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Sensex को वास्तव में किसने मजबूत किया?

Abhinav Kumar द्वारा Abhinav Kumar
26 September 2021
in Uncategorized
Sensex को वास्तव में किसने मजबूत किया?
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भारत का स्टॉक एक्सचेंज रिकॉर्ड ऊंचाई पर बना हुआ है और अगर यह कहा जाए कि यह सब मोदी सरकार के दूरदर्शी दृष्टिकोण के कारण हुआ है तो यह गलत नहीं है। ओलंपिक खत्म हो सकता है, लेकिन भारत का Sensex स्टॉक इंडेक्स रोज स्प्रिंट के नए रिकॉर्ड स्थापित कर रहा है। शुक्रवार (24 सितंबर) को सेंसेक्स ने ऐतिहासिक 60,000 का रिकॉर्ड बनाया। Sensex 448 अंक चढ़कर 60,333 के रिकॉर्ड उच्च स्तर पर पहुंच गया, जबकि निफ्टी 50 ने 17,947.65 के सर्वकालिक उच्च स्तर पर पहुंचा। यह भी ध्यान देने योग्य है कि भारत अब दुनिया का छठा सबसे बड़ा शेयर बाजार है, जिसने बाजार पूंजीकरण में पहली बार फ्रांस को पछाड़ दिया है।

ऐतिहासिक Sensex की बढ़त से उन अर्थशास्त्रियों और लिबरल पत्रकारों की भी याद आती है, जिन्होंने दावा किया था कि अगर मोदी सरकार सत्ता में आती है अर्थव्यवस्था की कयामत निश्चित है या फिर यह दावा किया था कि अगर कोई अर्थशास्त्री देश छोड़ देता है तो भारत के लिए भविष्य अंधकारमय हो जाएगा। यहाँ अर्थशास्त्री का अर्थ रघुराम राजन से था जिन्हें लिबरल जमात ने अपनी पलकों पर बैठा कर रखा था।

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वामपंथियों की रघुराम राजन को Sensex को मजबूत करने का श्रेय 

2013 में, MenxXP, जो की Wokes के प्रिय प्रकाशनों में से एक है, उसने एक लेख प्रकाशित किया जिसका शीर्षक था “रघुराम राजन – सेंसेक्स में सेक्स को वापस लाने वाला आदमी” और उन्हें देश के आर्थिक मसीहा के रूप में करार दिया। इस लेख ने आरबीआई के पूर्व गवर्नर को देश को आर्थिक समृद्धि के यूटोपियन दुनिया में ले जाने की भविष्यवाणी के रूप में चित्रित किया।

13 सितंबर 2013 को इकॉनोमिक टाइम्स में वरिष्ठ पत्रकार शोभा डे का एक लेख छपा। इस लेख में अर्थशास्त्री रघुराम राजन के अर्थशास्त्रीय समझ के बजाए उनके कामोत्तेजक शारीरिक संरचना के बारे में बात की गई थी। इतना ही नहीं, उन्होंने रघुराम राजन के कामोत्तेजक शारीरिक संरचना को सेंसेक्स और भारतीय अर्थव्यवस्था के प्रगति से भी जोड़ने की कोशिश की थी। व्यक्तिक महिमामंडन और वामपंथी चाटुकारिता का यह अपना ही वैज्ञानिक आधार था जिसने शारीरिक कामोत्तेजक संरचना को अर्थव्यवस्था की प्रगति से जोड़ दिया।

रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के नए मुखिया को इस पद पर आए अभी कुछ ही हफ्ते हुए थे लेकिन तब तक रघुराम राजन के लुक्स की उतनी ही चर्चा हो चुकी थी जितनी उनकी आर्थिक विचारधारा की। उन्हें सार्वजनिक जीवन में एक अच्छे दिखने वाले गुरु एवं एक मौद्रिक जेम्स बॉन्ड के रूप में सम्मानित किया गया, जिन्होंने “सेक्स अपील” को भारत के शेयर बाजार सेंसेक्स में वापस प्रभाव में ला दिया था।

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नागरिकों की समझ और वैचारिक नेतृत्व ही लोकतांत्रिक उत्कर्ष का आधार है, लेकिन तथाकथित पत्रकारों का वैचारिक नेतृत्व देखिए। अर्थशास्त्र की समझ और अर्थशास्त्री के सफलताओं और आलोचना से परे समाज को एक व्यक्ति के कामुकता के प्रति केंद्रित कर दिया। अन्य लोग टिप्पणी करने लगे कि कैसे श्री राजन सौंदर्य के कारण 50 वर्षीय होने के बावजूद भी अल्पायु लगते हैं।

धन्य है जनता जनार्दन और धन्य है पत्रकार! बधाई और शुभकामनाओं का दौर शुरू हो गया। हे भारत के भाग्य विधाता!! अगर चलचित्र नायक श्री रघुराम राजन को उनके कामोत्तेजक शारीरिक संरचना हेतु बधाई दे दिया हो तो अब अर्थशास्त्री रघुराम राजन से देश की अर्थव्यवस्था को फिर से जीवंत करने की कार्य-योजना, बढ़ती कीमतों, एक अस्थिर मुद्रा और घटती वृद्धि के के बारे में प्रश्न पूछने का कष्ट करें। शोभा डे और इकॉनोमिक टाइम्स का तो पता नहीं परंतु हमारा उद्देश्य तो सही समाचार से सत्य और समझ को विकसित कर अपने पाठकों तक पहुंचाना है, जिससे वो राष्ट्र निर्माण के संसाधन बनें और देश के लोकतांत्रिक ध्वज को सदैव उत्कर्ष पर रखें।

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गवर्नर के रुप में उपयुक्त नहीं थी राजन की नीतियां

रघुराम राजन ने एक बड़ी गलती की थी। खासकर राजनीतिक मामलों पर वह आलोचना के लिए सत्तारूढ़ राजनीतिक व्यवस्था के सहिष्णुता स्तर की थाह लेने में विफल रहे। राजन हमेशा शिकागो के प्रोफेसर या IMF के मुख्य अर्थशास्त्री की मानसिकता में थे, जब उन्होंने नॉर्थ ब्लॉक में एक संक्षिप्त कार्यकाल के बाद सितंबर 2013 से RBI गवर्नर की टोपी पहने हुए भारत के सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्य के मुद्दों पर भारत की नीतियों की आलोचना की। लेकिन उनके दीक्षांत समारोह के व्याख़्यानों ने अक्सर सरकारी नीतियों और अर्थव्यवस्था की वास्तविक स्थिति, सहिष्णुता की आवश्यकता, मेक इन इंडिया जैसी सरकार की प्रमुख योजनाओं की आलोचना और रोलआउट की गति जैसे कई मुद्दों पर भारी और गुप्त आलोचना का रूप ले लिया। वे जन-धन योजना के भी मुखर आलोचक थे, जबकि यह योजना एक अप्रत्याशित सफलता साबित हुई। जैसे ही राजन ने अपना कर्तव्य पालन और प्रोटोकॉल छोड़ राजनीतिक मुद्दों पर टिप्पणी करना शुरू किया उनके और सरकार के बीच अनबन शुरू हो गई।

मोदी सरकार के कुछ वर्गों ने महसूस किया कि राजन एक महान अर्थशास्त्री हो सकते हैं लेकिन आरबीआई गवर्नर के रूप में उनकी नीतियां भारत के लिए उपयुक्त नहीं थीं। जिसमें अचानक बड़े पैमाने पर खराब ऋण को साफ करने की कवायद भी शामिल थी। इसके अलावा सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का पुनः पूंजीकरण के लिए आरबीआई के धन के उपयोग पर आरबीआई और सरकार के बीच कलह भी एक प्रमुख कारण था। द टाइम ऑफ इंडिया की रिपोर्ट कहती है की राजन का रवैया अधिक ‘दोस्ताना’ होता तो सरकार सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के पुनर्पूंजीकरण के लिए केंद्रीय बैंक के धन का दोहन और अधिक सुचारू रूप से कर सकती थी।

RBI की कुल संपत्ति का 32 प्रतिशत इक्विटी हिस्सा है और सरकार इस फंड का उपयोग सरकारी बैंकों की जर्जर बैलेंस शीट को उबारने के लिए आकस्मिक धन, पूंजी और प्रतिधारित आय को सुधारने के लिए करना चाहती थी। रघुराम राजन को इस कदम से आपत्ति थी, क्योंकि उनका मानना है कि केंद्रीय बैंक के पास आकस्मिक धन का एक मजबूत कोष लंबी अवधि में देश के लिए महत्वपूर्ण है। इससे भी अधिक महत्वपूर्ण इन निधियों को सरकारी बैंकों में डालना दीर्घावधि में एक खतरनाक विचार साबित हो सकता है। उनका मानना था कि उधारदाताओं के मुद्दे, परिचालन अक्षमता के कारण अधिक हैं, न कि केवल पूंजी की कमी के कारण। सरकार को इसके बजाय इन बैंकों का निजीकरण करना चाहिए और उन्हें मुक्त बाजार में प्रतिस्पर्धा करने देना चाहिए।

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एक विफल गवर्नर साबित हुए रघुराम राजन

रघुराम राजन एक महान अर्थशास्त्री थे। वह अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के अध्यक्ष थे। राजन शिकागो यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर भी थे, इस बात में कोई संशय नहीं है। लेकिन अगर भारत के परिपेक्ष में देखा जाए तो रघुराम राजन पूर्ण रूप से एक विफल गवर्नर साबित हुए। हमारे इस विचार का प्रमाणित आधार भी है। मोदी सरकार के नेतृत्व में देश ने जो आर्थिक प्रगति की है वह अभूतपूर्व है, अतुलनीय है, अद्वितीय है। सरकार ने रघुराम राजन के सलाह से अलग रिजर्व बैंक की संचित निधि का सफलतापूर्वक उपयोग भी किया। अप्रत्यक्ष कर वस्तु और सेवा कर सरकार का एक क्रांतिकारी आर्थिक निर्णय रहा।

मोदी सरकार ने Reform पर ध्यान दिया आंकड़ों पर नहीं

आत्मनिर्भर भारत, मेक इन इंडिया, ऊर्जा निवेश, एनपीए में कमी, कृषि निर्यात में सुधार, सेंसेक्स में उछाल, आधारभूत संरचना में प्रगति, सरकार का मॉनेटाइजेशन और निजीकरण की परियोजनाओं के कारण भारत का चौमुखी आर्थिक विकास हुआ है। नरेंद्र मोदी की सरकार ने केंद्रीय बैंक में मौजूद रूढ़िवादी विचारों और उसकी संरचनाओं को ध्वस्त किया जिस कारण भारत के आर्थिक प्रगति का मार्ग प्रशस्त हुआ है। मोदी सरकार के इस विलक्षण नीतियों को व्यक्ति की शारीरिक संरचना से जोड़ना और उसकी परिणिति के रूप में आर्थिक विकास को दर्शाना वामपंथी मानसिक दिवालियापन को परिलक्षित एवं प्रतिबिंबित करता है। स्वयं रघुराम राजन ने भी इस पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा था कि वह यहां पर बैंकिंग व्यवस्था में सुधार करने के लिए आए हैं ना की फेसबुक पर लाइक पाने के लिए।

जब मोदी सरकार ने कार्यभार संभाला, तो उसने विकास को गति देने के लिए अर्थव्यवस्था को बढ़ावा नहीं देने का फैसला किया – कुछ ऐसा जो कांग्रेस सरकार द्वारा बड़े पैमाने पर किया गया था और जिसके कारण मुद्रास्फीति आसमान छू रही थी। इसके बजाय, मोदी सरकार ने सुधारों पर जोर दिया, मुद्रास्फीति की दरों पर लगाम लगाई और धैर्यपूर्वक विकास के एक प्राकृतिक और स्थायी चक्र की प्रतीक्षा की।

अब उस प्रयास के परिणाम दिखने लगे हैं। और इस बार, मोदी सरकार ने न केवल विकास की इस अवधि को शुरू किया है, बल्कि यह सत्ता में बने रहने और विकास को बनाए रखने के लिए राजनीतिक रूप से भी काफी मजबूत है।

गोल्डमैन सैक्स द्वारा हाल ही में प्रकाशित एक वैश्विक रणनीति पेपर का अनुमान है कि 2024 तक भारत का मार्केट कैप बढ़कर 5 ट्रिलियन डॉलर हो जाएगा। वहीं 2021 भारतीय स्टार्टअप पारिस्थितिकी तंत्र के लिए एक सनसनीखेज वर्ष रहा है, जिसने सभी अनुमानों को पार कर लिया है। एक रिपोर्ट के अनुसार, अकेले जुलाई 2021 में, भारतीय स्टार्टअप इकोसिस्टम ने लगभग 10 बिलियन डॉलर (फ्लिपकार्ट द्वारा जुटाए गए 3.6 बिलियन डॉलर के मेगा-राउंड सहित) जुटाए और अपनी कैप में तीन नए यूनिकॉर्न जोड़े। यह 2020 में जुटाई गई पूरी राशि से अधिक है।

सभी संकेतक बताते हैं कि भारतीय अर्थव्यवस्था एक चमत्कारी गति से ठीक हो रही है और यदि कुछ नहीं, तो घरेलू और वैश्विक निवेशकों का भारतीय बाजारों में अपना पैसा लगाने का बढ़ता विश्वास पीएम मोदी की आर्थिक नीति का एक ठोस समर्थन है।

Tags: Sensexपीएम मोदीरघुराम राजनसेंसेक्स
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