भारतीय नौसेना ने हिंदुस्तान शिपयार्ड लिमिटेड (HSL) को भविष्य में और बड़ी जिम्मेदारी देने के संकेत दिए हैं। रक्षा मंत्रालय के तहत आने वाली इस सरकारी कंपनी को अब केवल जहाज बनाने वाली संस्था नहीं, बल्कि देश की समुद्री सुरक्षा में लंबे समय तक साथ निभाने वाला रणनीतिक साझेदार माना जा रहा है।
विशाखापत्तनम स्थित हिंदुस्तान शिपयार्ड के दौरे पर पहुंचे नौसेना के उप प्रमुख (डिप्टी चीफ ऑफ नेवल स्टाफ) वाइस एडमिरल तरुण सोबती ने कहा कि नौसेना चाहती है कि HSL सिर्फ जहाज बनाकर अपनी भूमिका खत्म न करे, बल्कि जहाजों के पूरे जीवनकाल में उनकी देखरेख, मरम्मत, अपग्रेड और तकनीकी सहायता भी उपलब्ध कराए।
गुणवत्ता और समय पर काम पूरा करना सबसे बड़ी प्राथमिकता
दौरे के दौरान वाइस एडमिरल सोबती ने हिंदुस्तान शिपयार्ड की हाल के वर्षों में हुई प्रगति की सराहना की। उन्हें शिपयार्ड के आधुनिकीकरण और चल रही परियोजनाओं की जानकारी दी गई। HSL के चेयरमैन एवं प्रबंध निदेशक रियर एडमिरल (सेवानिवृत्त) चंद्रशेखरन राघुराम ने कंपनी की नई क्षमताओं और भविष्य की योजनाओं के बारे में प्रस्तुति दी।
सोबती ने कहा कि जहाजों की गुणवत्ता और समय पर डिलीवरी से कोई समझौता नहीं किया जा सकता। उन्होंने डिजाइन क्षमता बढ़ाने और कर्मचारियों के कौशल को लगातार बेहतर बनाने पर भी जोर दिया। उनके अनुसार HSL की सबसे बड़ी ताकत उसका अनुभवी और कुशल कार्यबल है।
‘आत्मनिर्भर भारत’ को मिलेगा और बल
भारतीय नौसेना अब चाहती है कि देश की शिपयार्ड कंपनियां केवल जहाज बनाकर न रुकें, बल्कि उनकी पूरी सेवा अवधि के दौरान रखरखाव और तकनीकी सहायता भी दें। नौसेना के जहाज कई दशकों तक सेवा में रहते हैं और इस दौरान उन्हें समय-समय पर मरम्मत, नए उपकरणों की स्थापना और बड़े स्तर पर सुधार की जरूरत पड़ती है।
यदि यह काम देश में ही होगा, तो न केवल नौसेना की तैयारी बेहतर रहेगी बल्कि विदेशों पर निर्भरता भी कम होगी। इससे ‘आत्मनिर्भर भारत‘ अभियान को भी मजबूती मिलेगी।
HSL की बढ़ी क्षमता को मिला नौसेना का भरोसा
पिछले कुछ वर्षों में हिंदुस्तान शिपयार्ड ने अपने बुनियादी ढांचे को आधुनिक बनाया है। इससे उसकी उत्पादन क्षमता बढ़ी है और अब वह पहले से अधिक जटिल रक्षा परियोजनाओं पर काम करने में सक्षम हो गया है। नौसेना की ओर से मिली यह सराहना इसी बदलाव का संकेत मानी जा रही है।
अब नौसेना और घरेलू रक्षा उद्योग के बीच संबंध केवल जहाज बनाने तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि जहाजों की पूरी सेवा अवधि तक सहयोग पर जोर दिया जाएगा।
देश के सबसे पुराने शिपयार्ड में शामिल है HSL
विशाखापत्तनम स्थित हिंदुस्तान शिपयार्ड लिमिटेड की स्थापना वर्ष 1941 में हुई थी और 1952 में इसका राष्ट्रीयकरण किया गया। यह कोचीन शिपयार्ड के बाद भारत का दूसरा सबसे बड़ा शिपयार्ड है। यहां 80,000 डेडवेट टन तक के बड़े जहाज बनाए जा सकते हैं।
पनडुब्बियों की मरम्मत में है खास विशेषज्ञता
HSL की सबसे बड़ी ताकत पनडुब्बियों (सबमरीन) की मरम्मत, आधुनिकीकरण और ओवरहॉल का काम है। यह भारत के उन चुनिंदा शिपयार्ड में शामिल है, जहां इतनी जटिल तकनीकी क्षमता मौजूद है।
कंपनी भारतीय नौसेना की किलो-क्लास पनडुब्बियों जैसे आईएनएस सिंधुकीर्ति, आईएनएस वेला और आईएनएस वागली की मरम्मत कर चुकी है। फिलहाल आईएनएस सिंधुकीर्ति के आधुनिकीकरण का काम भी जारी है। इससे पहले HSL ने आईएनएस सिंधुवीर का भी सफलतापूर्वक आधुनिकीकरण किया था, जिसे बाद में म्यांमार को सौंपा गया।
अब पनडुब्बियां भी बनाएगा हिंदुस्तान शिपयार्ड
आने वाले समय में HSL केवल मरम्मत तक सीमित नहीं रहेगा। कंपनी मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड (MDL) के साथ मिलकर भारत में पनडुब्बियों के निर्माण की तैयारी कर रही है।
इस साझेदारी का उद्देश्य भारत की स्वदेशी पनडुब्बी निर्माण क्षमता को मजबूत करना और विदेशी शिपयार्ड पर निर्भरता कम करना है। यदि यह योजना सफल होती है, तो हिंदुस्तान शिपयार्ड देश की समुद्री सुरक्षा और रक्षा क्षेत्र में पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।


































