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क्या जस्टिस यशवंत वर्मा को ‘नोट कांड’ में जबरन फँसाया गया, पढ़ें 13 पन्नों के ‘उस लेटर’ की इनसाइड स्टोरी?

जजेस इन्क्वायरी कमेटी को लिखे गए एक लंबे पत्र में न केवल जाँच की प्रक्रिया पर सवाल उठाए गए हैं बल्कि इसे 'अन्यायपूर्ण' और 'एकतरफा' भी बताया है।

Sambhrant Mishra द्वारा Sambhrant Mishra
10 April 2026
in चर्चित, भारत
जस्टिस वर्मा ने अपने खिलाफ हुई जाँच पर उठाए सवाल

जस्टिस वर्मा ने अपने खिलाफ हुई जाँच पर उठाए सवाल

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घर पर जले हुए नोट मिलने के विवाद में घिरे इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज जस्टिस यशवंत वर्मा ने अपने पद से इस्तीफा (Justice Yashwant Verma Resigns) दे दिया है। उन्होंने राष्ट्रपति को संबोधित करते हुए अपना त्यागपत्र सौंपा और तत्काल प्रभाव से पद छोड़ने की घोषणा कही है। इस बीच उन्होंने इस मामले की जाँच करने वाली जजों की समिति को एक पत्र लिखा है जिसके बाद कई तरह के सवाल खड़े हुए हैं।

यह घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आया है जब उनके खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया पहले से ही चल रही थी। इससे पहले उन्हें दिल्ली हाईकोर्ट से ट्रांसफर कर उनके मूल कोर्ट इलाहाबाद हाईकोर्ट भेज दिया गया था। जस्टिस वर्मा ने 5 अप्रैल 2025 को इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायाधीश के रूप में शपथ ली थी।

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अब तक क्या हुआ?

दरअसल, यह पूरा मामला 14 मार्च 2025 का है जब दिल्ली स्थित जस्टिस वर्मा के आधिकारिक आवास के एक स्टोररूम में अचानक आग लग गई थी। आग बुझाने के दौरान वहाँ से बड़ी मात्रा में नकदी बरामद हुई जिनमें कई नोट आंशिक रूप से जले हुए थे। इस बरामदगी ने पूरे न्यायिक तंत्र में हलचल मचा दी थी।

मामले की गंभीरता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश ने एक इन-हाउस जाँच समिति का गठन किया था। जाँच के बाद इस समिति ने जस्टिस वर्मा को पद से हटाने की सिफारिश की थी। इसके बाद मार्च 2025 के अंत में उनका दिल्ली हाईकोर्ट से इलाहाबाद हाईकोर्ट में ट्रांसफर कर दिया गया।

हालाँकि, उस समय जस्टिस वर्मा ने इस्तीफा देने से इनकार कर दिया था। इसके बाद संसद में उनके खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया शुरू हुई। लोकसभा के 146 सदस्यों ने उनके खिलाफ प्रस्ताव पर हस्ताक्षर किए जिसके आधार पर लोकसभा अध्यक्ष ने जजों की जाँच के लिए कानून के तहत एक 3 सदस्यीय समिति का गठन किया। इस समिति की जाँच प्रक्रिया अभी जारी थी।

जस्टिस वर्मा का सनसनीखेज लेटर

जस्टिस यशवंत वर्मा ने 9 अप्रैल 2026 को इस मामले की जाँच करने वाली जजों की समिति को एक पत्र लिखा है। जजेस इन्क्वायरी कमेटी को लिखे गए एक लंबे पत्र में उन्होंने न केवल जाँच की प्रक्रिया पर सवाल उठाए बल्कि इसे ‘अन्यायपूर्ण’ और ‘एकतरफा’ भी बताया है।

उन्होंने इस पत्र में लिखा है कि जब वह 12 मार्च 2025 को होली की छुट्टियों में बाहर गए हुए थे तब उनके आवास के एक स्टोर रूम में आग लगी और वहाँ कुछ चीज़े रिकॉर्ड की गईं। उन्होंने लिखा, “मुझे इस घटना की जानकारी 15 मार्च 2025 को रात करीब 1:10–1:15 बजे मिली, तब तक आग बुझाई जा चुकी थी और फोटो-वीडियो रिकॉर्ड हो चुके थे। मुझे इन रिकॉर्डिंग्स या नकदी के बारे में पहले कोई जानकारी नहीं थी।”

जस्टिस वर्मा ने लिखा, “17 मार्च 2025 को मुझे इन वीडियो/फोटो के बारे में बताया गया और यह भी कहा गया कि जाँच चल रही है। इसके तुरंत बाद ये वीडियो सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट पर डाल दिए गए और मीडिया में इस खबर को इस तरह दिखाया गया कि यह नकदी मेरी है।”

‘स्टोर रूम’ के बारे में जस्टिस वर्मा ने क्या बताया?

जस्टिस वर्मा ने बताया कि स्टोर रूम घर से अलग बना हुआ था जो स्टाफ क्वार्टर के पास था और दीवारों से उनके रहने वाले हिस्से और ऑफिस से अलग था। उन्होंने कहा कि वहाँ पीछे के गेट से जाया जा सकता था और वहाँ कोई सुरक्षा तैनात नहीं थी।

उनके मुताबिक, इस स्टोर रूम का इस्तेमाल घरेलू स्टाफ, मेंटेनेंस कर्मियों और अन्य लोग करते थे और वहाँ आम सामान जैसे पुराना फर्नीचर, बोतलें, बर्तन, गद्दे, कालीन, स्पीकर, बागवानी के औजार और CPWD का सामान रखा जाता था। उन्होंने यह भी बताया कि यह स्टोर रूम अक्सर खुला रहता था और अगर बंद भी होता था तो उसकी चाबी उनके पास नहीं होती थी। वे खुद दो साल में केवल 4-5 बार ही वहाँ गए थे।

उन्होंने आगे कहा कि स्टोर रूम के बाहर CCTV कैमरा लगा था जिसकी फुटेज गार्ड रूम में रिकॉर्ड होती थी लेकिन यह पूरा सिस्टम उनके नियंत्रण में नहीं था। CRPF गार्ड और निजी सुरक्षा अधिकारी भी उन्हें नहीं बल्कि अन्य अधिकारियों को रिपोर्ट करते थे। जस्टिस वर्मा के मुताबिक, उन्होंने कई बार CCTV फुटेज की कॉपी माँगी लेकिन उन्हें नहीं दी गई।

जस्टिस वर्मा ने कहा कि सिर्फ दो बातों ‘स्टोर रूम का होना और वहाँ नकदी मिलने’ के आधार पर ही उन्हें दोषी मान लिया गया। उन्होंने बताया कि अपने 13 साल से अधिक के पूरे न्यायिक करियर में उनके खिलाफ कभी भी भ्रष्टाचार या गलत आचरण का कोई आरोप नहीं लगा है।

जाँच और जाँच समिति पर जस्टिस वर्मा ने उठाए सवाल

जस्टिस वर्मा के अनुसार, इस पूरे मामले के दौरान उन्होंने कई बार यह माँग की कि एक न्यायिक ऑडिट कराया जाए जिससे यह पता लगाया जा सके कि जो आरोप लगाए जा रहे हैं वे सही भी हैं या नहीं। हालाँकि, उनकी इस माँग को नजरअंदाज कर दिया गया।

उन्होंने बताया कि अगस्त 2025 में बनी इस कमेटी से पहले 22 मार्च 2025 से 4 मई 2025 के बीच एक इन-हाउस कमेटी (IHC) ने जाँच की थी। उस जाँच में गवाहों की गवाही उनके सामने नहीं हुई और उन्हें जिरह (cross-examination) का मौका भी नहीं दिया गया। IHC ने 4 मई 2025 को अपनी रिपोर्ट सौंप दी।

जस्टिस वर्मा ने आगे कहा कि बाद में सुप्रीम कोर्ट में यह स्पष्ट किया गया कि IHC की जाँच केवल प्रारंभिक थी जिसका उद्देश्य सिर्फ यह देखना था कि संबंधित जज से न्यायिक काम वापस लिया जाए या नहीं। उन्होंने कहा कि IHC की रिपोर्ट और उसका कंटेंट गोपनीय होनी चाहिए थे और इसे केवल मुख्य न्यायाधीश, राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री जैसे उच्च पदों तक ही सीमित रहना चाहिए था ना कि इसे सार्वजनिक नहीं किया जाना चाहिए था।

उन्होंने बताया कि अगस्त 2025 में इस समिति का गठन हुआ और नवंबर 2025 में उन्हें उनके खिलाफ लगाए गए आरोपों का जवाब देने के लिए नोटिस दिया गया। उन्होंने कहा कि इस नोटिस से ही साफ हो गया था कि इस जाँच में वही कंटेंट इस्तेमाल हो रहा है जो पहले इन-हाउस कमेटी (IHC) ने अपनी जाँच में जुटाया था। जिन गवाहों को बुलाया गया वे भी वही थे जो IHC के सामने पेश हुए थे।

जस्टिस वर्मा के अनुसार, उन्हें उम्मीद थी कि अगर इन दस्तावेजों का इस्तेमाल किया जाएगा तो उन गवाहों को भी पेश किया जाएगा ताकि वे उनसे जिरह कर सकें और कई पहलुओं पर सवाल उठा सकें। उन्होंने आगे कहा कि उनके खिलाफ की गई कार्यवाही बिना सीधे आरोप लगाए, इशारों, संदेहों और धारणाओं पर आधारित रही। उनसे यह अपेक्षा की गई कि वे पहले से मान ली गई बातों और कई अनुमानों को गलत साबित करें।

जस्टिस वर्मा ने कहा कि शुरुआत से ही जो आरोप लगाए गए, वे इस बात पर भी आधारित नहीं थे कि 14/15 मार्च 2025 की रात जो कथित नकदी मिली, वह उनकी थी या उनकी जानकारी और सहमति से वहाँ रखी गई थी और ऐसा कोई आरोप या सबूत तक नहीं था। उन्होंने बताया कि इसके बावजूद उन्हें एक साल से ज्यादा समय तक लगातार बदनाम किया गया जबकि ये आरोप इतने कमजोर थे कि सामान्य परिस्थितियों में कोई अदालत भी उन पर संज्ञान लेने लायक नहीं मानती।

फायर रिपोर्ट पर जस्टिस वर्मा की चिंता

जस्टिस वर्मा ने कहा कि इस कार्यवाही में उन्हें सबसे ज्यादा चिंता इस बात से हुई कि IHC की सामग्री को किस तरह इस्तेमाल किया गया। उनके अनुसार, जो सामग्री उनके खिलाफ जा सकती थी, उसे चुना गया और इस्तेमाल किया गया, जबकि जो सामग्री उनके पक्ष में थी जैसे आधिकारिक फायर रिपोर्ट उसे बिना किसी कारण के हटा दिया गया।

उन्होंने बताया कि इस फायर रिपोर्ट में कहीं भी नकदी का कोई जिक्र नहीं है और इसमें यह भी दिखता है कि अधिकारी रात 1:56 बजे तक मौके पर मौजूद थे जो आग बुझने के काफी बाद का समय है। इसके बावजूद उन्हें इस रिपोर्ट को गवाहों की जिरह के दौरान पेश करने की अनुमति भी नहीं दी गई। उन्होंने कहा कि इस तरह एक आधिकारिक और विश्वसनीय दस्तावेज को नजरअंदाज करना सच तक पहुँचने की प्रक्रिया के खिलाफ है।

उन्होंने यह भी बताया कि IHC के सामने पेश हुए 54 गवाहों में से 27 को बिना कोई कारण बताए हटा दिया गया। इनमें से कई ऐसे गवाह थे जिनकी गवाही उनके खिलाफ नहीं थी और जो पूरी घटना की सही तस्वीर सामने ला सकते थे।

गवाहों को हटाने पर जस्टिस वर्मा ने क्या बताया?

जस्टिस वर्मा ने बताया कि उनके खिलाफ आरोपों से जुड़े सबूतों की रिकॉर्डिंग 6 फरवरी 2026 से शुरू हुई और 17 मार्च 2026 को खत्म हुई। इस छोटे समय में गवाहों के साथ जिस तरह व्यवहार हुआ, उसमें एक चिंताजनक पैटर्न सामने आया।

उन्होंने कहा कि सबसे पहले दिल्ली फायर सर्विस के अधिकारियों की गवाही हुई। जिरह के दौरान यह सामने आया कि 15 मार्च 2025 की रात करीब 12:15 बजे ही वरिष्ठ अधिकारियों असिस्टेंट डिविजनल ऑफिसर सुमन कुमार और डिविजनल ऑफिसर राजिंदर अटवाल ने यह फैसला ले लिया था कि नकदी मिलने की बात किसी आधिकारिक रिकॉर्ड में दर्ज नहीं की जाएगी। जस्टिस वर्मा ने कहा कि उस समय तक उन्हें आग की घटना की जानकारी भी नहीं थी और इसलिए इसमें उनकी कोई भूमिका नहीं हो सकती। लेकिन यह तथ्य सामने आने के तुरंत बाद गवाह के रूप में शामिल इन दोनों अधिकारियों को बिना किसी कारण के हटा दिया गया।

उन्होंने बताया कि दिल्ली पुलिस के मामले में भी यही हुआ। जिरह में यह सामने आया कि वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों ने 15 मार्च 2025 की रात करीब 12:15 बजे से लेकर 1:06 बजे तक यह निर्णय ले लिया था कि कथित नकदी को कानून के अनुसार दर्ज या जब्त नहीं किया जाएगा। उस समय भी उन्हें घटना की जानकारी नहीं थी। यह बात सामने आने के बाद उन पुलिस अधिकारियों को भी गवाहों की सूची से बिना किसी स्पष्ट कारण के हटा दिया गया।

जस्टिस वर्मा ने आगे कहा कि उनके तीन निजी सुरक्षा अधिकारियों (PSO) के मामले में शुरू में केवल एक का हलफनामा दिया गया और बाद में 15 मार्च 2026 की शाम को तीनों के हलफनामे एक साथ दिए गए। तब तक समिति ने उनके आधिकारिक रजिस्टर भी मँगवा लिए थे, जिन्हें उन्होंने देखा। उन्होंने पाया कि इन हलफनामों में झूठे दावे किए गए थे कि PSO अजीत आग के समय परिसर में मौजूद था और रजिस्टर में भी इसी बात को साबित करने के लिए गलत एंट्री की गई थी।

इसके बाद 16 मार्च 2026 को उन्होंने अजीत के लोकेशन डेटा और गूगल रिकॉर्ड मंगवाने की माँग की ताकि इन दावों की जाँच की जा सके। सुनवाई के दौरान सरकारी वकीलों ने कहा कि उन्हें इस माँग पर आपत्ति नहीं है लेकिन वे यह तय करेंगे कि PSO को गवाह के रूप में बुलाना है या नहीं। इसके अगले ही दिन यानी 17 मार्च 2026 को तीनों PSO को बिना कोई कारण बताए गवाहों की सूची से हटा दिया गया।

जस्टिस वर्मा ने कहा कि कुल 31 गवाहों में से सिर्फ 9 की ही गवाही ली गई जबकि बाकी 22 को हटा दिया गया। इनमें वे लोग भी शामिल थे जिनके पहले दिए गए बयान ही आरोपों का आधार थे। उन्होंने कहा कि जैसे ही जिरह में उनके खिलाफ बनाए गए मामले की कमजोरियाँ सामने आईं उन गवाहों को हटा दिया गया और इसका कोई कारण भी नहीं बताया गया।

जज वर्मा का आरोप पर पक्ष

जस्टिस वर्मा ने कहा कि न तो उनके खिलाफ कोई ऐसा आरोप लगाया गया और न ही कोई सबूत दिया गया कि स्टोर रूम में नकदी उन्होंने रखी, उनके कहने पर रखी गई, या उनकी जानकारी और सहमति से वहाँ रखी गई। उन्होंने कहा कि यह आरोप पूरी तरह अनुमान (presumption) पर आधारित है और इसे उनके सामने रखा ही नहीं जाना चाहिए था।

उन्होंने बताया कि यह आरोप दो बातों पर टिका था पहला- स्टोर रूम में भारतीय मुद्रा मिलने का दावा और दूसरा- यह कि स्टोर रूम उनके नियंत्रण वाले ‘सुरक्षित परिसर’ का हिस्सा था। उन्होंने कहा कि जब तक ये दोनों बातें साबित न हों, तब तक उनके खिलाफ कोई निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। पहले बिंदु पर उन्होंने कहा कि कहीं भी यह साबित नहीं किया गया कि जो चीज मिली वह असली भारतीय मुद्रा थी।

दूसरे बिंदु पर उन्होंने कहा कि कार्यवाही के दौरान उनके निजी सुरक्षा अधिकारी (PSO) जो सुरक्षा व्यवस्था और CCTV के बारे में बता सकते थे उन्हें बिना कारण हटा दिया गया। खासकर तब जब उन्होंने उनके बयानों में झूठ की ओर इशारा किया और उनके लोकेशन डेटा की माँग की। उन्होंने कहा कि परिसर की कोई CCTV फुटेज भी पेश नहीं की गई।

जस्टिस वर्मा ने कहा कि इस मामले में IHC के सचिव वरिंदर कालरा जो इस विषय पर स्पष्ट जानकारी दे सकते थ उन्हें भी गवाह के रूप में हटा दिया गया। CRPF के ज्यादातर अधिकारियों को भी बिना कारण हटा दिया गया। उन्होंने बताया कि केवल एक CRPF अधिकारी CG रावत की गवाही हुई। जस्टिस वर्मा ने कहा कि परिसर ‘सुरक्षित’ नहीं था बल्कि कोई भी व्यक्ति पीछे के गेट से स्टोर रूम तक बिना पकड़े जा सकता था। उन्होंने यह भी दोहराया कि 12 मार्च 2025 से वह खुद उस परिसर में मौजूद नहीं थे।

जस्टिस वर्मा ने कहा कि ऐसा कोई भी ठोस सबूत नहीं है जो यह साबित करे कि उनकी ओर से घटनास्थल पर किसी भी तरह की छेड़छाड़, बदलाव या हस्तक्षेप हुआ हो। उन्होंने कहा कि जब आरोप लगाने वाला पक्ष पहली नजर में भी अपना मामला साबित नहीं कर पाया तो उनसे (जज) यह अपेक्षा करना कि वे खुद सबूत पेश करके इस आरोप को गलत साबित करें पूरी तरह अनुचित है।

उन्होंने आगे कहा कि अगर जाँच निष्पक्ष और तर्कसंगत होती तो यह साफ दिख जाता कि इस मामले में पहली नजर में कोई ठोस केस बनता ही नहीं है और यहीं पर कार्यवाही खत्म कर दी जानी चाहिए थी। हालाँकि, इसके बजाय उनसे बार-बार ऐसी बातें साबित करने को कहा गया जो हुई ही नहीं और जिनका कोई सबूत नहीं है।

जस्टिस वर्मा ने कहा कि इस स्थिति में उन्हें यह मानने पर मजबूर होना पड़ा कि यह पूरी कार्यवाही सिर्फ दो बातों पर आधारित है कि परिसर में एक स्टोर रूम था और वहाँ कथित रूप से नकदी मिली। अगर सिर्फ यही आधार किसी को दोषी ठहराने के लिए काफी है तो फिर पूरी जाँच और सबूत पेश करने की प्रक्रिया का कोई मतलब नहीं रह जाता। उन्होंने कहा कि इस तरह सबूत देने की जिम्मेदारी पूरी तरह उलट दी गई है जबकि उनके खिलाफ कोई बुनियादी मामला भी स्थापित नहीं किया गया।

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