ज़रा कल्पना कीजिए…आप एक सुबह उठते हैं और देखते हैं कि हजारों लोग आपके शहर में प्रवेश कर चुके हैं। सड़कों पर भारी भीड़ है, पुलिस हालात संभालने में असमर्थ है। सेना को तैनात कर दिया गया है और स्थानीय प्रशासन केंद्र सरकार से राष्ट्रीय आपातकाल घोषित करने की मांग कर रहा है, लेकिन सरकार कहती है, “स्थिति इतनी गंभीर नहीं है कि राष्ट्रीय आपातकाल घोषित किया जाए।”
यह किसी फिल्म की कहानी नहीं है। यह स्पेन के उत्तर अफ्रीकी तट पर स्थित छोटे से एन्क्लेव स्यूटा (Ceuta) की वास्तविकता है।हजारों लोग, जिनमें अधिकांश मोरक्को के युवा पुरुष बताए जा रहे हैं- वो जमीन और समुद्र दोनों रास्तों से स्यूटा में प्रवेश कर गए।
इसे स्पेन के इतिहास में सबसे बड़े अवैध सीमा उल्लंघनों में से एक बताया जा रहा है। लेकिन असली सवाल सिर्फ यह नहीं है कि हजारों लोग सीमा पार करने में कैसे सफल हो गए।
असल सवाल यह है…
क्या यूरोप अपने सीमाई नियंत्रण पर पकड़ खो चुका है?
स्यूटा कोई साधारण शहर नहीं है। यह अफ्रीका में स्थित स्पेन का हिस्सा है और उससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि यह यूरोपीय संघ (EU) की बाहरी सीमाओं में से एक है। यानी यदि कोई स्यूटा में प्रवेश करता है, तो वह केवल स्पेन में नहीं, बल्कि यूरोप के मुख्य द्वार पर दस्तक देता है।
इसी वजह से यहां जो हुआ, उसने पूरे यूरोप को चिंतित कर दिया है। फिर भी प्रधानमंत्री पेड्रो सांचेज़ की समाजवादी सरकार का कहना है कि राष्ट्रीय आपातकाल जैसी कोई स्थिति नहीं है। लेकिन क्या यह तथाकथित “आक्रमण”- हाँ, मैं इसे आक्रमण ही कहूंगा— रातों-रात हो गया? नहीं।
इसकी नींव काफी पहले रखी जा चुकी थी, जब स्पेन की वामपंथी समाजवादी नीतियों ने इस दिशा में रास्ता तैयार किया।
कुछ ही महीने पहले स्पेन ने लगभग पांच लाख (500,000) अवैध प्रवासियों को वैध दर्जा देने की योजना की घोषणा की थी।
सरकार का तर्क था कि इससे मानवाधिकार मजबूत होंगे, इन लोगों का समाज में बेहतर एकीकरण होगा और अर्थव्यवस्था को भी लाभ मिलेगा।
यही नहीं…कुछ दिन पहले ही स्पेन के सर्वोच्च न्यायालय ने फैसला दिया कि समुद्र के रास्ते आने वाले प्रवासियों को कानूनी प्रक्रिया पूरी किए बिना तुरंत वापस नहीं भेजा जा सकता।
स्वाभाविक रूप से, इससे मानव तस्करों, अवैध प्रवासियों और स्पेन में प्रवेश की कोशिश कर रहे लोगों को यह संदेश जाता है कि यदि वे किसी तरह सीमा पार कर लेते हैं, तो उन्हें तुरंत वापस भेजे जाने की संभावना काफी कम होगी।
स्पेन के पुलिस संघों ने भी चेतावनी दी थी कि इन फैसलों ने एक मजबूत पुल फैक्टर पैदा कर दिया है।
लेकिन यह सिर्फ स्पेन की कहानी नहीं है…यह पूरे यूरोप की कहानी है।
आइए 2015 की ओर चलते हैं- सीरिया के गृहयुद्ध के बाद यूरोप ने अप्रवासियों के लिए अपने दरवाजे खोल दिए।
एक ही वर्ष में 10 लाख से अधिक प्रवासी और शरणार्थी यूरोप पहुंच गए। याद कीजिए तब तत्कालीन जर्मन चांसलर एंजेला मर्केल ने क्या कहा था…? उन्होने कहा था कि, “हम यह कर सकते हैं।”
उस समय इसे मानवता की बड़ी जीत माना गया। लेकिन आज कई जर्मनों का मानना है कि वे उस फैसले के दीर्घकालिक परिणामों के साथ जी रहे हैं।
जर्मनी ही नहीं इटली, ग्रीस और स्पेन लगातार प्रवासन के भारी दबाव का सामना कर रहे हैं। आज भूमध्यसागर दुनिया के सबसे व्यस्त अवैध प्रवासन मार्गों में से एक बन चुका है, इस पूरे क्षेत्र में मानव तस्करी अरबों यूरो का कारोबार बन गई है। यूरोप पहुंचने वाली हर नई नाव महाद्वीप के राजनीतिक संकट को और गहरा कर देती है।
इस दौरान अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप बार-बार यूरोप को चेतावनी देते रहे। उन्होंने कहा था कि यूरोप ने अपनी सीमाओं की सुरक्षा छोड़ दी है। उनका यह भी कहना था कि अनियंत्रित अवैध प्रवासन यूरोप को “थर्ड वर्ल्ड” में बदल रहा है।
लेकिन ट्रंप की बातों को गंभीरता से नहीं लिया गया। यूरोप के ज्यादातर नेताओं ने उनके बयान को उनका बड़बोलापन मान कर हवा में उड़ा दिया, लेकिन क्या स्यूटा की ये तस्वीरें भी हवा में उड़ाई जा सकती हैं?
क्या भीड़ का मोहल्लों में प्रवेश करना और घरों में घुसने की कोशिशों की खबरों को सिर्फ मानवाधिकारों के नाम पर नजरअंदाज किया जा सकता है?
हां, हम यहां ये नहीं कह रहे हैं कि हर प्रवासी अपराधी होता है, या समाज के लिए खतरा ही साबित होगा। दुनिया भर में लाखों लोग युद्ध, गरीबी और उत्पीड़न से बचने के लिए बेहतर जीवन की तलाश में अपना देश छोड़ते हैं, यह भी एक सच्चाई है।
लेकिन यह भी उतना ही सच है कि जब सीमा नियंत्रण कमजोर पड़ जाता है, तो सुरक्षा एजेंसियों के लिए यह पहचानना मुश्किल हो जाता है कि कौन वास्तविक शरणार्थी है, कौन आर्थिक प्रवासी, कौन अपराधी और कौन संभावित चरमपंथी।
कुछ रिपोर्टों में यह भी दावा किया गया है कि अप्रवासियों की इस भीड़ में ऐसे लोग भी शामिल हो सकते हैं जिनका आपराधिक रिकॉर्ड रहा है, जिनमें मोरक्को के राजा द्वारा हाल ही में माफ किए गए कुछ लोग भी बताए जा रहे हैं।
एक और दिलचस्प बात, इस भीड़ को ध्यान से देखिए। आपको वहां बहुत कम महिलाएं दिखाई देंगी। अधिकांश लोग युवा पुरुष हैं और यदि स्पेन के कानूनों के तहत इनमें से बड़ी संख्या में लोग अंततः स्पेन या यूरोप के अन्य देशों में बस जाते हैं, तो आगे क्या होगा?
क्या वे हमेशा अकेले रहेंगे? वे अपने जीवनसाथी कहां से खोजेंगे? क्या इससे यूरोप की सामाजिक संरचना में बड़ा बदलाव नहीं आएगा?
ये असहज करने वाले सवाल हैं। लेकिन ऐसे सवाल हैं, जिनसे अब यूरोप बच नहीं सकता, उन्हें इनके जवाब ढूंढने ही होंगे।
लेकिन शायद समाजवादी सरकारों के पास इन्हें पूछने का समय नहीं है, या फिर उनकी राजनीतिक मजबूरी ऐसा करने से उन्हें रोकती है।
इसी कारण आज यूरोप में बहस केवल आव्रजन तक सीमित नहीं रह गई है। अब यह सुरक्षा बनाम मानवाधिकार की बहस बन चुकी है।
सवाल ये भी है कि क्या यूरोप के लिए काफी देर हो गई है?


































