विगत दिनों कनाडा की विदेश मंत्री अनीता आनंद की पाकिस्तान यात्रा और उसके बाद कनाडा के वरिष्ठ अधिकारियों तथा राजनयिकों के मुंबई और नई दिल्ली दौरे ने यह समझने का अच्छा अवसर दिया है कि भारत और कनाडा के रिश्ते किस दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। कुछ समय पहले तक दोनों देशों के संबंध बेहद तनावपूर्ण थे। खासकर खालिस्तान मुद्दे को लेकर दोनों देशों के बीच लगातार मतभेद बढ़ते गए। सितंबर 2023 में तत्कालीन कनाडाई प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो की भारत यात्रा के दौरान यह तनाव अपने सबसे उच्चतम स्तर पर पहुंच गया था।
लेकिन जून 2025 में स्थिति बदलनी शुरू हुई। जब कनाडा के नए प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अल्बर्टा के कनानास्किस में आयोजित जी-7 शिखर सम्मेलन में शामिल होने और द्विपक्षीय मुलाकात के लिए आमंत्रित किया, तब दोनों देशों के रिश्तों में नई गर्मजोशी दिखाई दी। उस मुलाकात से शुरू हुई बातचीत धीरे-धीरे एक व्यापक रणनीतिक समझ में बदल गई। फरवरी-मार्च 2026 में मार्क कार्नी की भारत यात्रा ने इस नई शुरुआत को और मजबूत आधार दिया।
दोनों देशों ने बिना अधिक प्रचार किए, शांत और संतुलित तरीके से अपने संबंधों को आगे बढ़ाया। यही कारण है कि लगभग बीस वर्षों बाद किसी कनाडाई विदेश मंत्री की पाकिस्तान यात्रा भी नई दिल्ली में कोई बड़ी चिंता का विषय नहीं बनी। पाकिस्तान ने अनीता आनंद के सामने कश्मीर और सिंधु जल संधि जैसे संवेदनशील मुद्दे उठाने की कोशिश की, लेकिन कनाडा ने उन मामलों को संतुलित ढंग से संभाला और किसी विवाद में पड़ने से बचा। इससे यह संकेत मिला कि कनाडा अब भारत के साथ अपने रिश्तों को अधिक महत्व दे रहा है।
भारत और कनाडा, दोनों के लिए यह द्विपक्षीय संबंध अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। ऐसे में यह समझना आवश्यक है कि दोनों देशों के संबंध किस नई दिशा में आगे बढ़ रहे हैं और किन आधारों पर उनकी साझेदारी को मजबूत किया जा रहा है। इसी समझ के माध्यम से यह स्पष्ट होगा कि दोनों सरकारें भविष्य में उत्पन्न होने वाली चुनौतियों का सामना किस प्रकार करेंगी और आपसी सहयोग को किस दिशा में आगे बढ़ाएंगी। कनाडा में भारत को एक स्वाभाविक साझेदार के रूप में देखा जाता है। दोनों देश लोकतांत्रिक व्यवस्था में विश्वास रखते हैं। कानून का शासन, अंतरराष्ट्रीय नियमों का सम्मान, राष्ट्रीय संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता जैसे मूल्यों को दोनों समान महत्व देते हैं। दोनों राष्ट्र राष्ट्रमंडल के सदस्य भी हैं। दूसरी ओर, भारत में भी कनाडा को एक जिम्मेदार और सकारात्मक वैश्विक शक्ति के रूप में देखा जाता है।
आर्थिक दृष्टि से भी दोनों देशों की जरूरतें एक-दूसरे की ताकत बन सकती हैं। ऊर्जा, कृषि, आधुनिक तकनीक, शिक्षा, निवेश और नवाचार जैसे क्षेत्रों में भारत और कनाडा के बीच सहयोग की अपार संभावनाएं मौजूद हैं। भारत तेजी से विकसित होती अर्थव्यवस्था है, जबकि कनाडा प्राकृतिक संसाधनों, उन्नत तकनीक और पूंजी के मामले में मजबूत है। इसलिए दोनों देश एक-दूसरे के पूरक साबित हो सकते हैं। आज दोनों देश इंडो-पैसिफिक क्षेत्र को भी समान दृष्टि से देख रहे हैं। यह अवधारणा एशिया और प्रशांत महासागर के देशों को एक साझा रणनीतिक ढांचे में जोड़ती है। भारत और कनाडा दोनों एक ऐसे इंडो-पैसिफिक क्षेत्र का समर्थन करते हैं जो स्वतंत्र, खुला, सुरक्षित और स्थिर हो। भारत के लिए यह क्षेत्र आर्थिक विकास, समुद्री सुरक्षा और वैश्विक व्यापार का महत्वपूर्ण केंद्र है, जबकि कनाडा भी इसमें अपनी सक्रिय भूमिका बढ़ाना चाहता है।
एक और महत्वपूर्ण कारण जिसने दोनों देशों को करीब लाने में भूमिका निभाई, वह अमेरिका की बदली हुई विदेश नीति रही। ट्रंप प्रशासन के दूसरे कार्यकाल में पहले कनाडा और बाद में भारत के साथ अमेरिका के संबंधों में कई बार तनाव देखने को मिला। इससे भारत और कनाडा दोनों को यह एहसास हुआ कि बदलती वैश्विक राजनीति में मजबूत द्विपक्षीय साझेदारी उनके लिए अधिक लाभदायक होगी। भारत के दृष्टिकोण से भी आज बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था में अधिक से अधिक भरोसेमंद साझेदार बनाना उसकी विदेश नीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है।
आज भारत-कनाडा संबंध तीन मजबूत स्तंभों पर खड़े हैं, सुरक्षा सहयोग, व्यापार एवं निवेश और लोगों के बीच आपसी संबंध। पिछले एक वर्ष में सुरक्षा सहयोग और रक्षा संवाद में उल्लेखनीय प्रगति हुई है। ट्रूडो सरकार ने घरेलू राजनीति के कारण खालिस्तान से जुड़े मुद्दों को जिस तरह संभाला, उससे दोनों देशों के रिश्तों को नुकसान पहुंचा। लेकिन मार्क कार्नी सरकार ने अलग रास्ता अपनाया। उन्होंने अपनी सुरक्षा एजेंसियों को भारत के आतंकवाद विरोधी प्रयासों और कट्टरपंथ के खिलाफ उसकी प्रतिबद्धता को गंभीरता से समझने का निर्देश दिया। इस सोच में बदलाव का सकारात्मक असर दोनों देशों की सुरक्षा एजेंसियों के बीच विश्वास बढ़ने के रूप में सामने आया। अब दोनों देशों के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार नियमित रूप से बातचीत कर रहे हैं और कई महत्वपूर्ण विषयों पर सहयोग बढ़ा है। भारत लंबे समय से यह कहता रहा है कि आतंकवाद और अलगाववाद के खिलाफ सभी देशों को एक समान नीति अपनानी चाहिए। कनाडा का बदला हुआ रुख भारत के लिए एक सकारात्मक संकेत माना जा सकता है।
इसी विश्वास ने रक्षा सहयोग का रास्ता भी खोला है। दोनों सरकारें संयुक्त सैन्य प्रशिक्षण, रक्षा क्षेत्र में सहयोग और सैन्य अधिकारियों के आदान-प्रदान को बढ़ाना चाहती हैं। इसके साथ ही समुद्री सुरक्षा, रक्षा उपकरणों की आपूर्ति, सप्लाई चेन को मजबूत बनाने और संयुक्त अभ्यासों पर भी काम किया जा रहा है। हाल ही में आयोजित ट्रैक-1.5 संवाद में भी रक्षा उद्योग, समुद्री सुरक्षा, महत्वपूर्ण खनिज, एआई, नई तकनीकों और साइबर सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर सहमति बनी। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि दोनों देश जल्द से जल्द जनरल सिक्योरिटी प्रोटेक्शन एग्रीमेंट यानी GSPA जैसे समझौते को अंतिम रूप देते हैं, तो रक्षा उद्योग और आधुनिक तकनीक में साझेदारी कई गुना बढ़ सकती है।
वैश्विक परिप्रेक्ष्य में देखें तो रणनीतिक स्तर पर भी भारत और कनाडा के बीच सहयोग की संभावनाएं लगातार बढ़ रही हैं। कनाडा हिंद-प्रशांत क्षेत्र में उभरते सुरक्षा ढांचे और विशेष रूप से क्वाड यानी भारत, जापान, ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका की गतिविधियों पर करीबी नजर बनाए हुए है। हालांकि उसने अभी तक क्वाड में शामिल होने की कोई औपचारिक इच्छा व्यक्त नहीं की है, लेकिन उसकी बढ़ती रुचि स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। दूसरी ओर, भारत भी कनाडा की IORA यानी हिंद महासागर रिम एसोसिएशन, ISA यानी इंटरनेशनल सोलर अलायंस और ग्लोबल बायोफ्यूल्स अलायंस जैसे बहुपक्षीय मंचों में अधिक सक्रिय भागीदारी का समर्थन कर रहा है। इसमे कोई संदेह नहीं है कि यदि यह सहयोग आगे बढ़ता है, तो इससे दोनों देशों के बीच रणनीतिक विश्वास और आपसी साझेदारी को नई मजबूती मिल सकती है।
वास्तव में भारत और कनाडा के संबंधों का सबसे मजबूत आधार आर्थिक सहयोग है। वर्ष 2024 में दोनों देशों के बीच वस्तुओं और सेवाओं का कुल व्यापार लगभग 14 अरब डॉलर रहा। दोनो देशों का लक्ष्य है कि वर्ष 2030 तक इसे बढ़ाकर 21 अरब डॉलर किया जाए। यदि दोनों सरकारें और उद्योग जगत मिलकर प्रयास करें तो यह लक्ष्य पूरी तरह हासिल किया जा सकता है। इसके लिए सबसे महत्वपूर्ण कदम CEPA यानी व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौते को अंतिम रूप देना होगा। यदि यह समझौता तय समय पर हो जाता है, तो व्यापार और निवेश दोनों में तेजी आएगी। मई 2026 में भारत के वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल 120 से अधिक भारतीय कंपनियों के प्रतिनिधिमंडल के साथ कनाडा गए थे। यह अब तक का सबसे बड़ा भारतीय कारोबारी प्रतिनिधिमंडल था। इससे यह संदेश गया कि भारत कनाडा के साथ आर्थिक संबंधों को नई ऊंचाई देना चाहता है।
इसके अलावा निवेश के क्षेत्र में भी दोनों देशों के बीच मजबूत संबंध हैं। कनाडा के संस्थागत निवेशकों का भारत में लगभग 100 अरब डॉलर का निवेश है। कनाडा के पेंशन फंड लंबे समय से भारत के बुनियादी ढांचे के विकास में निवेश करते रहे हैं। आज 600 से अधिक कनाडाई कंपनियां भारत में सक्रिय हैं, जबकि 1000 से अधिक कंपनियां भारतीय बाजार में अवसर तलाश रही हैं। भारत के तेजी से बढ़ते उपभोक्ता बाजार और डिजिटल अर्थव्यवस्था को देखते हुए भविष्य में यह संख्या और बढ़ सकती है।
ऊर्जा के क्षेत्र में भी भारत और कनाडा साथ मिलकर अच्छा काम कर सकते हैं। कनाडा भारत को तेल, एलएनजी और यूरेनियम दे रहा है, जबकि भारत कनाडा को पेट्रोलियम से बने उत्पाद भेज रहा है। दोनों देशों के बीच लंबे समय तक यूरेनियम की आपूर्ति का समझौता भी हुआ है। इससे भारत की परमाणु ऊर्जा परियोजनाओं को लगातार ईंधन मिलता रहेगा। भारत में ऊर्जा की जरूरत तेजी से बढ़ रही है और साफ ऊर्जा पर भी जोर दिया जा रहा है। ऐसे में आने वाले समय में दोनों देशों के बीच यह सहयोग और भी अहम हो सकता है।
भारत और कनाडा के रिश्तों की शुरुआत भले ही व्यापार और अर्थव्यवस्था से हुई हो, लेकिन समय के साथ इन रिश्तों की सबसे बड़ी ताकत कनाडा में रहने वाला भारतीय मूल का समुदाय बन गया है। कनाडा में करीब 18 लाख भारतीय मूल के लोग और लगभग 10 लाख भारतीय नागरिक रहते हैं। शिक्षा, संस्कृति, पर्यटन, विज्ञान, व्यापार, तकनीक और दूसरे कई क्षेत्रों में यह समुदाय दोनों देशों को करीब लाने और आपसी सहयोग बढ़ाने में अहम भूमिका निभा रहा है। दोनों देशों के बीच व्यापार, निवेश, शिक्षा और सांस्कृतिक संबंधों को मजबूत करने में भी इस समुदाय का बड़ा योगदान रहा है। हालांकि, कुछ साल पहले यही समुदाय दोनों देशों के बीच तनाव की एक वजह भी बना। खालिस्तान समर्थक गतिविधियों और उनसे जुड़े राजनीतिक विवादों के कारण भारत और कनाडा के रिश्तों में खटास आई। इसका असर राजनीतिक संपर्क, व्यापार और लोगों के बीच भरोसे पर भी पड़ा। अब दोनों देशों के सामने चुनौती यह है कि वे उस दौर से सीख लें और भविष्य में ऐसी स्थिति दोबारा पैदा न होने दें। भारत का साफ मानना है कि अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर हिंसा, आतंकवाद या अलगाववाद का समर्थन नहीं किया जा सकता। यदि दोनों देश इस सोच के साथ मिलकर काम करते हैं और सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर खुलकर सहयोग बढ़ाते हैं, तो लोगों का भरोसा और मजबूत होगा। इससे दोनों देशों के रिश्ते भी पहले से ज्यादा मजबूत और स्थिर बन सकते हैं।
भारत और कनाडा दोनों के सामने एक बड़ा अवसर है। यदि वर्तमान गति बनी रहती है, तो दोनों देश केवल द्विपक्षीय स्तर पर ही नहीं, बल्कि क्षेत्रीय और वैश्विक मंचों पर भी एक-दूसरे के महत्वपूर्ण साझेदार बन सकते हैं। कहा जाता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और प्रधानमंत्री मार्क कार्नी के बीच व्यक्तिगत स्तर पर भी अच्छा तालमेल है। लेकिन किसी भी रिश्ते की असली मजबूती केवल व्यक्तिगत संबंधों से नहीं, बल्कि लगातार राजनीतिक इच्छाशक्ति, संस्थागत सहयोग और पारस्परिक विश्वास से तय होती है।
भारत के लिए कनाडा केवल एक व्यापारिक साझेदार नहीं, बल्कि तकनीक, ऊर्जा, शिक्षा, रक्षा और इंडो-पैसिफिक रणनीति में एक महत्वपूर्ण सहयोगी बन सकता है। वहीं कनाडा के लिए भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक है और वैश्विक दक्षिण की एक प्रभावशाली आवाज़ भी है। यदि दोनों देश अपने मतभेदों को संवाद के माध्यम से समझाते हुए साझा हितों पर ध्यान केंद्रित करते हैं, तो आने वाले वर्षों में भारत-कनाडा संबंध पहले की तुलना में कहीं अधिक मजबूत, स्थिर और व्यापक रूप ले सकते हैं।
































