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देवी-देवताओं की मूर्तियां, सनातन परंपराओं की झलक’… नंगी आंखों से दिखते हैं सबूत, फिर भी विवादित क्यों है भोजशाला?

ASI ने 98 दिनों तक सर्वे करने के बाद जो रिपोर्ट दी थी उसके अनुसार भोजशाला में कभी साहित्यिक और शैक्षणिक गतिविधियों से जुड़ी एक विशाल संरचना मौजूद थी

Sambhrant Mishra द्वारा Sambhrant Mishra
23 January 2026
in भारत, राजनीति
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को भोजशाला में सरस्वती पूजन और जुमे की नमाज को एक साथ करवाए जाने की अनुमति दी थी

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को भोजशाला में सरस्वती पूजन और जुमे की नमाज को एक साथ करवाए जाने की अनुमति दी थी

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धार की भोजशाला एक बार फिर से सुर्खियों में है- वजह है बसंत पंचमी (सरस्वती पूजा )और शुक्रवार (जुमे की नमाज) का एक ही दिन पड़ना। 
हालांकि ये इत्तिफाक पहले भी कई बार हो चुका है जब हिंदू पंचांग के अनुसार बसंत पंचमी शुक्रवार को ही पड़ी और जब-जब ऐसा हुआ हिंदू-मुस्लिम तनाव भी उसी अनुपात में बढ़ गया और कई मौके ऐसे आए जब भोजशाला में पूजा और नमाज़ के विवाद को लेकर दंगे भी भड़के।

इस बार भी सुप्रीम कोर्ट ने पूजा और नमाज़ को लेकर स्पष्ट आदेश जारी किया है। कोर्ट ने बसंत पंचमी के दिन हिंदू पक्ष को सूर्योदय से सूर्यास्त तक मां सरस्वती (वाग्देवी) की पूजा की पूरी छूट दी है, जबकि मुस्लिम पक्ष को भी दोपहर 1 से 3 बजे तक जुमे की नमाज अदा करने की अनुमति दी गई है। कोर्ट ने प्रशासन को आदेश दिए हैं कि वो भोजशाला के उसी परिसर में दोनों पक्षों के लिए अलग-अलग जगह तय करे जहां पूजा भी हो सके और नमाज़ भी। 

 भोजशाला की आंखों-देखी

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एक ही परिसर में पूजा और नमाज़?
इंदौर से धार जाते वक्त ये सवाल मेरे दिमाग़ में भी पूरे वक्त घूमता रहा (वर्ष 2023 में विधान सभा चुनावों के सिलसिले में मध्य प्रदेश को जी भर घूमने का अवसर मिला तो धार जाने और भोजशाला को देखने का लालच नहीं छोड़ सका)।
इंदौर से क़रीब ढाई घंटे की दूरी पर मौजूद धार शांत और ख़ूबसूरत सा शहर है, जिसने इतिहास के कई गौरवशाली अध्याय अपने दामन में खामोशी से संजो रखे हैं- भोजशाला भी उन्ही में से एक है, लेकिन विवादित।

इतिहासकारों के अनुसार भोजशाला का संबंध परमार वंश के प्रतापी राजा भोज से है, जिन्होंने 11वीं सदी में धार को शिक्षा और संस्कृति का बड़ा केंद्र बनाया। कई विद्वान मानते हैं कि यहाँ सरस्वती सदन या गुरुकुल जैसा एक विशाल शैक्षणिक परिसर था, जहाँ वेद, व्याकरण, दर्शन और शास्त्रों की शिक्षा दी जाती थी। यही कारण है कि हिंदू आज भी मां वाग्देवी (सरस्वती) को इस स्थान की अधिष्ठात्री देवी के रूप में पूजते हैं।

भोजशाला फ़िलहाल ASI के अधीन है, लेकिन यहां टिकट लेकर कोई भी जा सकता है। 

टिकट लेकर जैसे ही अंदर दाखिल हुआ- पहली ही नजर में मंदिर की संरचना नज़र आई। ख़ासकर मुख्य बारादरी (जहां नमाज़ और पूजा दोनों होती हैं) की दीवारें, खंभे और मंडप—सब कुछ मानो बिना बोले अपना इतिहास बता रहे हों। ज़रा-सी नज़रें गड़ाएं तो पत्थरों पर उकेरे गए चिन्ह, प्रतीक और आकृतियाँ यह बताने लगती हैं कि यह स्थल किस परंपरा से जुड़ा रहा है। कहीं शिव के संकेत दिखते हैं, कहीं ‘ॐ’ और कहीं ‘राम’ जैसे शब्द। पूरा ढांचा परमार कालीन स्थापत्य की छाप लिए खड़ा है। मुस्लिम पक्ष जिसे मिहराब या किबला बताता है (किबला की तरफ़ मुँह करके नमाज़ पढ़ी जाती है ) वो जगह ज़रूर अलग से बनाई गई लगती है। लेकिन यहां भी अगर ऊपर की तरफ़ नज़र डालें तो भव्य डोम और उसमें दर्ज कलाकृतियों को देखकर इसकी पहचान से जुड़े बाकी संदेह भी खत्म हो जाते हैं। 
इस छोटे से परिसर में कुछ देर बिताते ही इस प्रश्न का उत्तर मिल जाता है कि इस स्थल का मूल स्वरूप क्या रहा होगा?

नंगी आंखों से देखे जा सकने वाले इन बुनियादी तथ्यों को Archaeological Survey of India (ASI) ने भी अपने वैज्ञानिक सर्वे के जरिए पुष्ट किया है, लेकिन दुर्भाग्य से ये जगह अभी भी विवादित बनी हुई है।

ASI के सर्वे ने वही बताया जो हिंदू बता-बता कर थक गए हैं

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने मार्च 2023 में ASI को भोजशाला के वैज्ञानिक सर्वे का आदेश दिया था, ताकि इस जगह के मूल स्वरूप के बारे में जानकारी जुटाई जा सके। इसके बाद वर्ष 2024 में ASI ने भोजशाला में लगातार 98 दिनों तक सर्वे किया, जो मंदिर बनाम मस्जिद की इस बहस का सबसे ठोस आधार बनकर सामने आया। 
हाईकोर्ट में पेश की गई ASI की रिपोर्ट बताती है कि भोजशाला की मौजूदा संरचना पहले से मौजूद मंदिरों के हिस्सों से बनाई गई है। 
सर्वे के दौरान ASI ने लगभग 1,700 पुरातात्विक अवशेष जुटाए थे, जिनमें 94 मूर्तियाँ, मूर्तियों के टुकड़े, स्तंभ, पुरानी बीम, प्लास्टर और शिलालेख शामिल हैं। ASI ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि, “चार भुजाओं वाले देवताओं की मूर्तियाँ खिड़कियों, स्तंभों और बीमों पर उकेरी गई थीं, जिन्हें मौजूदा संरचना में उपयोग किया गया। इनमें गणेश, अपनी सहचारियों के साथ ब्रह्मा, नरसिंह, भैरव, देवी-देवता, मानव और पशु आकृतियाँ शामिल हैं। विभिन्न माध्यमों में उकेरे गए पशुओं में सिंह, हाथी, घोड़ा, कुत्ता, बंदर, साँप, कछुआ, हंस और पक्षी शामिल हैं…”

यही नहीं ASI की रिपोर्ट बताती है कि कई स्तंभों पर उकेरी गई मानव और पशु आकृतियों को बाद में छेनी से हटा दिया गया, क्योंकि मस्जिदों में ऐसी आकृतियों की अनुमति नहीं होती। लेकिन दिलचस्प बात यह है कि कई स्थानों पर कीर्तिमुख, देवी-देवताओं की छोटी आकृतियाँ अब भी सुरक्षित हैं (शायद नज़र नहीं पड़ी होगी)। ASI ने अपनी रिपोर्ट में लिखा कि सजाए गए स्तंभों और प्लास्टरों की कला और वास्तुकला के आधार पर “यह कहा जा सकता है कि वे पहले के मंदिरों का हिस्सा थे और उन्हें मस्जिद के कॉलोनेड बनाने के लिए फिर से प्रयोग में लिया गया।” 

भोजशाला की पश्चिमी बारादरी (जहां पूजा और नमाज़-दोनों होती हैं) के बारे में भी ASI की रिपोर्ट कहती है कि यहाँ स्थित मिहराब को बाद में बनाया गया और उसकी निर्माण सामग्री भोजशाला के बाकी ढांचे से अलग है। इस अंतर को कोई भी सामान्य व्यक्ति आसानी से महसूस भी कर सकता है।

ASI की ये रिपोर्ट लिखती है कि, “वैज्ञानिक जांच, सर्वेक्षण और पुरातात्विक खुदाइयों, प्राप्त अवशेषों के अध्ययन और विश्लेषण, स्थापत्य अवशेषों, मूर्तियों, शिलालेखों, कला और शिल्प के अध्ययन के आधार पर यह कहा जा सकता है कि मौजूदा संरचना पहले के मंदिरों के हिस्सों से बनाई गई है।”

संरचना के स्वरूप और आयु को लेकर ASI रिपोर्ट में कहा गया है कि “प्राप्त स्थापत्य अवशेष, मूर्तिकला के खंड, साहित्यिक ग्रंथों वाले बड़े शिलालेख, स्तंभों पर नागकर्णिका शिलालेख आदि इस बात का संकेत देते हैं कि इस स्थल पर साहित्यिक और शैक्षणिक गतिविधियों से जुड़ी एक विशाल संरचना मौजूद थी।” ध्यान दीजिएगा – साहित्यिक और शैक्षणिक गतिविधियों से जुड़ी विशाल संरचना।
रिपोर्ट में कहा गया है, “वैज्ञानिक जांच और जांच के दौरान प्राप्त पुरातात्विक अवशेषों के आधार पर, इस पूर्ववर्ती संरचना को परमार काल का माना जा सकता है।”

खिलजी का हमला और भोजशाला का विध्वंस

इतिहासकारों के अनुसार अलाउद्दीन खिलजी ने अपने साम्राज्य विस्तार के दौरान 13वीं सदी में मालवा (धार) पर भी हमला किया था। कहा जाता है कि इस दौरान उसकी सेना ने वहां असंख्य मंदिरों का भी विध्वंस किया और भोजशाला भी इन्ही में से एक थी। हालांकि विघ्वंस के बावजूद भोजशाला को लेकर हिंदुओं की आस्था बनी रही और पूजा-पाठ का क्रम भी जारी रहा। बाद में 1514 में महमूद खिलजी द्वितीय के समय भोजशाला के अंदर ही कमाल मौला मस्जिद का निर्माण कर दिया गया। 
वहीं मुस्लिम पक्ष का कहना है कि भोजशाला हमेशा से कमाल मौला मस्जिद ही थी और वहां सदियों से नमाज़ होती रही है।

लेकिन ASI के निष्कर्ष एक बार फिर यह सवाल उठाते हैं कि क्या किसी स्थल पर बाद की धार्मिक गतिविधियाँ उसके मूल चरित्र को बदल सकती हैं?
और सवाल ये भी हैं कि अगर सबूत इतने स्पष्ट हैं कि उन्हें नंगी आखों से देखा जा सकते हैं, तो फिर विवाद है ही क्यों?

Tags: Bhojshala disputereligious freedomSocial Harmonysuprem court of indiaनमाज़बसंत पंचमीभोजशालासुप्रीम कोर्ट
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