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भगवान श्रीकृष्ण से सीखें रिश्ते निभाने की कला, जीवन को सफल, सार्थक और यशस्वी बनाने के गुण

भगवान श्रीकृष्ण की इन बातों को जीवन में जरूर अपनाएं!

TFI Desk द्वारा TFI Desk
19 August 2022
in संस्कृति
Krishna

Source- Google

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भगवान श्रीकृष्ण का जन्मदिन, श्रीकृष्ण जन्माष्टमी, जुलाई या अगस्त के महीने में पूरे भारत में बड़ी श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है। इसे जन्माष्टमी या गोकुलाष्टमी के नाम से भी जाना जाता है, जिसमें हिंदू लोग श्रीकृष्ण के जन्म को भगवान विष्णु के आठवें अवतार के रूप में मनाते हैं। यह हिंदू चंद्र कैलेंडर के अनुसार श्रावण या भाद्रपद में श्रीकृष्ण पक्ष के आठवें दिन (अष्टमी) को मनाया जाता है।

यह हिंदुओं का, विशेष रूप से वैष्णव परंपरा के अनुयायी हिंदुओं के सबसे पवित्र त्योहारों में से एक है। भागवत पुराण में वर्णित श्रीकृष्ण के जीवन कथा के अनुसार यह पर्व मध्य रात्रि मे श्रीकृष्ण जन्म के उपलक्ष्य मे उपवास, रात्रि जागरण और नृत्य-नाट्य अभिनयो और मध्य रात्रि भक्ति गायन के माध्यम से मनाया जाता है।

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जन्माष्टमी उत्सव का केंद्र विशेष रूप से मथुरा और वृंदावन होता है लेकिन अब यह एक वैश्विक त्योहार बन गया है। यह उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश सहित भारत के अन्य सभी राज्यों मणिपुर, असम, बिहार, पश्चिम बंगाल ओडिशा, में पाए जाने वाले प्रमुख वैष्णवों और गैर-सांप्रदायिक समुदायों का एक महत्वपूर्ण त्योहार है। श्रीकृष्ण जन्माष्टमी त्योहार नंदोत्सव के बाद आता है, यह उस दिन की याद मे मनाया जाता है जब नंद बाबा ने श्रीकृष्ण जन्म के उल्लास में लोगों को उपहार बांटे थे।

और पढ़ें: सनातन संस्कृति के त्योहार, जिनके बारे में हिंदुओं को अधिक जानने की आवश्यकता है

प्रभाव और महत्व

  • सभी वैष्णव परंपराएँ श्रीकृष्ण को भगवान विष्णु का आठवां अवतार मानती हैं; अन्य लोग भगवान विष्णु के साथ श्रीकृष्ण की पहचान करते हैं, जबकि हिन्दू धर्म की कुछ परंपराएं श्रीकृष्ण को उसी रूप मे स्वयंभू भगवान मानती है जैसा कि हिंदू धर्म में ब्रह्म की अवधारणा है।
  • जैन धर्म परंपरा में 63 शलाकापुरुष या विलक्षण विभूतियों की अवधारणा हैं, इनमे से चौबीस तीर्थंकरों (आध्यात्मिक शिक्षक) और नौ त्रय समूह सम्मिलित हैं। इनमें से एक त्रय श्रीकृष्ण को वासुदेव के रूप में, बलराम को बलराम के रूप में, और जरासंध को पृथ्वी-वासुदेव के रूप में मानता है।
  • श्रीकृष्ण की कहानी बौद्ध धर्म में जातक कथाओं में मिलती है। विदुरपंडिता जातक में मधुरा (संस्कृत: मथुरा), घाट जातक में कंस, देवगाभ (संस्कृत: देवकी), उपसगरा या वासुदेव, गोवधना (संस्कृत: गोवर्धन), बलदेव (बलराम) और कान्हा या केशव का उल्लेख है।
  • पारंपरिक और रूप से ऐतिहासिक रूप से गुरु गोविंद सिंह के लिए लिखित दशम ग्रंथ में चौबीस अवतारों में श्रीकृष्ण को एक अवतार के रूप में उल्लेख किया गया है।
  • बहाई लोगों का मानना ​​है कि श्रीकृष्ण “ईश्वर का एक अवतार” अथवा धर्म प्रवर्तकों की उस शृंखला मे से एक थे जिन्होंने भगवान के वचन को धीरे-धीरे परिपक्व होने वाली मानवता के लिए उत्तरोत्तर प्रकट किया है।

भगवान श्रीकृष्ण के जीवन से शिक्षा 

भगवान विष्णु के सभी अवतारों में, श्रीकृष्ण और श्रीराम के इस भारत भूमि पर वे अवतार हैं जिसमे उन्होंने अपने कर्मों के माध्यम से लोगों को धर्मसम्म्त आचरण का मार्ग दिखाया है। यह वह भूमि है जहां जब भी धर्म का क्षरण होता है, तो भगवान धर्म की पुनर्स्थापना हेतु इस भूमि पर परिस्थिति के अनुकूल अवतार लेते हैं। त्रेता युग में, लोग धर्म का पालन आदर्श जीवन के उदाहरण को देखकर करते थे , इसलिए उस युग मे मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम का अवतरण हुआ, जिन्होंने अपने सम्बन्धों को अलग रखकर भी जीवन के आदर्शों का पालन किया। द्वापर युग में, केवल उदाहरण दिखाना पर्याप्त नहीं था, धर्म को अधर्मियों को  दंडित करने के लिए तैयार करने का मार्ग सिखाया जाना भी आवश्यक था। इसलिए श्रीकृष्ण धर्म के पक्ष में खड़े हुए और पांडवों को कुरुक्षेत्र में जीतने में सहायता की।

जब हम परमेश्वर की ओर देखते हैं और हम उनकी पूजा कैसे करते हैं, इसके आधार पर हम कई पहलुओं को समझ सकते हैं। एक व्यक्ति जो श्रीकृष्ण का भक्त है, श्रीकृष्ण को अपने जीवन का सब कुछ बना लेता है, अपने जीवन को प्यार से भर लेता, खुशी के समुद्र में तैरता है और अंततः मोक्ष प्राप्त करता है। हम उनके बारे में बात नहीं कर रहे हैं। चूंकि श्रीकृष्ण के जीवन का एक इतिहास है, उन्होंने कैसे व्यवहार किया, कुछ चीजों को प्राप्त करने के लिए उन्होंने क्या कदम उठाए, इससे हमें कई चीजें सीखने में सहायता  मिलती है।

प्रेम का संचार करो, अंततः वह लौटकर आपके पास वापस आएगा

मथुरा आने के बाद, श्रीकृष्ण ने कई लीलाएँ करके लोगों के बीच दृढ़ संबंध स्थापित किए। स्वयं श्रीकृष्ण नाम का अर्थ है “कर्षयति इति श्रीकृष्णः अर्थात् जो आकर्षित करता है।” दूसरों के घरों से मक्खन, दूध आदि चुराने जैसी शरारती आचरण करके, उन्होंने गृहिणियों को आकर्षित किया। कई राक्षसों को मारकर उन्होंने अपने दोस्तों और सभी लोगों को आकर्षित किया, कई बार मदद करके उन्होंने कई दोस्तों को आकर्षित किया, उनके रूप और मुरली गण द्वारा, उन्होंने कई बालाओं को आकर्षित किया, और उन्होंने गायों को आकर्षित किया। अपने बचपन में ही नहीं, उन्होंने हमेशा सही लोगों के लिए प्यार फैलाया।

एक नेता को अपने लोगों के लिए खड़ा होना चाहिए

मथुरा के गोपालक हर वर्ष भगवान इंद्र (सभी देवतों के राजा) की पूजा करते थे। श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पहाड़ी की पूजा करने का सुझाव दिया जो उन्हें उनकी गायों के लिए भोजन उपलब्ध कराकर कई तरह से मदद करता है लेकिन इंद्र इस कृत्य से क्रोधित हो गए और उन्हें दंडित करना चाहते थे। उन्होंने समवर्तक बादलों को भेजा और उन्हें भारी वर्षा करने का आदेश दिया। लगभग सात दिनों तक भयानक गरज के साथ बारिश हुई। भगवान श्रीकृष्ण ने पहाड़ी को उठा लिया और लोगों को आश्रय दिया। इससे इंद्र का मिथ्या अभिमान टुकड़ों में बिखर गया और सभी बादलों को वापस बुला लिया।

प्रकृति का सम्मान करें और उसकी रक्षा करें

मथुरा में यमुना नदी के उप भाग मे कालिंदी नामक एक झील है। इस झील यह कालिया नाम का एक सर्प रहता था, जिसके जहरीले जहर ने झील के पानी गर्म कर दिया था । पानी के गरम होने से बनी वाष्पों ने नदी को बेकार कर दिया था और जो गलती से उस पानी का स्वाद लेते थे वे मर जाते थे । श्रीकृष्ण उस झील की ओर गए और उस विशाल सांप के सिर पर सवार होकर और नाचने लगे, जिससे वह नाग बेहोश हो गया। उन्होंने उसे जीवित कर दिया और उसे नदी से दूर जाने के लिए प्रेरित किया जिससे किसी को कोई परेशानी न हो ,  ऐसा करने से उस सर्प की पत्नियां भी प्रसन्न हो गयी और  श्रीकृष्ण की प्रशंसा की।

नदियाँ हमें पानी देकर जीवन देती हैं। इसकी रक्षा करना हर किसी का उत्तरदायित्व है। वास्तव में, इस देश में प्रमुख नदियों के लिए हर 12 साल के लिए पुष्कर उत्सव मनाने के पीछे भी यही मुख्य अवधारणा है।

धर्म के पक्ष मे खड़े हों , भले ही वह कमजोर हो

कौरव ने साम्राज्य का आधा हिस्सा पांडवों को नहीं दिया, जिसके वे वैधानिक अधिकारी थे। दुर्योधन सम्पूर्ण राज्य पर अपना प्रभुत्व चाहता था। श्रीकृष्ण ने पांडवों का पक्ष लिया और हर तरह से उनका साथ दिया । उन्हें अपने पक्ष को सुदृढ़ करने और बढ़ाने में सहायता की। इसमे  छोटे दुश्मनों को मारना, पांडवों के लिए नए मित्र बनाना और राजनीतिक रणनीतियों द्वारा युद्ध को जिताऊ बनाना सम्मिलित था।

आप जीवन में चाहे जो भी ऊंचाई प्राप्त कर लें , अपने मित्रों को कभी न भूलें

श्रीकृष्ण का एक सहपाठी, सुदामा बेहद गरीब था और उसके पास खाने पीने के लिए कुछ भी नहीं था । अपनी पत्नी की सलाह पर, वह श्रीकृष्णा से मिलने के लिए पैदल चलकर द्वारका आता है और आशा  करता है कि श्रीकृष्ण उसकी गरीबी दूर करने में कुछ सहायता अवश्य करेगें। श्रीकृष्ण उसका स्वागत करते हैं, उसका सम्मान करते हैं। सुदामा अपने मुंह से किसी प्रकार की मांग या याचना नहीं करते हैं किंतु श्रीकृष्ण उसे धन धान्य से  सम्पन्न  बनाकर उसका जीवन बदल देते है।

और पढ़ें: मानवता के मार्गदर्शक हैं भारत के महान 7 संत, जिन्हें कहा जाता है सप्तर्षि

सत्यनिष्ठ रहें और सदैव इस पर गर्व करें

सत्रजित, नामक एक राजा को सूर्य से स्यामांतक मणि नामक एक दुर्लभ रत्न मिलता है। इससे वह चाहे  भारी मात्रा में सोना बना सकता था। श्रीकृष्ण उससे वह मणि देने के लिए अनुरोध करते है और कहते है यदि मणि का यह सही तरीके से उपयोग किया जाता है तो पूरे राज्य के लोगों को फायदा होगा। सत्रजित इस प्रस्ताव को ठुकरा देते हैं। श्रीकृष्ण उस विषय को वहीं छोड़ देते हैं।

कुछ दिनों बाद, सत्रजित का भाई उस मणि को पहनकर शिकार के लिए जाता है। जंगल में एक शेर मणि को देखता है, इसे चमकदार मांस के स्वादिष्ट टुकड़ा समझकर उसे मार देता है। सत्रजित को लगता है कि श्रीकृष्णा ने उनके भाई को गहना के लिए मार दिया।

मणि की तलाश में श्रीकृष्ण जंगल में जाते हैं। श्रीकृष्ण को वह मणि जाम्बवंत के घर में मिलती है, श्रीकृष्ण उससे लड़कर मणि छीन लेते है और मणि को सत्रजित को वापस लौटा देते है। सत्रजित को अपनी गलती का एहसास होता है, वह श्रीकृष्ण से क्षमा मांगता है और श्रीकृष्ण से अपनी बेटी सत्यभामा के साथ विवाह करके मणि को ले जाने का अनुरोध करता है। श्रीकृष्ण मणि लेने से मना कर देते हैं, और सत्यभामा से विवाह करते हैं।

सदैव उसकी ओर रहें जो आप पर भरोसा करता है

श्रीकृष्ण ने पांडवों को हर तरह से उनका अधिकार दिलाने में सहायता की। उन्होंने श्रीकृष्ण की पूजा की और जब भी किसी विषम स्थिति का सामना किया तो श्रीकृष्ण ने उनकी सहायता की। श्रीकृष्ण सदैव उनके लिए उपस्थित रहते थे, जब भी उन्हे श्रीकृष्ण की आवश्यकता होती थी। श्रीकृष्ण ने उन्हें रास्ता दिखाया, उन्हें अपनी ताकत का एहसास कराया,  उनका संपर्क बढ़ाकर अपनी सेना बनाने में मदद की, उन्हें अधिकार के लिए लड़ने के लिए प्रेरित किया।

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