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भारत की राजधानी कलकत्ता से दिल्ली कब और क्यों स्थानांतरित हुई? विस्तार से जानिए

दिल्ली को राजधानी बनाने के पीछे के क्या कारण रहे और राजधानी के रूप में अंग्रेजों ने दिल्ली को ही क्यों चुना, इस लेख में जानिए।

Devesh Sharma द्वारा Devesh Sharma
7 December 2022
in इतिहास, ज्ञान
दिल्ली राजधानी

SOURCE TFI

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भारत पर अंग्रेजों ने 200 सालों तक राज किया या यूं कहें कि 200 सालों तक यहां की धन संपदा को लूटा और अपना घर भर लिया। ब्रिटिश शासन की बात करें तो एक प्रश्न यह उठता है कि भारत में अंग्रजों की राजधानी कहां हुआ करती थी और दिल्ली को अंग्रजों ने अपनी राजधानी कब, कैसे और क्यों बनाया? इस लेख में हम जानेंगे कि दिल्ली को राजधानी बनाने के पीछे के क्या कारण रहे और राजधानी के रूप में अंग्रेजों ने दिल्ली को ही क्यों चुना।

और पढ़ें- कभी अंग्रेजों को कर्ज देता था, बाद में उनकी गुलामी करते हुए मर गया, जगत सेठ की कहानी

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व्यापारिक और राजनीतिक केंद्र था कलकत्ता

दरअसल, भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी के आने के बाद और 1757 के प्लासी के युद्ध के बाद अंग्रजों ने शुरुआत से ही कलकत्ता को अपने व्यापारिक केंद्र और राजनीतिक केंद्र के रूप में चुना था। इसके अलावा कलकत्ता को राजधानी बनाने के पीछे का कारण यहां का समुद्री तट और बंगाल की संपन्नता भी थी जहां से वे आसानी से पूरी दुनिया में व्यापार कर सकते थे। परन्तु प्रश्न यह है कि आखिर ऐसा क्या हुआ कि अंग्रजों ने अपनी राजधानी कलकत्ता से दिल्ली स्थानांतरित करने का फैसला कर लिया। हालांकि इसके कई जवाब हो सकते हैं परन्तु जो मुख्य कारण हैं वे हैं 1857 का स्वतंत्रता संग्राम, 1905 का बंगाल विभाजन और भारत के अन्य भागों पर नियंत्रण करना।

1857 की क्रांति से तो आप सभी परिचित होंगे ही किस प्रकार यह मंगल पांडे के प्रयास से शुरू होकर धीरे-धीरे पूरे भारत में फैल जाती है और अंग्रेजी सत्ता की जड़ों को हिलाकर रख देती है। इस 1857 की क्रांति को संचालित करने का काम दिल्ली ने ही किया था। इस क्रांति के बाद अंग्रेजों को आभास हो चुका था कि अगर भारत पर राज करना है तो यहां के लोगों की एकजुटता को तोड़ना होगा इसलिए 1905 में अंग्रेजों ने बंगाल को दो भागों में बांट दिया जिसे बंगभंग के नाम से भी जाना जाता है। हालांकि इसके जवाब में वहां के लोगों ने आंदोलन भी किए परन्तु बंगाल को एक न कर सके।

और पढ़ें- अंग्रेजों ने सुनियोजित तरीके से भारत की टेक्सटाइल इंडस्ट्री को बर्बाद क्यों किया?

गर्मियों के लिए शिमला थी राजधानी

इसके अलावा राजधानी स्थानंतरित करने का तीसरा कारण है भारत के दूसरे राज्यों पर निंयत्रण करना और वहां की धन-संपदा को लूटना। दिल्ली को राजधानी बनाने का एक कारण यह भी बताया जाता है कि अंग्रेजों को एक ऐसा स्थान चाहिए था जहां वे सभी प्रकार के मौसम में रह सकें। परन्तु दिल्ली तो इस प्रकार का शहर नहीं है जहां का मौसम समान रहता हो, यहां तो गर्मी और सर्दी दोनों ही भयंकर पड़ती हैं। हालांकि दिल्ली को राजधानी बनाने के बाद भी अंग्रेजों ने गर्मियों के लिए शिमला को अपनी राजधानी के रूप में चुना।

दरअसल, दिल्ली को राजधानी बनाने की आधिकारिक शुरुआत वॉयसराय जॉर्ज पंचम के राज तिलक के साथ होती है। उत्तरी दिल्ली के किंग्स वे कैंप, जिसे आज हम गुरु तेग बहादुर नगर के नाम से जानते हैं, यहीं पर 1911 में जॉर्ज पंचम का वॉयसराय के रूप में राजतिलक किया गया था और दिल्ली को आधिकारिक रूप से राजधानी बनाने की घोषणा की गई थी।

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दिल्ली के सरकारी भवनों के बारे में

इसके इतर एक प्रश्न यह है कि दिल्ली में आज हम जिन सरकारी भवनों को देखते हैं उन्हें किस प्रकार बनवाया गया और राजधानी बनाने का निर्णय कितना सही था। हालांकि दिल्ली के जिन सरकारी भवनों को हम देखते हैं वे 1931 में बनकर तैयार हुए थे। परन्तु तब तक अस्थाई रूप से उत्तरी दिल्ली में सचिवालय भवन का निर्माण किया गया जहां से 1931 तक अंग्रेजी सरकार को चलाया गया।

दिल्ली को राजधानी बनाने के वाले वास्तुकारों के बारे में बात की जाए तो हमारे सामने लुटियंस और बेकर ये दो नाम आते हैं। असल में इन दोनों वास्तुकारों ने ही रायसिना पहाड़ी पर बने वाइसराय भवन यानी आज के राष्ट्रपति भवन से लेकर संसद भवन और तमाम सरकारी भवनों की रुपरेखा तैयार की। राष्ट्रपति भवन और संसद भवन को लेकर कहा जाता है कि ये दोनों भारतीय वास्तुकला से प्रवाभित होकर ही बनाए गए थे परन्तु अंग्रेजों ने इस बात को कभी स्वीकार नहीं किया। भवनों के निर्माण में आए व्यय के बारे में बताया जाता है कि इसमें 10 करोड़ से अधिक रुपये खर्च हुए थे।

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यदि दिल्ली को राजधानी बनाने के फैसले को अच्छे से समझा जाए तो यह एक अत्यन्त खर्चीला और सत्ता की लोलुपता के कारण लिया गया फैसला था। क्योंकि यह तो स्पष्ट है कि दिल्ली भौगोलिक दृष्टी से एक ऐसा स्थान है जहां न कोई तटीय क्षेत्र है न तो कोई विशेष जलवायु। यानी इस फैसले के लिए यह कह सकते हैं कि अंग्रेजों का लिया गया यह एक मूर्खतापूर्ण फैसला था।

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