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स्वीडन की मशहूर पर्यावरण कार्यकर्ता ग्रेटा थनबर्ग के लंदन में आयोजित एक कार्यक्रम में शामिल होने के बाद भारत में राजनीतिक बहस तेज हो गई है। यह कार्यक्रम स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया-यूके (SFI-UK) ने आयोजित किया था, जिसमें भारत में चल रहे CJP प्रदर्शन के समर्थन में एकजुटता दिखाई गई।
यह कार्यक्रम “विक्ट्री डे” के अवसर पर आयोजित एक सार्वजनिक सभा का हिस्सा था। कार्यक्रम के दौरान कई वक्ताओं ने सामाजिक न्याय, लोकतंत्र और अंतरराष्ट्रीय एकजुटता जैसे मुद्दों पर अपने विचार रखे। आयोजकों की ओर से जारी वीडियो और तस्वीरों में ग्रेटा थनबर्ग भी मंच पर मौजूद लोगों और प्रतिभागियों के साथ दिखाई दीं। उनकी मौजूदगी के कारण इस कार्यक्रम को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अधिक ध्यान मिला।
ग्रेटा थनबर्ग ने पिछले कुछ वर्षों में अपनी सक्रियता केवल पर्यावरण तक सीमित नहीं रखी है। “फ्राइडेज़ फॉर फ्यूचर” (Fridays for Future) अभियान से दुनिया भर में पहचान बनाने वाली ग्रेटा अब जलवायु परिवर्तन के अलावा मानवाधिकार, संघर्ष, लोकतंत्र और नागरिक स्वतंत्रता जैसे कई अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर भी अपनी राय रखती रही हैं।
उनके समर्थकों का कहना है कि यह वैश्विक न्याय और मानवाधिकारों के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को दर्शाता है। वहीं आलोचकों का मानना है कि इस तरह के राजनीतिक और विवादित मुद्दों में भाग लेने से पर्यावरण आंदोलन का फोकस बदल सकता है।
लंदन के इस कार्यक्रम के वीडियो और तस्वीरें सामने आने के बाद भारत में सोशल मीडिया पर इसको लेकर बड़ी बहस शुरू हो गई। कई राजनीतिक विश्लेषकों और लोगों ने सवाल उठाया कि किसी विदेशी और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध हस्ती का भारत से जुड़े राजनीतिक मुद्दे पर समर्थन देना कितना उचित है। वहीं कुछ लोगों का कहना है कि आज के दौर में वैश्विक स्तर के सामाजिक कार्यकर्ता दुनिया के अलग-अलग मुद्दों पर अपनी राय रखते हैं और ऐसे कार्यक्रमों में शामिल होना कोई नई बात नहीं है।
विशेषज्ञों का मानना है कि किसी अंतरराष्ट्रीय हस्ती का समर्थन किसी आंदोलन को तुरंत नहीं बदलता, लेकिन उससे उस मुद्दे को वैश्विक स्तर पर पहचान जरूर मिलती है। ग्रेटा थनबर्ग की मौजूदगी के बाद इस कार्यक्रम और CJP प्रदर्शन से जुड़े हैशटैग सोशल मीडिया पर तेजी से ट्रेंड करने लगे और इस मुद्दे पर देश-विदेश में चर्चा बढ़ गई।
यह पूरा घटनाक्रम इस बात का भी उदाहरण है कि आज के डिजिटल दौर में किसी एक देश में होने वाला कार्यक्रम कुछ ही मिनटों में पूरी दुनिया में चर्चा का विषय बन सकता है। सोशल मीडिया और अंतरराष्ट्रीय नेटवर्किंग के कारण स्थानीय आंदोलन भी वैश्विक ध्यान आकर्षित करने लगे हैं।
फिलहाल भारत में इस मामले को लेकर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। प्रदर्शन के समर्थक इसे अंतरराष्ट्रीय समर्थन का संकेत बता रहे हैं, जबकि विरोधियों का कहना है कि किसी विदेशी व्यक्ति का समर्थन भारत के लोकतांत्रिक या राजनीतिक मामलों की दिशा तय नहीं कर सकता। हालांकि, ग्रेटा थनबर्ग की इस कार्यक्रम में मौजूदगी ने एक बार फिर यह दिखा दिया है कि वैश्विक स्तर पर पहचान रखने वाले कार्यकर्ताओं की भागीदारी किसी भी मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय बहस का विषय बना सकती है।


































