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अभी की गर्मी झांकी है, असल खतरा बाकी है! धधकती भट्टी बनेगी धरती, सुनाई दे रही अकाल की आहट

इस साल देश के कई हिस्सों में सूरज ने अभी से ही अपने तीखे तेवर दिखाने शुरू कर दिए हैं और लोगों का पसीना छूट रहा है, लेकिन मौसम वैज्ञानिकों की मानें तो यह भीषण गर्मी सिर्फ एक शुरुआत है, असली क्लाइमेट इमरजेंसी अभी बाकी है।

Ayush Aman Rai द्वारा Ayush Aman Rai
22 May 2026
in तापमान, पर्यावरण
अभी की गर्मी झांकी है, असल खतरा बाकी है! धधकती भट्टी बनेगी धरती, सुनाई दे रही अकाल की आहट

'सुपर एल नीन्यो' से धधकती भट्टी बनेगी धरती, अकाल की आहट

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इस साल देश के कई हिस्सों में सूरज ने अभी से ही अपने तीखे तेवर दिखाने शुरू कर दिए हैं और लोगों का पसीना छूट रहा है। लेकिन मौसम वैज्ञानिकों की मानें तो यह भीषण गर्मी सिर्फ एक शुरुआत है, असली क्लाइमेट इमरजेंसी अभी बाकी है। मौसम वैज्ञानिकों ने एक गंभीर चेतावनी जारी करते हुए कहा है कि प्रशांत महासागर में इस बार ‘एल नीन्यो’ (El Niño) का एक बेहद खतरनाक और अत्यंत शक्तिशाली रूप आकार ले रहा है, जिसे ‘सुपर एल नीन्यो’ (Super El Niño) कहा जाता है। ग्लोबल वार्मिंग और सुपर एल नीन्यो का यह खतरनाक मेल इस साल धरती को धधकती भट्टी में तब्दील कर सकता है, जिससे भारत में अकाल और सूखे जैसी गंभीर स्थितियां पैदा होने की आशंका बढ़ गई है।

क्या है ‘एल नीन्यो’ और क्यों इसका नाम है ‘छोटा बच्चा’?

‘एल नीन्यो’ मूल रूप से स्पेनिश भाषा का शब्द है, जिसका शाब्दिक अर्थ होता है ‘छोटा बच्चा’ या ‘बालक’। इस नाम का इतिहास दक्षिण अमेरिका से जुड़ा है, जहां कभी स्पेन का शासन हुआ करता था। पेरू और एक्वाडोर के स्थानीय मछुआरों ने सदियों पहले ध्यान दिया कि हर कुछ सालों में ईसा मसीह के जन्मदिन यानी क्रिसमस (दिसंबर के आसपास) के समय समुद्र का पानी अचानक असामान्य रूप से गर्म हो जाता है। इसी कारण उन्होंने इस मौसमी बदलाव को ‘शिशु ईसा’ के नाम पर ‘एल नीन्यो’ कह दिया। भले ही यह नाम हजारों किलोमीटर दूर दक्षिण अमेरिका में रखा गया हो, लेकिन इसका वैश्विक प्रभाव पूरी दुनिया के साथ-साथ भारत के मौसम चक्र पर भी पड़ता है।

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सामान्य दिनों का समुद्री सिस्टम: कैसे संतुलित रहता है ग्लोबल वेदर?

सामान्य परिस्थितियों में प्रशांत महासागर के ऊपर हवाओं का एक निश्चित पैटर्न होता है। यहाँ ‘ट्रेड विंड्स’ (व्यापारिक पवनें) पूर्व (दक्षिण अमेरिका) से पश्चिम (एशिया और ऑस्ट्रेलिया) की ओर बहती हैं।

  • ये हवाएं समुद्र की सतह के ऊपरी गर्म पानी को धकेलकर इंडोनेशिया, फिलीपींस और ऑस्ट्रेलिया की तरफ ले जाती हैं, जिससे वहां समुद्र का तापमान करीब 30 डिग्री सेल्सियस तक रहता है।

  • दूसरी ओर, दक्षिण अमेरिका के पेरू तट के पास नीचे का ठंडा और पोषक तत्वों से भरपूर पानी सतह पर आता रहता है (Upwelling), जिससे वहां का तापमान करीब 20 डिग्री सेल्सियस के आसपास बना रहता है। यही संतुलन दुनिया भर में मानसून और बारिश को नियंत्रित करता है।

एल नीन्यो आने पर कैसे उलट जाता है हवा और पानी का रुख?

जब एल नीन्यो का सिस्टम सक्रिय होता है, तो पूर्व से पश्चिम की ओर चलने वाली ये ट्रेड विंड्स कमजोर पड़ जाती हैं या पूरी तरह रुक जाती हैं। हवा रुकने से पश्चिम में जमा गर्म पानी का विशाल भंडार वापस पूर्व (दक्षिण अमेरिका) की तरफ बहने लगता है। इससे पूरे प्रशांत महासागर की सतह का तापमान असामान्य रूप से 0.5 डिग्री सेल्सियस या उससे अधिक बढ़ जाता है। यह गर्म पानी अपने ऊपर की हवा को भी गर्म कर देता है, जिससे हवा ऊपर उठती है और दक्षिण अमेरिका में तो बाढ़ जैसे हालात पैदा कर देती है, लेकिन हवा का रुख बदलने के कारण एशिया और भारत की तरफ नमी वाले बादल नहीं पहुंच पाते।

‘सुपर एल नीन्यो’ की आहट: क्यों डरे हुए हैं दुनिया भर के वैज्ञानिक?

साधारण एल नीन्यो तब ‘सुपर एल नीन्यो’ का रूप ले लेता है, जब मध्य प्रशांत महासागर में समुद्र की सतह का पानी सामान्य से 2 डिग्री सेल्सियस या उससे भी अधिक गर्म हो जाता है।

  • 150 साल का सबसे ताकतवर सिस्टम: इस बार का खतरा इसलिए अत्यधिक है क्योंकि केवल समुद्र की सतह ही नहीं, बल्कि सतह के नीचे (Sub-surface) गर्म पानी का एक विशालकाय पूल बन चुका है जो पिछले 6 महीनों से लगातार बढ़ रहा है। मध्य प्रशांत में साप्ताहिक तापमान अभी से ही +0.9 डिग्री सेल्सियस ऊपर जा चुका है।

  • वैज्ञानिकों को डर है कि जब यह नीचे का उबलता हुआ पानी पूरी तरह सतह पर आएगा, तो तापमान 2 डिग्री के बैरियर को तोड़ देगा। पिछले 70 सालों में ऐसा केवल तीन बार (1982, 1997 और 2015) हुआ है। विशेषज्ञों के मुताबिक, इस बार का सुपर एल नीन्यो पिछले 150 सालों का सबसे विनाशकारी सिस्टम साबित हो सकता है।

भारत पर पड़ेगा दोहरा मार: 48 डिग्री पारा और कमजोर मानसून

यदि यह सुपर एल नीन्यो पूरी तरह प्रभावी होता है, तो भारत के लिए आने वाले महीने बेहद चुनौतीपूर्ण होने वाले हैं:

  • भयंकर हीटवेव (लू): मई और जून के महीनों में उत्तर, मध्य और पश्चिम भारत के शहरों में पारा 48 डिग्री सेल्सियस या उससे भी ऊपर जा सकता है। आम दिनों में चलने वाली लू जो 2 से 3 दिनों में शांत हो जाती थी, वह इस बार हफ्तों तक लगातार कहर बरपा सकती है। खासकर राजस्थान, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, गुजरात और महाराष्ट्र में हालात भट्टी जैसे हो जाएंगे।

  • सूखे और अकाल का खतरा: भारत का मानसून दक्षिण-पश्चिम हवाओं पर निर्भर करता है जो अरब सागर और हिंद महासागर से नमी लाती हैं। एल नीन्यो के कारण ये हवाएं कमजोर पड़ जाएंगी या अपना रास्ता बदल लेंगी, जिससे देश में मानसून कमजोर रहेगा और बारिश में भारी कमी आएगी।

ग्लोबल वार्मिंग और सुपर एल नीन्यो की जुगलबंदी

इस बार का संकट इसलिए अधिक विनाशकारी है क्योंकि इसे ग्लोबल वार्मिंग (Global Warming) का भी सपोर्ट मिल रहा है। मानवीय गतिविधियों के कारण पृथ्वी का औसत तापमान पहले ही लगभग 1 डिग्री सेल्सियस बढ़ चुका है। अब इस बढ़े हुए बेस तापमान के ऊपर जब सुपर एल नीन्यो अपना 2 डिग्री सेल्सियस का इजाफा करेगा, तो इसका संयुक्त प्रभाव (Combined Impact) धरती को रिकॉर्ड स्तर पर झुलसा देगा।

अगर इतिहास पर नजर डालें, तो साल 2015 के सुपर एल नीन्यो के दौरान भारत में मानसून 14 फीसदी कमजोर रहा था जिससे भारी सूखा पड़ा था। वहीं 1997 में इसने इंडोनेशिया के जंगलों में भयंकर आग और पेरू में विनाशकारी बाढ़ को जन्म दिया था। इस बार समुद्र का पानी उन सालों की तुलना में कहीं अधिक तेजी से गर्म हो रहा है, जो आने वाले समय में पानी की भारी किल्लत, कृषि संकट और बिजली ग्रिड्स पर अत्यधिक दबाव का स्पष्ट संकेत दे रहा है।

Tags: Global Warming Climate ChangeHeatwave Rajasthan Delhi UPIndia Monsoon Drought PredictionPacific Ocean Temperature RiseTrade Winds El Nino EffectWeather Forecasting Update India.
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