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पितृ पक्ष कुछ के लिए अशुभ है पर यह हमारे अस्तित्व और हमारी दृढ़ता का प्रतीक है

यह समय है अपनी संस्कृति हेतु संघर्ष करने वाले पितरों पर गर्व करने का

Animesh Pandey द्वारा Animesh Pandey
15 September 2022
in मत
pitri pksh
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क्या यार, फिर आ गया पिटोर पक्ष, अब प्याज चिकन सब बंद!

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ये श्राद्ध कैसे करते हैं, साइंस एज में हाऊ कैन यू फॉलो सच बकवास ट्रैडीशंस?

अपने पूरे जीवन में आपने कभी न कभी तो ऐसे प्रश्न सुने ही होंगे, कभी न कभी आपको अपनी रीतियों और परंपराओं का अनुसरण करने के लिए अनेक उलाहने भी सुनने पड़े होंगे। अब यह भारत भी विचित्र है जहां पटाखे फोड़ना तो छोड़िए, दिये जलाने मात्र पर भी कुछ लोग आपको ऐसे देखते हैं मानो आपने किसी की हत्या की हो। परंतु अपने आदर्शों, अपनी संस्कृति पर गर्व करना पाप कब से हो गया भला?

इस लेख में हम जानेंगे कि क्यों जो पितृ पक्ष कुछ लोगों के लिए अशुभ और हास्यास्पद है, वो हम सनातनियों के लिए हमारे अस्तित्व और हमारी दृढ़ता, हमारी जिजीविषा का प्रतीक चिह्न है।

और पढ़ें- सनातन संस्कृति के त्योहार, जिनके बारे में हिंदुओं को अधिक जानने की आवश्यकता है

पितृपक्ष है क्या?

सबसे पहले पितृपक्ष के बारे में जानते हैं तो आश्विन मास के कृष्ण पक्ष का पूर्ण काल वो समय है जब हम अपने पूर्वजों को नमन कर सकते हैं, इस दौरान जो भी भूल चूक हुई हो उसके लिए हम क्षमा मांगते हैं।

इसे ‘सोलह श्राद्ध’, ‘महालय पक्ष’, ‘अपर पक्ष’ आदि नामों से भी जाना जाता है। भगवद् गीता के अध्याय ९ श्लोक २५ के अनुसार पितर पूजने वाले पितरों को, देव पूजने वाले देवताओं को और परमात्मा को पूजने वाले परमात्मा को प्राप्त होते हैं, अर्थात् मनुष्य को उसी की पूजा करने के लिए कहा गया है जिसे पाना चाहता है अर्थात समझदार इशारा समझ सकता है कि परमात्मा को पाना ही श्रेष्ठ है। अतः अन्य पूजाएं (देवी-देवता और पितरों की) छोड़ कर सिर्फ परमात्मा की पूजा करें।

इसे इस तरह समझ सकते हैं कि मेरा नाम अनिमेष पाण्डेय है, अनीस शेख या एल्बर्ट अलवारेस नहीं, और ये इसलिए संभव हुआ क्योंकि मेरे किसी पूर्वज ने न लोभवश ईसाईयत के प्रलोभन के समक्ष घुटने टेके, और न ही किसी इस्लामिक आक्रांता के भय से अपना धर्मांतरण कराया। ऐसे में अपने पूर्वजों की धैर्य और उनके साहस को नमन करना मेरा और आपका धर्म भी है और कर्तव्य भी।

परंतु पितृपक्ष में करते क्या हैं?

पूर्वज पूजा की प्रथा विश्व के अन्य देशों की भांति बहुत प्राचीन है और इसकी रीतियां भारत के अनेक क्षेत्रों में भिन्न है। यह प्रथा यहां वैदिक काल से प्रचलित रही है। विभिन्न देवी देवताओं को संबोधित वैदिक ऋचाओं में से अनेक पितरों तथा मृत्यु की प्रशस्ति में गायी गयी हैं। पितरों का आह्वान किया जाता है कि वे पूजकों (वंशजों) को धन, समृद्धि एवं शक्ति प्रदान करें। पितरों को आराधना में लिखी ऋग्वेद की एक लंबी ऋचा (१०.१४.१) में यम तथा वरुण का भी उल्लेख मिलता है। सायण के टीकानुसार श्रोत संस्कार संपन्न करने वाले पितर प्रथम श्रेणी में, स्मृति आदेशों का पालन करने वाले पितर द्वितीय श्रेणी में और इनसे भिन्न कर्म करने वाले पितर अंतिम श्रेणी में रखे जाने चाहिए।

स्वर्ग के आवास में पितृ चिंतारहित हो परम शक्तिमान् एवं आनंदमय रूप धारण करते हैं। पृथ्वी पर उनके वंशज सुख समृद्धि की प्राप्ति हेतु पिंडदान और पूजापाठ करते हैं। वेदों में पितरों के भयावह रूप की भी कल्पना की गयी है। पितरों से प्रार्थना की गयी है कि वे अपने वंशजों के निकट आएं, उनका आसन ग्रहण करें, पूजा स्वीकार करें और उनके क्षुद्र अपराधों से अप्रसन्न न हों।

इस प्रथा के दार्शनिक आधार की पहली मान्यता मनुष्य में आध्यात्मिक तत्व की अमरता है। आत्मा किसी सूक्ष्म शारीरिक आकार में प्रभावित होती है और इस आकार के माध्यम से ही आत्मा का संसरण संभव है। असंख्य जन्ममरणोपरांत आत्मा पुनरावृत्ति से मुक्त हो जाती है। यद्यपि आत्मा के संसरण का मार्ग पूर्वकर्मों द्वारा निश्चित होता है तथापि वंशजों द्वारा संपन्न श्राद्धक्रियाओं का माहात्म्य भी इसे प्रभावित करता है।

वहीं बौद्ध धर्म में दो जन्मों के बीच एक अंत:स्थायी अवस्था की कल्पना की गयी है जिसमें आत्मा के संसरण का रूप पूर्व कर्मानुसार निर्धारित होता है। पुनर्जन्म में विश्वास हिंदू, बौद्ध तथा जैन तीनों चिंतन प्रणलियों में पाया जाता है। हिंदू दर्शन की चार्वाक पद्धति इस दिशा में अपवाद स्वरूप है। अन्यथा पुनर्जन्म एवं पितरों की सत्ता में विश्वास सभी चिंतन प्रणालियों और वर्तमान पढ़े और अपढ़ सभी हिंदुओं में समान रूप से पाया जाता है।

ऐसे ही मालाबार के नायरों में मृतकों को दान देने की रस्म दाहसंस्कार के अगले दिन प्रारंभ की जाती है और पूरे सप्ताह भर चलती है। उत्तरी भारत में अनुसूचित जातियों में मृतकों को भोजन देने की प्रथा प्रचलित है। गोंड जाति में दाहसंस्कार संबंधी रस्मों की अवधि केवल तीन दिन है। इन रस्मों की समाप्ति पर शोककर्ता स्नान और क्षोर द्वारा शुद्ध हो पितरों को दूध और अन्न का तर्पण करते हैं। किंतु भोजन प्रारंभ होने के पूर्व प्रत्येक व्यंजन का थोड़ा थोड़ा अंश एक पत्तल पर निकालकर मृत आत्मा के लिये जंगल में भेज दिया जाता है। पत्तल ले जानेवाला व्यक्ति उसे तब तक दृष्टि से ओझल नहीं होने देता जब तक पत्तल में रखे भोजन पर कोई मक्खी या कीड़ा न बैठ जाए। तदनोपरांत वह गांव में जाकर संबंधियों को मृतात्मा द्वारा उनके दान की स्वीकृति की सूचना देता है और तब भोज प्रारंभ होता है। उत्तरी भारत के अन्य भागों में इस प्रकार की रीतियां प्रचलित हैं।

मिर्जापुर के घासिया पांच पत्तलों में प्रतिदिन भोजन सजाकर पुरखों को भेंट चढ़ाते हैं और उनसे प्रार्थना करते हैं कि वे उनकी भेंट स्वीकार कर अपने वंशजों और पशुधन पर कृपा दृष्टि रखें। कोलों में मृतात्मा को मुर्गे की बलि देते हैं। वे बलिस्थल पर शराब छिड़ककर संतति की सुरक्षा की प्रार्थना करते हैं। राजी लोग सिर, दाढ़ी और मूंछों के बाल मुंडाकर उन्हें पूर्वजों की भेंट स्वरूप कब्र पर छोड़ देते हैं। खानाबदोश और पूर्व अपराधोपजीवी नट कबीले के लोग नदी के तट पर भोजन बनाते हैं और कपड़ा बिछा उस पर मृतात्मा के बैठने की प्रतीक्षा करते हैं। मृतक का निकटतम संबंधी एक कुल्हड़ और धुरी हाथ में लेकर नदी में डुबकी लगाता है। वह तब तक जल से बाहर नहीं आता जब तक सिर पर रखा कुल्हड़ भर न जाए। कुल्हड़ को कपड़े पर रख, उसके चारों कोनों को भी ऐसे कुल्हड़ों से दबा दिया जाता है। फिर कुल्हड़ों से घिरे इस कपड़े पर आत्मा की तृप्ति के लिए भोजन रख दिया जाता है।

कुछ भारतीय जातियों में मृतात्मा की भोजन संबंधी आवश्यकता की पूर्ति माता की ओर से संबंधियों को भोज देकर की जाती है। निचले हिमालय की तराई के भोकसा अपनी पुत्रियों के वंशजों को भोज देकर मृतात्मा की शांति की व्यवस्था करते हैं। उड़ीसा के जुआंग और उत्तरी भारत के अन्य कबीले मृतक के मामा को पुजारी का पद देते हैं। गया ओर ऐसे अन्य स्थानों में जहाँ सगे संबंधियों को पिंडदान दिया जाता है, ऐसे अवसरों पर भोजन करने के लिये ब्राह्मणों का एक विशेष वर्ग भी बन गया है। समस्त भारत में आश्विन (अगस्त सितंबर) मास में पितृपक्ष के अवसर पर वंशज पुरखों को पिंडदान देते हैं और पूरे पखवारे निकटतम पवित्र नदी में स्नान करते हैं।

मैसूर के कुरुवारू और नीलगिरि पहाड़ियों के येरुकुल अपने देवताओं के साथ पितरों को भी बलि देते हैं। मुंबई राज्य के ढोर कठकरी तथा अन्य हिंदू कबीले बिना छिले नारियल को पूर्वज मानकर उसकी पूजा करते हैं।

सोचिए, जिस रीति को जो लोग अशुभ मानते हैं, उसमें भी ऐसे अनोखे किवदंतियां और रीति निकलके आयी हैं। ऐसे में ये कहना गलत नहीं होगा कि पितृ पक्ष हमारी वो संस्कृति है जिसे चंद वामपंथियों के भय से हमें तिरस्कृत करने का कोई अधिकार नहीं है। ये हमारे सनातनी होने का अपमान है और इसे हमें छाती ठोंक के अपनाना चाहिए।

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