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भारत ने तोड़ा चीन का रिकार्ड, एक साल में देश में उभरें सबसे अधिक Unicorns

भारत के आगे कहीं नहीं टिकता चीन!

Aniket Raj द्वारा Aniket Raj
19 January 2022
in अर्थव्यवस्था
यूनिकॉर्न भारत

Source- Google

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भारत और चीन दुनिया के 5 सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। 1991 में चीन ने विदेशी व्यवसायों के लिए ‘ओपन डोर पॉलिसी’ लागू किया, तो भारत ने अर्थव्यवस्था के उदारीकरण की नीति लागू की और दोनों ही देश विकास के पथ पर दौड़ पड़े। हालांकि, इसके परिणाम भी अब दिखने लगे हैं। अमेरिका इस समय दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है, पर 2030 तक चीन और भारत काफी आगे निकल जाएंगे। इसी बीच यह खबर है कि एक वर्ष में सर्वाधिक ‘यूनिकॉर्न’ निर्मित करने के मामले में भारत ने चीन का रिकॉर्ड तोड़ दिया है। चीन का रिकॉर्ड तोड़ते हुए भारत सबसे ज्यादा यूनिकॉर्न की संख्या वाला विश्व का तीसरा सबसे बड़ा देश बन गया है।

भारत के आगे कहीं नहीं टिकता चीन

प्रारंभिक वर्षों के दौरान विकसित अर्थव्यवस्थाओं में पारंपरिक व्यवसायों का प्रभुत्व था, जो स्थिर गति से बढ़ रहे थे। लेकिन, जब से इंटरनेट और स्मार्टफोन लोगों के हाथ में पहुंचा, दुनिया बदल गई। इस अनूठे संयोजन ने व्यवसायों के लिए अवसरों का एक नया मार्ग खोल दिया और विकास के लिए बहुत तेज़ अवसर प्रदान किये । अब व्यवसायों के पास दुनिया में कहीं भी ग्राहकों तक अभूतपूर्व गति से पहुंचने की क्षमता है। नए युग के उद्यमियों ने ठीक यही किया। ग्राहकों में जरूरत पैदा किया और उन्हें पलक झपकते ही उनके पास पहुंचा दिया। शायद, इसीलिए भारत के बढ़ते यूनिकॉर्न की खबर और चीन के साथ उसका तुलनात्मक अध्ययन बस एक ‘मोबाइल टच’ दूर है। तेजी से बढ़ते इन व्यवसायों को हम स्टार्टअप कहते हैं। इन्हीं startups  की वैल्यूएशन जब 1 बिलियन डॉलर से ऊपर जाती है, तब यूनिकॉर्न और जब 10 बिलियन डॉलर से ऊपर जाती है, तब उसे डिकाकॉर्न कहा जाता है।

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इन नए जमाने की तकनीकों द्वारा प्रदान की गई गति को समझने के लिए एक उदाहरण देखिए। भारत की सबसे सफल आईटी कंपनियों में से एक, इंफोसिस को यूनिकॉर्न बनने में 18 साल लगे। हां यह बात शत-प्रतिशत सत्य है, इंफोसिस को यूनिकॉर्न बनने में करीब 2 दशक लगे, लेकिन उड़ान को महज 14 महीने। यूनिकॉर्न शब्द 2013 से पहले मौजूद नहीं था, क्योंकि इतनी बड़ी वैल्यूएशन वाली ज्यादा कंपनियां नहीं थी। आने वाले वर्षों में ये स्टार्टअप इन देशों के विकास में और भी बड़ी भूमिका निभाने वाले हैं, क्योंकि इन्हीं के बीच से निकले यूनिकॉर्न देश की आर्थिक शक्ति के स्रोत बनेंगे। संख्याबल के हिसाब से देखे तो चीन दुनिया का सबसे बड़ा स्टार्टअप इकोसिस्टम है, तो वहीं भारत तीसरा।परन्तु, अगर गुणवत्ता के आधार पर परखें, तो भारत का स्टार्टअप पारिस्थितिकी तंत्र के मुकाबले चीन कहीं नहीं टिकता। इसके पीछे के मुख्य कारण भारत का निवेश, निवेशकों, व्यापार सुगमता, जागरूकता और इनक्यूबेटर के प्रति रवैया है।

और पढ़ें: GP Bomb: भारत द्वारा निर्मित 500 किलो का बम चीन और पाकिस्तान में कुछ भी नष्ट कर सकता है

स्टार्टअप्स और यूनिकॉर्न की संख्या

301 यूनिकॉर्न के साथ, चीन में दुनिया का सबसे बड़ा स्टार्टअप इकोसिस्टम है। कई रिपोर्टों का दावा है कि चीन में हर दिन 10,000 से अधिक स्टार्टअप बनाए जाते हैं। कुछ रिपोर्ट्स का दावा है कि चीन में 30 मिलियन से ज्यादा स्टार्टअप हैं, जो नेपाल की पूरी आबादी से ज्यादा है। जहां तक ​​भारत की बात है, हमारे पास 80,000 स्टार्टअप हैं। ओरियोस वेंचर पार्टनर्स ने बीते गुरुवार को जारी एक रिपोर्ट में कहा है कि साल 2021 में भारत में एक अरब डॉलर से ज्यादा वैल्युएशन वाले 46 स्टार्टअप, यूनिकॉर्न (एक अरब डॉलर से अधिक मूल्यांकन वाले स्टार्टअप) का दर्जा पाने में सफल रहे। भारत में मौजूद कुल यूनिकार्न की संख्या अब दोगुनी से भी ज्यादा होकर 90 हो गई है। यह हमारे देश के लिए काफी महत्वपूर्ण उपलब्धि है, जहां 2015 के अंत तक देश में केवल 19,000 स्टार्टअप और 8 यूनिकॉर्न थे। रिपोर्ट के मुताबिक अब ये स्टार्टअप न सिर्फ नवोन्मेषी समाधान एवं तकनीक लेकर आ रहे हैं, बल्कि बड़े पैमाने पर रोजगार भी पैदा कर रहे हैं।

वर्ष 2021 के मिड तक भारत में यूनिकॉर्न का दर्जा पाने वाले स्टार्टअप की संख्या 33 थी, जबकि चीन के पास 19। तिसरी तिमाही तक भारत में इसकी संख्या करीब 13 बढ़कर 46 तक पहुंच गई, जबकि वर्ष के अंत तक चीन की 7 कंपनियों को यूनिकॉर्न का दर्जा हासिल हुआ। यानी  भारत ने एक साल में कुल 46 यूनिकॉर्न के साथ चीन को पीछे छोड़ दिया। आज के समय में दुनिया का हर 13वां यूनिकॉर्न भारत में पैदा हुआ है। भले ही भारत का स्टार्टअप पारिस्थितिकी तंत्र अभी भी अपनी प्रारंभिक अवस्था में है पर गुणवत्ता के मामले में चीन से बेहतर है। यूनिकॉर्न के मामले में भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा देश है ।

स्टार्टअप हब और इनक्यूबेटर

भारत में इतने सारे स्टार्टअप होने का एक कारण इन्क्यूबेटर भी हैं। एक इनक्यूबेटर उद्यमियों को अपने स्टार्टअप के शुरुआती चरण में सलाह, बीज वित्त पोषण, कार्य स्थान और प्रशिक्षण जैसे सभी आवश्यक तत्व प्रदान करता है, ताकि वह एक सफल व्यवसाय या ‘यूनिकॉर्न’ बन सके। चूंकि 90% स्टार्टअप उचित व्यवसाय मॉडल, सही उत्पाद, सही टीम या फंडिंग की कमी के कारण विफल हो जाते हैं, इसलिए इनक्यूबेटर यह सुनिश्चित करते हैं कि इन स्टार्टअप के सफल होने की बेहतर संभावना हो।

भारत में केवल 520 से अधिक इनक्यूबेटर हैं, जो हर साल लगभग 6,200 स्टार्टअप का समर्थन कर सकते हैं। भारत में स्टार्टअप इन्क्यूबेटरों की संख्या पिछले दो दशकों में 15 गुना बढ़ी है, जो 2008 और 2020 के बीच जोरदार नीति सक्रियता से प्रेरित है। सर्वाधिक इनक्यूबेटर के मामले में भारत तीसरे स्थान पर है।

हमारे डिजिटल भुगतान कंपनी पेटीएम का मूल्य 1.20 लाख करोड़ रुपये, नवीनतम एडटेक डेकाकॉर्न बायजू का मूल्यांकन 78,000 करोड़ रुपये और हॉस्पिटैलिटी चेन OYO का मूल्य 75,000 करोड़ रुपये है। भारत के शीर्ष तीन स्टार्टअप का संयुक्त मूल्यांकन 36.5 अरब डॉलर (2.7 लाख करोड़ रुपये) है, जो कि बाइटडांस के 75 अरब डॉलर (5.6 लाख करोड़ रुपये) के विशाल मूल्यांकन के आधे से भी कम है। परन्तु, भारत तेजी से आगे बढ़ रहा है।

और पढ़ें: भारत के साथ-साथ दुनिया भर में चीन के वर्चस्व को समाप्त करने के लिए तैयार है Tata Group

निवेशक हित रक्षण

स्टार्टअप को सफल बनाने के लिए बड़ा निवेश आवश्यक है। परन्तु, निवेशकों की चीन के स्टार्टअप इकोसिस्टम में रुचि कम होती दिख रही है, जिसने अब परिपक्वता और स्थिरता प्राप्त कर ली है। इससे भी दिलचस्प बात यह है कि न केवल वैश्विक निवेशक भारत की ओर देख रहे हैं, बल्कि चीनी निवेशक भी आ रहे हैं। भारतीय स्टार्टअप में निवेश किए गए 14.5 अरब डॉलर (1 लाख करोड़ रुपये) में से करीब 4 अरब डॉलर (30,000 करोड़ रुपये) अलीबाबा, टेनसेंट और शुनवेई कैपिटल जैसे चीनी निवेशकों से आए।

व्यापार सुगमता यानी ‘Ease of doing Business’  के मामले में, 190 देशों में चीन अब 31वें स्थान पर है, तो वहीं 2015 में 142 वें स्थान पर काबिज भारत निरंतर सुधार करते हुए इस वर्ष 63 वें स्थान पर पहुंच गया है। आज के समय में, एक व्यक्ति चीन में केवल 9 दिनों में व्यवसाय शुरू कर सकता है, तो वहीं भारत भी अब सिर्फ 18 दिन लेता है। भारत सरकार इस समय को घटाकर केवल 5 दिन करने के लिए प्रतिबद्ध है। इसलिए, हम आने वाले वर्षों में इस दिशा में कुछ और सुधार देखने की उम्मीद कर सकते हैं।

निवेश के मामले में भारत द्रुत गति से आगे बढ़ रहा है और यह रिपोर्ट में परिलक्षित होता है। व्यापार सुगमता की नवीनतम रिपोर्ट निवेशकों के हितों की रक्षा के मामले में भारत को 14वें स्थान पर रखती है, जबकि इस सूचकांक में चीन की रैंकिंग 28 है। इसका मतलब यह है कि भारत चीन के विपरीत अपने निवेशकों को अधिक पारदर्शिता और नियंत्रण प्रदान करता है, जो भारतीय स्टार्टअप पारिस्थितिकी तंत्र में बढ़ते निवेश का एक और कारण है। Evergrande संकट पर चीन के रवैये ने इस तर्क को और पुख्ता किया है।

और पढ़ें: भारत-श्रीलंका समझौते के बाद चीन ‘जल बिन मछली’ की भांति तड़प रहा है

भारत द्वारा स्टार्टअप पहल

बताते चले कि भारत ने देश में नवाचार और उद्यमिता को बढ़ावा देने के लक्ष्य के साथ 2016 में स्टार्टअप इंडिया अभियान शुरू किया, जिसकी घोषणा प्रधानमंत्री ने लाल किले के प्राचीर से की थी। स्टार्टअप इंडिया पहले केवल चार भारतीय राज्यों में स्टार्टअप नीति थी, लेकिन आज इसकी सफलता को देखते हुए 26 भारतीय राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने उद्यमिता का समर्थन करने के लिए एक स्टार्टअप नीति तैयार की है।

सरकार ने उभरते स्टार्टअप्स में निवेश करने के लिए 10,000 करोड़ रुपये फंड भी जारी किया है। 10,000 करोड़ रुपये में से अब तक 338 स्टार्टअप में 3,582 करोड़ रुपये का निवेश किया जा चुका है। हम भारत और चीन के बीच असमानता को स्पष्ट रूप से देख सकते हैं। चीन में सरकार बड़े पैमाने पर निवेश और राज्य द्वारा संचालित इन्क्यूबेटरों के साथ चीन के स्टार्टअप पारिस्थितिकी तंत्र में बहुत बड़ी भूमिका निभाती है, तो भारत का स्टार्टअप पारिस्थितिकी तंत्र अभी भी काफी हद तक निजी निवेशकों द्वारा समर्थित है। यह एक स्वतंत्र व्यवस्था है जिसमे भारत सरकार एक सहयोगी की भूमिका निभाती है। परन्तु, असली शक्ति की भूमिका में भारत के युवा हैं। सरकार सिर्फ पहल कर सकती है, फंड दे सकती है। लेकिन, श्रम कर के भारत के आर्थिक सामर्थ्य की स्थापना करना युवाओं के हाथ में ही है।

Tags: चीनमोदी सरकारयूनिकॉर्नस्टार्टअप
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