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गाजा पीस बोर्ड: क्या इस्लामी ‘उम्माह’ के साथ दग़ाबाज़ी कर रहा है पाकिस्तान ? पूर्व सैनिकों की ‘सेना प्रमुख’ और ‘सरकार’ को खुली धमकी


पाकिस्तान के हुक्मरानों ने भारत के ख़िलाफ़ हज़ार वर्ष की जंग को भड़काए रखने के लिए उम्माह और इस्लामी विरासत की जो अफ़ीम चटाई है, उसका 'साइड इफेक्ट' नज़र आने लगा है

Sambhrant Mishra द्वारा Sambhrant Mishra
20 February 2026
in चर्चित, भू-राजनीति, वेस्ट एशिया
गाजा पीस बोर्ड: क्या इस्लामी ‘उम्माह’ के साथ दग़ाबाज़ी कर रहा है पाकिस्तान ? पूर्व सैनिकों की ‘सेना प्रमुख’ और ‘सरकार’ को खुली धमकी


गाजा पीस बोर्ड में शहबाज शरीफ के शामिल होने की पाकिस्तान के पूर्व सैनिकों ने आलोचना की है

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वॉशिंगटन डीसी में आयोजित ‘गाज़ा पीस बोर्ड’ की बैठक से जुड़ा एक वीडियो सोशल मीडिया पर तेज़ी से वायरल है। वीडियो में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ एक औपचारिक सभा के दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति के संकेत पर उठते और उन्हें सलामी देते दिखाई देते हैं। कूटनीतिक प्रोटोकॉल में शिष्टाचार असामान्य नहीं माना जाता, लेकिन इस दृश्य ने पाकिस्तान के भीतर एक अलग ही राजनीतिक और भावनात्मक प्रतिक्रिया को जन्म दिया है, क्योंकि यह घटना ऐसे समय सामने आई जब पाकिस्तान खुद को मुस्लिम दुनिया के समर्थक के रूप में पेश करता रहा है।
यह प्रतिक्रिया केवल सोशल मीडिया तक सीमित नहीं रही। उसी दौरान पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय द्वारा जारी आधिकारिक प्रेस विज्ञप्ति में बताया गया कि प्रधानमंत्री अमेरिका की यात्रा पर “बोर्ड ऑफ पीस” के उद्घाटन सत्र में भाग लेने जा रहे हैं और अंतरराष्ट्रीय साझेदारों के साथ शांति प्रयासों पर चर्चा करेंगे। 

इसी दौरान पाकिस्तान के उप प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री भी न्यू यॉर्क में थे, जहां संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में फ़िलिस्तीन पर पाकिस्तान की “सिद्धांत आधारित” स्थिति दोहराने की भी बात कही गई।
यानी कागज़ पर पाकिस्तान फ़िलिस्तीन के समर्थन में खड़ा दिखाई देता है, लेकिन व्यवहार में वह एक ऐसी व्यवस्था का हिस्सा बनने जा रहा है जिसे लेकर उसके अंदर से ही बग़ावत के सुर उठने लगे हैं।

क्या इस्लामी ‘उम्माह’ को दग़ा दे रहा है पाकिस्तान?

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गाजा पीस बोर्ड में शामिल होने को लेकर सबसे तीखी प्रतिक्रिया पाकिस्तान के पूर्व सैनिकों के संगठन की ओर से आई। संगठन ने एक लंबा और बेहद तीखा प्रेस नोट जारी किया जिसमें सेना और नेतृत्व से कई चुभते हुए सवाल पूछे गए। 

प्रेस नोट में सैनिकों को संबोधित करते हुए लिखा गया:
“आप इस पवित्र भूमि के रक्षक हैं… आप सिर्फ सैनिक नहीं हैं, आप मुस्लिम राष्ट्र पाकिस्तान का धड़कता दिल हैं… जिसे अल्लाह ने इस्लाम और न्याय की रक्षा की जिम्मेदारी दी है।”
संगठन ने सीधे आरोप लगाया है कि गाज़ा से जुड़े अंतरराष्ट्रीय तंत्र में पाकिस्तान की भागीदारी “इस्लाम के शत्रुओं के साथ खड़े होने” के समान है। उन्होंने सैनिकों से इस पहल का समर्थन न करने की अपील की और यहां तक कहा कि ऐसा करने वालों को न इतिहास माफ़ करेगा न उम्माह।”

आगे लिखा गया है कि, “गाजा पीस बोर्ड में पाकिस्तान और पाकिस्तानी संस्थाएं यहूदी (ज़ायनिस्ट) और ईसाई साथ बैठकर अल-क़ुद्स के कब्ज़ेदारों को वैधता दे रहे हैं, जबकि उत्पीड़ित फ़िलिस्तीनियों की असली आवाज़ को बाहर रखा गया है।
इस इकाई में पाकिस्तान की भागीदारी इस्लाम के शत्रुओं के साथ हाथ मिलाने के समान है।”

पूर्व सैनिकों की संस्था ने सिर्फ सरकार को ही नहीं सेना प्रमुख आसिम मुनीर को भी हिदायत दी है।
इस प्रेस नोट में लिखा गया है कि, “सेना को इस गठबंधन को तुरंत और बिना शर्त अस्वीकार करना चाहिए और सेना को !
अपनी पवित्र वर्दी, हथियार, रक्त या मौन सहमति इस विश्वासघाती बोर्ड के नाम नहीं करनी चाहिए।”

बकायदा धमकी भरे अंदाज़ में सेना को कहा गया है कि अगर “सेना इस दबाव के आगे झुकती है और इस विरोधी-इस्लामी मंच में यहूदियों और ईसाइयों के साथ हाथ मिलाती है, तो राष्ट्र आपको न भूलेगा और न माफ़ करेगा।”

पूर्व सैनिकों की यह भाषा सामान्य सैन्य आलोचना से कहीं आगे जाती है। यही वह बिंदु है जहां पाकिस्तान की आंतरिक राजनीति और उसकी वैचारिक पहचान टकराती दिखाई देती है।

शहबाज़ शरीफ के आगे कुआं पीछे खाईं- ट्रम्प की सुनें या ‘उम्माह’ की?


पाकिस्तान की स्थापना की वैचारिक कहानी अक्सर “इस्लामी पहचान” पर आधारित राष्ट्र के रूप में प्रस्तुत की जाती है। सेना प्रमुख असीम मुनीर भी कई भाषणों में पाकिस्तान को “कलमे की बुनियाद पर बनी दूसरी रियासत” बता चुके हैं।
लेकिन गाज़ा संकट ने इस दावे की व्यावहारिक सीमा उजागर कर दी है।
एक ओर सरकार अंतरराष्ट्रीय मंचों पर फ़िलिस्तीन के समर्थन की बात कर रही है। दूसरी ओर वही सरकार एक ऐसे शांति ढांचे में शामिल हो रही है जिसमें पश्चिमी शक्तियाँ केंद्रीय भूमिका निभा रही हैं और संभावित रूप से शांति-रक्षा या सुरक्षा सहयोग के नाम पर सैन्य भागीदारी की संभावना भी बनती है।
पूर्व सैनिकों का आरोप इसी विरोधाभास पर केंद्रित है कि पाकिस्तान की सेना से उम्माह और मुस्लिम मुद्दे के नाम पर समर्थन लिया जाता है, लेकिन रणनीतिक फैसले आर्थिक और कूटनीतिक स्वार्थ के आधार पर होते हैं।

‘इस्लामी’ पहचान और अमेरिका पर रणनीतिक निर्भरता

पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था लंबे समय से बाहरी सहायता पर निर्भर रही है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष, खाड़ी देशों और पश्चिमी सहयोगियों के बिना उसकी वित्तीय स्थिरता अक्सर संकट में पड़ जाती है।
यही कारण है कि विदेश नीति में वैचारिक बयानबाज़ी और व्यावहारिक निर्णयों के बीच अंतर दिखाई देता है। गाज़ा मुद्दे पर पाकिस्तान का यही पैटर्न दिखता है। भारत के ख़िलाफ़ भावनाएं भड़काने और जिहाद प्रेरित आतंकवाद को बढ़ावा देने के लिए तो पाकिस्तान उम्माह और इस्लाम की अवधारणा का बढ़-चढ़ का प्रचार करता है, लेकिन वास्तविक रूप में वो इन विचारों पर हमेशा से पैसों और अपने निजी हितों को तरजीह देता रहा है, फिर चाहे जॉर्डन की सेना की तरफ़ से फिलिस्तीनियों के खिलाफ़ लड़ना हो या फिर अफ़ग़ानिस्तान में अमेरिका के साथ तालिबान के ख़िलाफ़ लड़ना हो (जिसे अक्सर वो आतंक के ख़िलाफ़ जंग का नाम देता है)।

वैसे ये स्थिति पाकिस्तान द्वारा ख़ुद आमंत्रित की गई है। वहां सरकार और सेना द्वारा भारत के ख़िलाफ़ युद्ध को भड़काए रखने के लिए जनता को उम्माह और इस्लामी राज्य की जो अफ़ीम चटाई गई है, उसका नशा इतना गाढ़ा हो चुका है कि अब जनता सामान्य व्यवहारिकता और अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति या सामान्य अर्थनीति समझने को भी तैयार नहीं है और ये प्रेस नोट उसी का साइड इफेक्ट है।
सेना के भीतर संभावित असंतोष?
पूर्व सैनिक संगठन की अपील सीधे सैनिकों को संबोधित करती है, जो किसी भी सैन्य ढांचे के लिए संवेदनशील स्थिति मानी जाती है।
हालांकि वास्तविक विद्रोह की संभावना को बढ़ा-चढ़ाकर भी देखा जा सकता है, लेकिन यह स्पष्ट है कि वैचारिक स्तर पर असहजता तेजी से बढ़ रही है। यह पहली बार नहीं है जब पाकिस्तान में विदेश नीति और धार्मिक भावना आमने-सामने आई हो। परंतु इस बार फर्क यह है कि ये आलोचनाएं बाहर से नहीं बल्कि उन लोगों से ज़रिए आई हैं, जो ख़ुद सेना का हिस्सा रहे हैं। स्वाभाविक है जल्दी ही ये आवाज़ आम जनता तक भी पहुंचेगी और वो भी शहबाज़ शरीफ और आसिम मुनीर से यही सवाल पूछेगी।

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