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उद्धव ठाकरे ने अपनी पार्टी, अपनी विरासत,अपना चुनाव चिह्न खो दिया और अब वो एक कम्युनिस्ट बन चुके हैं

बालासाहेब की विरासत को रौंदकर वामपंथियों के साथ मिल गए उद्धव ठाकरे

Animesh Pandey द्वारा Animesh Pandey
13 October 2022
in मत, राजनीति
uddhav
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बालासाहेबांची शिवसेना: शुरू करो अंताक्षरी लेके प्रभु का नाम, पर अंत ऐसा भयो कि न माया मिली न राम। का करें बंधु, जीवन ऐसा ही है, विचित्र अनुभवों से भरा। ऐसे ही विचित्र अनुभवों से महोदय उद्धव ठाकरे को भी दो चार होना पड़ा है। कभी सत्ता के शीर्ष पर बैठने वाले ये व्यक्ति आज सत्ता तो छोड़िए, उसके आस-पास भी नहीं हैं। न सत्ता उनकी, न पार्टी उनकी और तो और अब पार्टी का प्रतीक चिह्न एवं विरासत भी उनका नहीं रहा। ऐसे ही थोड़े न कहा गया है कि “चौबे जी चले थे छब्बे जी बनने, दूबे जी बनके लौटे”। उद्धव भाऊ का भी वही हाल है।

बालासाहेबांची शिवसेना – उपचुनावों से पूर्व बड़ी खबर

हाल ही में महाराष्ट्र के उपचुनावों से पूर्व एक बड़ी ही अनोखी खबर सामने आई। 12 अक्टूबर 2022 को भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी और उद्धव ठाकरे की शिवसेना गठबंधन में शामिल हो गए। लेकिन अंधेरी पूर्वी सीट पर होने वाले उपचुनाव में दोनों पार्टियां भारतीय जनता पार्टी और शिवसेना के एकनाथ शिंदे धड़े के गठबंधन से लड़ने के लिए साथ आ गई हैं। भाकपा के नेताओं ने उद्धव ठाकरे की शिवसेना को अपना समर्थन दिया और उन्हें आश्वासन दिया कि वे आगामी उपचुनाव में उद्धव ठाकरे की शिवसेना का समर्थन करेंगे –

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कम्युनिस्टांचा शिवसेनेला पाठिंबा… !भारतीय कम्युनिस्ट पक्षाने अंधेरी पूर्व मतदारसंघातील निवडणुकीसाठी शिवसेनेला पाठिंबा जाहीर केला आहे. भारतीय कम्युनिस्ट पक्षाचे नेते कॉ. प्रकाश रेड्डी यांनी उद्धव ठाकरे यांची भेट घेऊन आपला पाठिंबा व्यक्त केला आहे.#uddhavthakarey #shivsena pic.twitter.com/TL0GiuFOsp

— Maharashtra Times (@mataonline) October 12, 2022

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के प्रतिनिधिमंडल ने शिवसेना ठाकरे गुट के नेता उद्धव ठाकरे से मुलाकात की और उन्हें अंधेरी उपचुनाव में शिवसेना उम्मीदवार को पूर्ण समर्थन का आश्वासन दिया। प्रतिनिधिमंडल ने ठाकरे को यह भी आश्वासन दिया कि ‘भाजपा के खिलाफ लड़ाई में हम आपके साथ हैं।’ सीपीएम के सचिव कॉमरेड मिलिंद रानाडे, वरिष्ठ नेता कॉमरेड प्रकाश रेड्डी, प्रकाश नार्वेकर, बाबा सावंत, ट्रेड यूनियन नेता विजय दलवी और बबली रावत ने 12 अक्टूबर को दोपहर 2.30 बजे उद्धव ठाकरे से उनके आवास मातोश्री में मुलाकात की। शिवसेना नेता अनिल परब, रवींद्र वायकर इस अवसर पर अरविंद सावंत, सुनील प्रभु, रमेश कोरगांवकर आदि उपस्थित थे।

कमाल है, अब उद्धव ठाकरे उन लोगों से संधि कर रहे हैं, जिन्हें मार मारकर उनके पिता, बालासाहेब ने कभी महाराष्ट्र से भगाया था। कभी दक्षिण भारतीयों पर हमला करने के लिए विवादों के घेरे में रहने वाली शिवसेना ने स्थापना के कुछ ही समय के पश्चात ये भांप लिया कि कलकत्ता के पश्चात वामपंथियों का अगला निशाना मुंबई है, जो देश की औद्योगिक एवं वित्तीय राजधानी के रूप में उभर रहा था। इसके अगुआ थे कॉमरेड कृष्णा देसाई, जो एक समय कम्युनिस्टों के कद्दावर नेता के साथ महाराष्ट्र में आतंक का पर्याय माने जाते थे, क्योंकि मजदूरों के लिए उनके अधिकार की लड़ाई निरंतर हिंसक झड़प का रूप लेती थी।

और पढ़ें- ‘गोडसे से गांधी तक’ बाल ठाकरे के बाद कैसे बदली शिवसेना की प्राथमिकताएं

कम्युनिस्ट नेता की हत्या

इस लड़ाई के कारण ही 1970 में मुंबई में कम्युनिस्ट नेता कृष्णा देसाई की हत्या कर दी गई थी। मिल श्रमिकों को अपनी ओर खींचने के लिए दोनों यूनियनों के बीच भयंकर प्रतिस्पर्धा थी। बालासाहेब ठाकरे कम्युनिस्ट पार्टी के कार्यकर्ताओं को लाल बंदर कहते थे। लेकिन इस बीच राजनीति बदल गई। उद्धव ठाकरे ने भी अपनी वैचारिक स्थिति बदल दी क्योंकि उन्होंने स्पष्ट रूप से हिंदुत्व की विचारधारा को छोड़ दिया था। अब कांग्रेस और राकांपा से हाथ मिलाने के बाद शिवसेना अब भाजपा का विरोध करने के लिए अपने प्रतिद्वंद्वी और भाकपा के साथ गठजोड़ कर रही है।

मुंबई के लालबाग और परेल इलाके में कम्युनिस्ट पार्टी का गढ़ था। शिवसेना ने इस बल को रोकने की कोशिश की। इस दौरान शिवसेना के कम्युनिस्टों के बीच संघर्ष छिड़ गया। 5 जून 1970 को कम्युनिस्ट नेता विधायक कृष्णा देसाई की हत्या कर दी गई थी। उनकी हत्या ने महाराष्ट्र में हलचल मचा दी थी। शिवसेना पर उनकी हत्या का शक था। देसाई की हत्या के बाद परेल उपचुनाव में उनकी पत्नी सरोजिनी कृष्णा देसाई और शिवसेना के वनराव महादिक के बीच सीधा मुकाबला हुआ। इस चुनाव में वामनराव महादिक ने 1679 मतों से जीत हासिल की थी। अब अंधेरी विधानसभा उपचुनाव में ये दोनों पार्टियां जो कभी एक-दूसरे के खिलाफ लड़ी थीं, बीजेपी के खिलाफ लड़ने के लिए साथ आ रही हैं।

इन्हीं तिकड़मों के बल पर उद्धव ठाकरे ने विश्वासघात कर सत्ता हथियाई और कई वर्षों तक महाराष्ट्र के निवासियों का खून चूसा। नैतिकता और आत्मसम्मान जाए तेल लेने, सत्ता सर्वोपरि जो थी। परंतु समय सबका बदलता था, इनका भी बदला, और आज स्थिति यह है कि न तो उद्धव ठाकरे के पास सत्ता है, न गठबंधन, न शौर्य, न सम्मान, और तो और विरासत भी नहीं है।

बंधु ये तो कुछ भी नहीं है, शिवसेना के टूट जाने के बाद से ही चुनाव आयोग ने इनका मूल चुनाव चिह्न फ्रीज़ कर दिया था। जिसके बाद से ही महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे और उद्धव ठाकरे के बीच चुनाव चिह्न को लेकर एक जंग चल पड़ी थी। लेकिन अब दोनों गुटों के बीच जारी पहचान चिह्न की जंग पर विराम लग गया है क्योंकि दोनों ही गुटों को नया नाम आवंटित कर दिया गया है। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे को ‘ढाल और दो तलवार’ का चिह्न मिला और ‘बालासाहेबांची शिवसेना’ (बालासाहेब की शिवसेना) का नाम दिया गया है। वहीं दूसरी ओर उद्धव ठाकरे के खाते में ‘मशाल’ का चिह्न आया है और उनकी पार्टी का नाम ‘शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे)’ आवंटित हुआ है।

और पढ़े: ‘शिवसेना’ में अब अकेले बचे उद्धव ठाकरे, बड़े भाई ने भी छोड़ा साथ

निर्णय का खुले दिल से स्वागत

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने चुनाव आयोग के इस निर्णय का खुले दिल से स्वागत किया है और इस चुनाव चिह्न को छत्रपति शिवाजी महाराज और पुरानी शिवसेना से भी जोड़ दिया है। शिंदे ने कहा कि चुनाव चिह्न के लिए उनका पहला विकल्प ‘सूर्य’ था। लेकिन वो ये चुनाव चिह्न मिलने से बहुत अधिक खुश है।

उन्होंने कहा, ‘बालासाहेबांची शिवसेना आम लोगों की शिवसेना ही है। हम निर्वाचन आयोग के द्वारा आए इस फैसले को स्वीकार करते हैं। हमने पहले ‘सूर्य’ चिह्न को प्राथमिकता दी थी लेकिन चुनाव आयोग ने तलवार और ढाल को मंजूरी दे दी यह चुनाव चिह्न पुरानी शिवसेना का चुनाव चिह्न था। यह एक महाराष्ट्रियन प्रतीक माना जाता है। यह छत्रपति शिवाजी और उनके सैनिकों का भी प्रतीक है। यह चुनाव चिह्न पुरानी शिवसेना का चुनाव चिह्न था। यह महाराष्ट्र के गौरव का प्रतीक माना जाता है। यह छत्रपति शिवाजी और उनके सैनिकों का भी प्रतीक है।

और पढ़े: महाराष्ट्र की सत्ता से महाविकास अघाड़ी गठबंधन का बाहर होना, कांग्रेस की सबसे बड़ी हार है…

चुनाव चिह्न के बारे में 

अब एकनाथ शिंदे गलत भी नहीं कह रहे। साल 1968 में जब शिवसेना को राजनीति में आए हुए 2 साल हो चुके थे तब पार्टी ने ढाल और दो तलवार के चिह्न पर अपना चुनाव लड़ा था। इसका पूरा-पूरा श्रेय पार्टी संस्थापक दिवंगत बाल ठाकरे के पिता और समाज सुधारकर प्रबोधंकर केशव सीताराम ठाकरे के पक्ष में जाता है। वहीं साल 1966 में शिवसेना का निर्माण हुआ था। उसके बाद साल 1968 में मुंबई नगर निगम का चुनाव लड़ा, तब पार्टी को ढाल और तलवार का चुनाव चिह्न मिला था। वहीं साल 1980 के समय में पार्टी का चिह्न रेल इंजन था। इसके बाद ये चुनाव चिह्न बहुत अधिक चर्चाओं में आया था।

अब बात करते हैं उद्धव ठाकरे को मिलने वाले चुनाव मशाल चिह्न की, तो साल 1990 में महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में शिवसेना की ओर से इस चिह्न पर छगन भुजवल ने चुनाव लड़ा था। उस चुनाव के दौरान उन्होंने मझगांव क्षेत्र से मशाल के चिह्न पर चुनाव जीत लिया था। वैसे तो दोनों ही गुटों को शिवसेना का चुनाव चिह्न मिला है, लेकिन अगर सहीं अर्थों में देखें तो एकनाथ शिंदे को उद्धव ठाकरे से पुराना वाला चुनाव चिह्न मिला है। वहीं एकनाथ शिंदे को वो चुनाव चिन्ह दिया गया है, जो कभी बाला साहेब ठाकरे का चुनाव चिह्न हुआ करता था। साथ ही एकनाथ शिंदे को मिलने वाले नाम “बालासाहेबांची शिवसेना” पर भी ध्यान देना होगा।

और पढ़े: अंततः चुनाव चिह्न से तय हो गया कि बालासाहेब ठाकरे की विरासत को संभालने के लिए एकनाथ शिंदे ही सबसे योग्य हैं

बालासाहेब ठाकरे की हमेशा से ही एक अलग पहचान थी। बाला साहेब ने अपनी विरासत को आगे ले जाने के लिए उद्धव ठाकरे का चुनाव किया था। लेकिन उद्धव ठाकरे, बाला साहेब ठाकरे की विरासत को आगे ले जाने में असफल साबित हुए। जिस हिंदुत्व का हुंकार बाबा साहेब भरा करते थे आज उनके बेटे उद्धव ठाकरे ने अपना रास्ता बदलकर अपने ही पिता की विरासत की हंसी उड़वा दी। वहीं बाला साहेब ठाकरे को मानने वाले अधिकतर शिव सैनिक एकनाथ शिंदे की तरफ आ गए।

सही अर्थों में देखें तो बालासाहेब ठाकरे की शिवसेना (बालासाहेबांची शिवसेना) अब एकनाथ शिंदे के पाले में जा चुकी है और रही उद्धव ठाकरे की बात तो वो बस नाम के लिए बाला साहेब की विरासत संभाल रहे हैं, क्योंकि अभी पालघर के साधुओं को न्याय मिलना भी बाकी है, और जांच तो सीबीआई के हाथ में है ही।

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