोरोनावायरस (COVID-19) महामारी के प्रभावों के बावजूद, वित्तीय वर्ष 2021 के दौरान भारत में कुल प्रत्यक्ष विदेशी निवेश लगभग 82 बिलियन अमेरिकी डॉलर की नई ऊंचाई पर पहुंच गया, जो पिछले वित्त वर्ष 2019-20 में आकर्षित किए गए कुल एफडीआई (74.39 अरब अमेरिकी डॉलर) की तुलना में 10 प्रतिशत अधिक है। वित्त वर्ष की पहली तिमाही में ऑटोमोबाइल सेक्टर में सबसे ज्यादा निवेश देखने को मिला था। ‘कंप्यूटर सॉफ्टवेयर और हार्डवेयर’ वित्त वर्ष 2020-21 के दौरान कुल एफडीआई इक्विटी प्रवाह में लगभग 44% हिस्सेदारी के साथ शीर्ष सेक्‍टर के रूप में उभर कर सामने आया है। इसके बाद क्रमश: निर्माण (इन्फ्रास्ट्रक्चर या अवसंरचना) गतिविधियों (13%) और सेवा क्षेत्र या सर्विस सेक्‍टर (8%) का नंबर आता है।

सवाल यह है कि एक तरफ भारत को लेकर रेटिंग कम है, और दूसरी तरफ ताबड़तोड़ निवेश है, इसका कारण क्या हो सकता है?

इससे पहले उस पहलू पर जाएं, हम कुछ महत्वपूर्ण एजेंसियों के डेटा और रेटिंग को बताते हैं। मूडीज दुनिया की प्रमुख रेटिंग एजेंसियों में से एक है। 2020 में इस एजेंसी ने भारत को BAA3 रेटिंग प्रदान किया था। फिच रेटिंग्स ने सार्वजनिक ऋण अनुपात में वृद्धि और ऋण चुकाने पर अनिश्चितता के कारण नकारात्मक दृष्टिकोण के साथ भारत की रेटिंग को BBB पर अपरिवर्तित रखा है। इस साल अप्रैल से इस रेटिंग में कोई बदलाव नहीं हुआ है। हालांकि एजेंसी ने प्रत्यक्ष विदेशी निवेश, निजीकरण, राष्ट्रीय मुद्रीकरण पाइपलाइन और श्रम और कृषि क्षेत्रों के लिए सुधारों को आकर्षित करने के लिए उत्पादन से जुड़ी प्रोत्साहन योजना सहित भारत सरकार द्वारा घोषित सुधारों का उल्लेख किया है।

इसके अलावा जुलाई में मशहूर रेटिंग एजेंसी S&P ने भारत को BBB रेटिंग दे रखी है और यह बताया है कि स्थिर परिणाम आ सकते हैं। रेटिंग एजेंसी के विश्लेषकों ने लिखा, “स्थिर दृष्टिकोण हमारी उम्मीद को दर्शाता है कि भारत की अर्थव्यवस्था COVID-19 महामारी के बाद ठीक हो जाएगी।”

S&P ने आगे कहा, हालांकि देश की रेटिंग कम हो सकती है अगर अर्थव्यवस्था वित्तीय वर्ष 2021/22 में अपेक्षा से काफी धीमी गति से बढ़ोतरी होती है।

अब कम रेटिंग के बावजूद निवेशकों की पंसद भारत क्यों है ?

FDI देश की अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण चालक है क्योंकि वे नौकरी को बढ़ावा देते हैं। बाजार, तकनीकी और गैर-ऋण वित्तीय संसाधन प्रदान करते हैं, लेकिन इन एजेंसियों की एक कमजोरी है। ये पूर्वाग्रह से ग्रसित होती हैं। रेटिंग एजेंसियां सरकारी सिफारिशों पर नहीं चलती हैं। हालांकि, सरकार की ओर से सक्रिय प्रयास से और आंकड़ो से मूडीज और अन्य एजेंसियां को निर्णय लेने में मदद मिलती है लेकिन वह अंतिम निर्णय अपना घाटा-मुनाफा नाप तौल कर अपने अनुसार लेते हैं।

अंतरराष्ट्रीय वित्तीय व्यवस्था में सितंबर 2008 में आए भूचाल से पहले इन्हीं अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों ने लेहमन ब्रदर्स, एआईजी समेत बड़ी कम्पनियों को बढ़िया रेटिंग दी थी। इसके बावजूद 14 सितंबर 2008 की देर रात लेहमन ब्रदर्स दिवालिया घोषित होने वाली सबसे बड़ी अमेरिकी कंपनी बन गई। स्पष्ट है इन ऐजेंसियों को इस कंपनी की क्षमता का कोई अंदाजा नहीं था। लेहमन ब्रदर्स के पतन के बाद वैश्विक वित्त व्यवस्था ने एक अनिश्चित राह पकड़ ली, और साल भर बाद भी संकट के बादल नहीं छँटे सके। हालांकि तब भी निर्यात गिरने और विकास दर घटने के बावजूद भारत पर इसका उतना बुरा असर नहीं पड़ा।

लेहमन ब्रदर्स के पतन के बाद तो रेटिंग एजेंसियों पर दुनिया भर में बांड बाजार संकट के कारण दबाव बनने लगा था, जहां उनकी विश्वसनीयता पर सवाल तक उठाए गये थे, क्योंकि कुछ डिफॉल्टर कंपनियों ने अपने ऋण चुकौती को पूरा करने में विफल होने से पहले शीर्ष ग्रेड प्राप्त किया था।

TFI ने पहले भी बताया है कि दूसरे आर्थिक सर्वेक्षण में यह कहा जाता है कि भारत और चीन जैसे देशों में विकास की उच्च दर को देखते हुए बहुत अधिक ऋण चुकौती क्षमता है, लेकिन क्रेडिट रेटिंग एजेंसियां, जिनमें से अधिकांश विकसित बाजारों में स्थित हैं, विकासशील देशों के खिलाफ पूर्वाग्रह से ग्रसित हैं और ऐसे देशों को कम रेटिंग देती हैं। हालांकि, निवेशक पूर्वाग्रह से पीड़ित नहीं होता है। वह प्रैक्टिकल निर्णय लेता है। उसे फर्क इस बात से पड़ता है कि उसके द्वारा निवेश किये गये धन पर ज्यादा मुनाफा कैसे प्राप्त होगा और यदि घाटा हुआ भी तो वो बड़ा न हो।

भारत सरकार जिस तरह से मेक इन इंडिया के तहत कृषि से लेकर स्वास्थ्य क्षेत्र, निजी क्षेत्र, शिक्षा, यातायात को बढ़ावा दे रही है और स्टार्टअपस को मौका दे रहा वो पूरी दुनिया देख रही है। PLI स्कीम, रेट्रो टैक्स को खत्म करने जैसे बड़े निर्णय कई बड़े निवेशकों को आकर्षित कर रही है। वास्तव में वर्तमान सरकार भारत की मूल ताकत को एक सीढ़ी और उपर ले गई है।

भारत की बढ़ती खपत और भारत विनिर्माण इकाइयों में होने वाले बदलाव भी निवेशकों को आकर्षित कर रहे हैं। भारत में वैक्सीनेशन की सफलता भी इसका बड़ा कारण है।

सच कहें तो अमेरिका के न्यूयॉर्क में बैठकर एजेंसियों को दुनिया के बाकि देश गरीब लगते हों, लेकिन हकीकत यह है कि कई बार गलत साबित हो जाने के बाद ऐसी रेटिंग एजेंसियों की प्रासंगिकता एकदम खत्म हो गई है। भारत में बढ़ता निवेश तो इसी तरफ इशारा कर रहा है।

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