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मूनलाइट अल्पावधि में आकर्षक हो सकती है, लेकिन लंबी अवधि के लिए यह घातक है

सावधान! मूनलाइट का 'टिटिम्मा' आपके स्वास्थ्य और आपके करियर को लील सकता है

Prashant Srivastava द्वारा Prashant Srivastava
23 September 2022
in ज्ञान
मूनलाइट
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मूनलाइट: अंग्रेज़ी के दो शब्द प्लेज़र और पेन दोनों अपने आप में गूढ़ अर्थ समेटे हुए हैं, हालांकि दोनों विरोधाभासी भी हैं। इनका स्तर प्रत्येक प्राणी के लिए अलग-अलग हो सकता है किंतु अगर मनुष्यों के परिप्रेक्ष्य में बात करें तो ध्यान देना होगा कि प्लेज़र का अर्थ है आनंद, अर्थात् प्रसन्नता का चरम रूप, और पेन यानी कष्ट, दुःख। अब मनुष्य मूलतः स्वभाव से स्वार्थी रहा है, वह कष्ट से डरता है या ये कहें कि वह अपने जीवन में किसी भी प्रकार के कष्ट को चाहता ही नहीं है, उसी कष्ट से बचने हेतु और अपने आनंद का चरम रूप पाने के क्रम में उसने इस संसार में ऐसे टिटिम्मे बनाए हैं कि कब आनंद लेते-लेते उसे कष्ट होने लगे, स्वयं उसे ही पता न चले। किंतु मनुष्य तो टहरा मनुष्य, उसे आनंद प्राप्ति की इतनी चूल है कि वह किसी भी तरह अपने कष्ट को निकाल फेंकना चाहता है।

और पढ़ें- जब मुस्लिम लेखकों ने ‘सेक्युलर’ प्रेमचंद का उर्दू में लिखना बंद करा दिया

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मनोवैज्ञानिक लेखक का ज्ञान

इसी क्रम में मनोवैज्ञानिक लेखक सिग्मंड फ्रायड ने ज्ञान बांचते हुए कहा है कि आनंद सिद्धांत भूख, प्यास, क्रोध और काम सहित हमारे सबसे बुनियादी और आदिम आग्रहों को पूरा करने का प्रयास करता है और जब यह आवश्यकताएं पूरी नहीं हो पाती हैं तो इसका परिणाम चिंता या तनाव की स्थिति के रूप में सामने आता है। मनुष्य अपना पूरा जीवन इसी प्रयास में लगा देता है, इसी क्रम में वह पहले गांव से शहर बेहतर जीवकोपार्जन की तलाश में जाता है, एक राज्य से दूसरे राज्य, तत्पश्चात् एक देश से दूसरे देश चला जाता है। किंतु कष्ट उसका पीछा नहीं छोड़ता है। हां कुछ पलों का आनंद अवश्य आ जाता है, किंतु फिर उसे कोई न कोई कष्ट घेर लेता है। अब ऐसे में महात्मा बुद्ध का वह कथन याद आता है कि सुख/आनंद अल्पकालिक हैं किंतु दुख दीर्घकालिक है।

देखा जाए तो मनुष्य ने न कभी अपने आनंद को बढ़ाने के क्रम में कोई कमी की है और न ही आगे भी वह यह करेगा। वस्तुतः मनुष्य का ज्ञान इतना सतही हो गया है कि उसे आनंद भौतिक वस्तुओं की प्राप्ति कर लेने में मिलता है। किंतु उसमें भी एक कष्ट है, अब यदि मनुष्य को भौतिक वस्तुएं ख़रीदनी है तो उसके लिए मूल्य चुकाना पड़ेगा, अतः धन की आवश्यकता पड़ेगी। अब धन तो परिश्रम से ही आएगा, इसी क्रम में मनुष्य ने बहुत मेहनत करके बहुत धन भी कमाया। वहीं लालसा के बढ़ते क्रम में उसके द्वारा कमाया गया धन कम पड़ता गया, परिणामस्वरूप वह और मेहनत करता चला गया लेकिन बढ़ती हुई लालसा इस वेग के साथ उस पर हावी रही कि धन की आवश्यकता उसे हमेशा बनी ही रही।

और पढ़ें- शरत चंद्र चटोपाध्याय: एक ओवररेटेड साहित्यकार, जिन्होंने ‘लवर्स’ को ‘FOSLA का रोग’ लगा दिया

यदि मनुष्य धन कमाने के लिए किसी एक संस्था में काम कर रहा है तो उसने और अधिक धन कमाने के लिए दो दो संस्था में काम करना प्रारम्भ कर दिया, वस्तुतः मनुष्य पहले वाली जिस संस्था में काम कर रहा है वहां से अपना काम समय पर पूरा करने के बाद दूसरी संस्था में जाकर भी काम कर रहा है। हालांकि, जैसे-जैसे बाज़ारवाद बढ़ रहा है, समाज में दिखावे भरा जीवन भी बढ़ रहा है, अतः उसे समाज के साथ कदम-कदम मिलाकर चलने के लिए और अधिक धन की आवश्यकता है। इसी क्रम में वह दो जगह काम कर रहा है। वर्तमान में अधिक प्रचलित हो रहे इस विधा को प्रकांड विद्वान एवं बड़े-बड़े समाचार पत्र मूनलाइट के नाम से पुकारने लगे हैं। शायद पहली बार सुनकर आपको चांदनी लगे किंतु भ्रम से निकलिए क्योंकि यह मन को मोह लेने वाला तो बिल्कुल नहीं होता है।

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300 लोगों की नौकरी गयी

अभी हाल ही में खबर आयी थी कि इस प्रकार काम करने के कारण 300 लोगों को विप्रो कंपनी ने नौकरी से निकाल दिया था। इसी क्रम में विप्रो के चेयरमैन ऋषद प्रेमजी ने बुधवार को कहा कि कंपनी ने पाया कि उनके संगठन में 300 कर्मचारियों ने एक ही समय में उनके एक प्रतियोगी के साथ काम किया, अतः उन पर कार्रवाई करते हुए उनकी सेवाओं को समाप्त कर दिया गया है। प्रेमजी ने जोर देकर कहा कि वह मूनलाइट के बारे में अपनी हालिया टिप्पणियों पर कायम हैं, जो “अपने सबसे गहरे रूप में” अखंडता का पूर्ण उल्लंघन करती है।

आगे उन्होंने कहा कि वास्तविकता यह है कि आज ऐसे लोग हैं जो विप्रो के लिए काम कर रहे हैं और हमारे एक प्रतियोगी संगठन के लिए भी सीधे काम कर रहे हैं। हमने वास्तव में पिछले कुछ महीनों में ऐसा कर रहे 300 लोगों का पता लगाया है। कंपनी के साथ-साथ प्रतिद्वंद्वियों के लिए समान रूप से काम करते पाए गए कर्मचारियों के विरुद्ध की गयी कार्रवाई के बारे में दोबारा पूछे जाने पर प्रेमजी ने कार्यक्रम से इतर कहा कि उनके रोजगार को “ईमानदारी का उल्लंघन” करने के लिए समाप्त कर दिया गया। बहुत सी बड़ी-बड़ी कंपनियां जैसे टीसीएस, इनफ़ोसिस ने इस बढ़ती हुई मूनलाइट प्रथा का पूरी मुखरता के साथ विरोध किया है, वहीं महिंद्रा ने इसका समर्थन किया है।

और पढ़ें- रक्षाबंधन पर्व का हिंदू शास्त्रों में क्या है महत्व? क्या हैं इसके पीछे की वास्तविक कथाएं?

मूनलाइट सही या गलत?

यदि देखा जाए तो इन कंपनियों का विरोध एक दम सही भी जान पड़ता है, सोचिए कि सामान्यतः मनुष्य न्यूनतम एक दिन में 8-9 घंटों तक काम करता है जिससे उसे थकान हो जाती है किंतु अधिक से अधिक धन पाने की चाह में वह अन्य प्रतिष्ठानों में भी काम करने चला जाता है। परिणामस्वरूप दीर्घकालिक अवधि के लिए उसमें स्वास्थ्य संबंधी बीमारी, चिड़चिड़ापन, तनाव जैसी परेशानियां देखी जा सकती हैं। इन सब को एक साथ करके सोचें तो इससे केवल उस व्यक्ति को परेशानी नहीं होगी बल्कि उसके साथ-साथ उसका पूरा परिवार भी परेशानियों से घिर सकता है। पारिवारिक के साथ-साथ उसका व्यवसायिक जीवन भी नकारात्मक रूप से प्रभावित हो सकता है। अत: अल्पकाल के लिए तो इस तरह से एक साथ दो संस्थाओं में काम करना अच्छा लग सकता है लेकिन मनुष्य की कार्यक्षमता और उसकी प्रवृति को देखा जाए तो इसके दीर्घकालिक परिणाम घातक जान पड़ता है। वहीं नैतिक रूप से देखें तब भी यह सही प्रतीत नहीं होता है, आप एक संस्था में काम करते हुए उस संस्था के प्रतिद्वंद्वी संस्था के साथ यदि काम करते हैं तो यह “जिस थाली में खाया उस थाली में छेद कर दिया” जैसा प्रतीत होता है।

वस्तुतः भारत का संविधान आपको स्वतंत्र रूप से कोई भी कार्य करने की अनुमति देता है किंतु इसका अर्थ यह नहीं है कि आप एक साथ दो प्रतिष्ठानों में कार्य करेंगे। हां यदि आप अपना काम करने के पश्चात अपने पैशन को फ़ॉलो करने के क्रम में यदि कुछ और रचनात्मक कार्य से जुड़ना चाह रहे हैं तो यह दो संस्थाओं में काम करने से बिल्कुल अलग होगा। सारगर्भित बात यह है कि अल्पावधि के लिए मूनलाइट आपको अधिक मीठा लग सकता है लेकिन दीर्घावधि के लिए यह आपके लिए बहुत घातक हो सकता है।

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