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म्यांमार के रेयर अर्थ खनिज, भारत की रणनीति और चीन की चुनौती

Anshuman द्वारा Anshuman
3 August 2026
in भू-राजनीति, रक्षा, रणनीति
म्यांमार के राष्ट्रपति यू मिन आंग ह्लाइंग 30 जून से 3 जुलाई 2026 तक भारत दौर पर थे

म्यांमार के राष्ट्रपति यू मिन आंग ह्लाइंग और पीएम मोदी के बीच 1 जून 2026 को नई दिल्ली स्थिति हैदराबाद हाउस में मुलाकात हुई थी

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हाल ही हुई म्यांमार के राष्ट्रपति यू मिन आंग ह्लाइंग की भारत यात्रा दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंधों को नई दिशा और गति देने की दृष्टि से महत्वपूर्ण मानी गई। यह यात्रा ऐसे समय में हुई जब भारत और म्यांमार क्षेत्रीय सुरक्षा, आर्थिक सहयोग और रणनीतिक साझेदारी को और मजबूत बनाने की दिशा में नए अवसर तलाश रहे हैं। इस दौरान दोनों देशों ने आपसी संपर्क को बेहतर बनाने, व्यापार एवं आर्थिक सहयोग का विस्तार करने तथा सीमा पार होने वाले अपराधों, तस्करी और अन्य अंतरराष्ट्रीय आपराधिक गतिविधियों से संयुक्त रूप से निपटने के लिए सहयोग बढ़ाने की प्रतिबद्धता दोहराई।

यात्रा के बाद आयोजित संयुक्त प्रेस वार्ता में भारत के विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने बताया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति यू मिन आंग ह्लाइंग के बीच व्यापार, सीमा प्रबंधन और कनेक्टिविटी जैसे पारंपरिक मुद्दों के अलावा क्रिटिकल मिनरल्स और रेयर अर्थ तत्वों के क्षेत्र में सहयोग की संभावनाओं पर भी विस्तृत चर्चा हुई। प्रधानमंत्री मोदी ने भी स्पष्ट किया कि भारत इस रणनीतिक क्षेत्र में म्यांमार के साथ दीर्घकालिक साझेदारी विकसित करने का इच्छुक है। दरअसल, वैश्विक स्तर पर बढ़ती प्रतिस्पर्धा और महत्वपूर्ण खनिजों की मांग को देखते हुए म्यांमार के विशाल रेयर अर्थ भंडार का महत्व लगातार बढ़ रहा है। हालांकि, इन संसाधनों की रणनीतिक उपयोगिता जितनी महत्वपूर्ण है, उतना ही आवश्यक यह आकलन करना भी है कि मौजूदा राजनीतिक और सुरक्षा परिस्थितियों में क्या म्यांमार भारत के लिए इन खनिजों का एक विश्वसनीय, स्थिर और दीर्घकालिक आपूर्तिकर्ता बन सकता है। 

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यही प्रश्न भारत की भविष्य की खनिज सुरक्षा रणनीति के केंद्र में है।आज म्यांमार दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा रेयर अर्थ उत्पादक देश बन चुका है। वर्ष 2024 में यहां लगभग 31,000 टन रेयर अर्थ खनिजों का उत्पादन हुआ। म्यांमार की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां ‘डिस्प्रोसियम’ और ‘टर्बियम‘ जैसे भारी रेयर अर्थ तत्व बड़ी मात्रा में पाए जाते हैं। इनका उपयोग इलेक्ट्रिक वाहनों यानी EV, पवन ऊर्जा संयंत्रों, अत्याधुनिक मैग्नेट्स और आधुनिक रक्षा उपकरणों के निर्माण में किया जाता है। दुनिया के अधिकांश देशों में हल्के रेयर अर्थ तत्व अधिक मिलते हैं, जबकि भारी रेयर अर्थ तत्व अपेक्षाकृत दुर्लभ होते हैं।

यही कारण है कि म्यांमार का महत्व और बढ़ जाता है। इन खनिजों का अधिकांश उत्पादन काचिन राज्य के चिपवी और मोमौक क्षेत्रों में होता है। पिछले एक दशक में यहां खनन गतिविधियां तेजी से बढ़ी हैं। हालांकि, वर्ष 2021 में हुए सैन्य तख्तापलट के बाद नागरिक प्रशासन लगभग पूरी तरह कमजोर हो गया और कई इलाकों में सरकार का नियंत्रण समाप्त हो गया। परिणामस्वरूप, इन क्षेत्रों में बिना पर्याप्त सरकारी निगरानी और नियमों के बड़े पैमाने पर खनन जारी है।रेयर अर्थ के अलावा म्यांमार में ‘टिन’, ‘टंगस्टन’, और ‘जे़ड’ जैसे बहुमूल्य खनिजों के भी विशाल भंडार हैं। इनका उपयोग इलेक्ट्रॉनिक्स, विशेष मिश्रधातुओं और रक्षा उद्योग में बड़े पैमाने पर किया जाता है। इसलिए म्यांमार केवल रेयर अर्थ का ही नहीं, बल्कि कई रणनीतिक खनिजों का भी महत्वपूर्ण स्रोत है।

दुनिया के लगभग 60 प्रतिशत रेयर अर्थ भंडार चीन के पास हैं और वैश्विक स्तर पर निकाले जाने वाले रेयर अर्थ तत्वों का लगभग 90 प्रतिशत प्रसंस्करण भी चीन ही करता है। यही कारण है कि इस क्षेत्र में चीन की लगभग एकाधिकार जैसी स्थिति बन गई है।हाल के वर्षों में चीन ने रेयर अर्थ खनिजों और उनसे जुड़ी प्रोसेसिंग तकनीक के निर्यात पर कई तरह के प्रतिबंध लगाए हैं। इससे स्पष्ट हो गया कि वह इन संसाधनों का उपयोग केवल आर्थिक नहीं बल्कि भू–राजनीतिक दबाव बनाने के लिए भी कर सकता है। ऐसे माहौल में म्यांमार के भारी रेयर अर्थ भंडार का महत्व और भी बढ़ जाता है।भारत के लिए यह स्थिति विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। भारत के पास लगभग 69 लाख टन रेयर अर्थ ऑक्साइड का भंडार है, जो दुनिया के बड़े भंडारों में गिना जाता है। लेकिन इनमें अधिकांश हल्के रेयर अर्थ तत्व हैं। भारत का वैश्विक रेयर अर्थ खनन उत्पादन में योगदान एक प्रतिशत से भी कम है और प्रोसेसिंग तथा रिफाइनिंग क्षमता तो इससे भी बहुत कम है। इसलिए भारत की आवश्यकता उन भारी रेयर अर्थ तत्वों की है जो म्यांमार के काचिन क्षेत्र में बड़ी मात्रा में उपलब्ध हैं। 

भारत ने वर्ष 2025 में ‘राष्ट्रीय क्रिटिकल मिनरल मिशन’  शुरू किया। इसके अलावा खान एवं खनिज अधिनियम, 1957 में वर्ष 2023 और 2025 में संशोधन भी किए गए ताकि महत्वपूर्ण खनिजों की खोज और उत्पादन को बढ़ावा दिया जा सके। इस दिशा में भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण, इंडियन रेयर अर्थ्स लिमिटेड यानी IRELऔर खनिज विदेश इंडिया लिमिटेड यानी KABIL जैसी संस्थाओं को भी मजबूत भूमिका दी गई है। सरकार समझती है कि केवल घरेलू संसाधनों से भारत की बढ़ती जरूरतें पूरी नहीं होंगी। इलेक्ट्रिक वाहन, नवीकरणीय ऊर्जा, इलेक्ट्रॉनिक्स और रक्षा निर्माण जैसे क्षेत्रों में तेजी से बढ़ती मांग को देखते हुए भारत को विदेशों से भी महत्वपूर्ण खनिजों की आपूर्ति सुनिश्चित करनी होगी।यहीं पर म्यांमार भारत के लिए स्वाभाविक विकल्प बनकर सामने आता है। भारत और म्यांमार की 1,643 किलोमीटर लंबी साझा सीमा है। भौगोलिक निकटता के कारण म्यांमार, ऑस्ट्रेलिया या अर्जेंटीना जैसे दूर स्थित देशों की तुलना में अधिक व्यावहारिक साझेदार बन सकता है, जहां KABIL पहले से खनिज खोज समझौते कर चुका है।हालांकि सबसे बड़ी चुनौती यह है कि म्यांमार के अधिकांश महत्वपूर्ण रेयर अर्थ भंडार सीधे वहां की सैन्य सरकार के नियंत्रण में नहीं हैं। काचिन राज्य के जिन क्षेत्रों में सबसे अधिक खनिज मौजूद हैं, वहां नियंत्रण मुख्य रूप से काचिन इंडिपेंडेंस आर्मी यानी KIA के पास है। वर्ष 2021 के सैन्य तख्तापलट और विशेष रूप से ऑपरेशन 1027 के बाद KIA ने अपने नियंत्रण वाले क्षेत्रों का काफी विस्तार किया है।

इसका अर्थ यह है कि भारत यदि म्यांमार के रेयर अर्थ क्षेत्र में निवेश करना चाहता है तो केवल सरकार से समझौता करना पर्याप्त नहीं होगा। अप्रत्यक्ष या प्रत्यक्ष रूप से उसे ऐसे सशस्त्र गैर–सरकारी संगठन से भी जुड़ने की चुनौती सामने आ सकती है जिसे म्यांमार की सरकार आधिकारिक मान्यता नहीं देती और जिसके साथ भारत का पहले कोई औपचारिक संवाद तंत्र भी नहीं रहा है।

कुछ मीडिया रिपोर्टों में यह दावा किया गया कि चीन के निर्यात प्रतिबंधों के बाद भारत ने इस क्षेत्र के सशस्त्र समूहों के साथ चुपचाप रेयर अर्थ आपूर्ति की संभावनाएं तलाशनी शुरू की हैं। हालांकि इन दावों को  काचिन इंडिपेंडेंस आर्मी और भारतीय अधिकारियों दोनों ने सार्वजनिक रूप से खारिज किया है। भारत की एक और बड़ी चुनौती चीन का पहले से स्थापित प्रभाव है। पिछले कई दशकों से चीन ने म्यांमार में सड़क, व्यापार और अन्य बुनियादी ढांचे में भारी निवेश किया है। उसने स्थानीय व्यापारियों और मध्यस्थों का मजबूत नेटवर्क भी तैयार कर लिया है। वर्तमान में काचिन राज्य से निकलने वाला अधिकांश रेयर अर्थ अयस्क सीधे चीन के युन्नान प्रांत पहुंचता है, जहां विशाल प्रोसेसिंग संयंत्र पहले से मौजूद हैं।चीन की कंपनियों ने केवल सरकारी समझौतों के आधार पर नहीं बल्कि स्थानीय सशस्त्र समूहों और मिलिशिया के साथ व्यावहारिक संबंध बनाकर इस व्यापार पर अपनी पकड़ बनाए रखी है। यही कारण है कि वर्ष 2018 के निर्यात प्रतिबंध, 2021 के सैन्य तख्तापलट और कई बार सीमा बंद होने के बावजूद यह व्यापार पूरी तरह बंद नहीं हुआ। यहां तक कि वर्ष 2024 में चीन ने युद्धविराम वार्ता के दौरान  काचिन इंडिपेंडेंस आर्मी पर दबाव बनाने के लिए आंशिक व्यापार प्रतिबंध लगाए, लेकिन उसके बाद भी यह नेटवर्क पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ।

इन सब घटनाक्रम के बाद भारत इन जटिल परिस्थितियों को अच्छी तरह समझता है। यही कारण है कि राष्ट्रपति मिन आंग ह्लाइंग की यात्रा के दौरान विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने केवल इतना कहा कि क्रिटिकल मिनरल्स का मुद्दा द्विपक्षीय विचार–विमर्श के तहत है और दोनों देश इस विषय पर संपर्क बनाए रखेंगे।इस यात्रा के दौरान न तो कोई समझौता ज्ञापन हुआ, न कोई खनिज खरीद समझौता और न ही किसी संयुक्त उद्यम की घोषणा की गई। इससे स्पष्ट है कि भारत फिलहाल बहुत सावधानी से आगे बढ़ना चाहता है। यदि भारत वास्तव में इस व्यापार का बड़ा हिस्सा अपनी ओर मोड़ना चाहता है तो केवल राजनीतिक समझौता पर्याप्त नहीं होगा। इसके लिए सड़क, बंदरगाह, परिवहन, वित्तीय निवेश और लॉजिस्टिक्स का ऐसा मजबूत ढांचा तैयार करना होगा जो अभी मौजूद नहीं है।

भारत की कलादान मल्टी–मॉडल ट्रांजिट ट्रांसपोर्ट परियोजना और भारत–म्यांमार–थाईलैंड त्रिपक्षीय राजमार्ग जैसी दो प्रमुख संपर्क परियोजनाएं वर्षों से अधूरी हैं। इसका उद्देश्य भारत के पूर्वोत्तर राज्यों को बंगाल की खाड़ी और दक्षिण–पूर्व एशिया से जोड़ते हुए क्षेत्रीय व्यापार, संपर्क और सामरिक पहुंच को मजबूत करना है। किंतु वर्ष 2021 के सैन्य तख्तापलट के बाद ‘राखाइन’ और ‘चिन’ राज्यों में बिगड़ी सुरक्षा स्थिति ने इन परियोजनाओं की प्रगति को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। हिंसा, सशस्त्र संघर्ष और अस्थिर प्रशासनिक व्यवस्था के कारण निर्माण कार्य बार–बार बाधित हुआ और समय–सीमा लगातार आगे खिसकती गई।

हाल ही में 9 जुलाई को आयोजित एक समन्वय बैठक में म्यांमार की सैन्य सरकार ने अपने कार्यकाल के भीतर दोनों परियोजनाओं को पूरा करने की प्रतिबद्धता दोहराई। हालांकि, जमीनी स्थिति अभी भी इस आश्वासन का समर्थन नहीं करती। परियोजनाओं के कई हिस्सों में सुरक्षित आवाजाही संभव नहीं है, जबकि अनेक मार्गों के पुनर्निर्माण और कुछ नए संपर्क मार्गों के विकास की आवश्यकता है। इन परियोजनाओं को पूरा करने के लिए केवल पर्याप्त वित्तीय निवेश ही नहीं, बल्कि स्थिर सुरक्षा व्यवस्था, प्रभावी प्रशासनिक समन्वय और अपेक्षाकृत शांत राजनीतिक वातावरण भी अनिवार्य है।
मौजूदा परिस्थितियों में निकट भविष्य में ऐसी अनुकूल स्थिति बनती नहीं दिखती।  फिर भी, इन चुनौतियों से म्यांमार का भारत के लिए रणनीतिक महत्व कम नहीं होता। बल्कि यही परिस्थितियां इस तथ्य को रेखांकित करती हैं कि भारत को तात्कालिक लाभ की अपेक्षा दीर्घकालिक, यथार्थवादी और संतुलित रणनीति अपनानी होगी, जिसमें संपर्क परियोजनाओं, आर्थिक सहयोग और सामरिक हितों को म्यांमार की बदलती राजनीतिक एवं सुरक्षा परिस्थितियों के अनुरूप आगे बढ़ाया जाए।

मई 2026 में भारत, ऑस्ट्रेलिया, जापान और अमेरिका के बीच शुरू हुआ ‘क्वाड क्रिटिकल मिनरल्स इनिशिएटिव फ्रेमवर्क’ भारत के लिए एक महत्वपूर्ण अवसर हो सकता है। इस मंच के माध्यम से भारत ऐसे साझेदार देशों के साथ मिलकर काम कर सकता है जिनके पास पूंजी, आधुनिक तकनीक, खनिज प्रसंस्करण क्षमता और अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक अनुभव मौजूद है।विशेष रूप से जापान इस दिशा में उपयोगी सहयोगी साबित हो सकता है क्योंकि उसे खनिज प्रोसेसिंग और बुनियादी ढांचे के वित्तपोषण का व्यापक अनुभव है। हालांकि अभी तक इस ढांचे के अंतर्गत म्यांमार से जुड़ा कोई औपचारिक कार्यक्रम शुरू नहीं हुआ है। इसका कारण यही है कि वहां अभी भी गृहयुद्ध जैसी स्थिति बनी हुई है और लगभग सभी बाहरी देश अत्यधिक सावधानी बरत रहे हैं।

इस स्थिति में कूटनीतिक दृष्टिकोण से भारत को नेपीडा के साथ संवाद जारी रखना चाहिए और GSI, KABIL तथा IREL जैसी संस्थाओं के माध्यम से तकनीकी और व्यावसायिक सहयोग बढ़ाना चाहिए। इससे भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण, खनिज खोज और भविष्य के निवेश की संभावनाएं बनी रहेंगी, भले ही अभी बड़े पैमाने पर खनन संभव न हो। इसके अलावा भारत को क्वाड जैसे छोटे लेकिन प्रभावी बहुपक्षीय समूहों का अधिक उपयोग करना चाहिए। जापान और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों के साथ साझेदारी से भारत को निवेश, प्रोसेसिंग तकनीक और आपूर्ति श्रृंखला विकसित करने में मदद मिल सकती है।

तीसरा: भारत की नीति इतनी लचीली होनी चाहिए कि वह म्यांमार की बदलती राजनीतिक परिस्थितियों के अनुसार स्वयं को ढाल सके। गृह संघर्ष अभी समाप्त होने से बहुत दूर है और भविष्य में अलग–अलग क्षेत्रों पर अलग–अलग पक्षों का नियंत्रण हो सकता है। इसलिए भारत को केवल सैन्य सरकार या केवल प्रतिरोधी समूहों पर निर्भर रहने के बजाय ऐसी नीति अपनानी चाहिए जो वास्तविक परिस्थितियों के अनुसार प्रभावी नियंत्रण रखने वाले पक्षों के साथ व्यावहारिक संवाद की गुंजाइश बनाए रखे, जबकि उसकी व्यापक विदेश नीति के सिद्धांत भी सुरक्षित रहें।

अंततः भू राजनीतिक तौर पर देखें तो म्यांमार को भारत के लिए तत्काल समाधान के रूप में नहीं बल्कि एक दीर्घकालिक रणनीतिक अवसर के रूप में देखा जाना चाहिए। इस अवसर को वास्तविक सफलता में बदलने के लिए दोनों देशों की केंद्रीय और राज्य स्तरीय एजेंसियों के बीच लगातार सहयोग, संपर्क परियोजनाओं का समय पर पूरा होना, सुरक्षित परिवहन मार्ग, पर्याप्त प्रोसेसिंग क्षमता और म्यांमार की बदलती राजनीतिक परिस्थितियों के अनुरूप लचीली नीति आवश्यक होगी।जब तक ये सभी परिस्थितियां अनुकूल नहीं होतीं, तब तक म्यांमार का विशाल रेयर अर्थ खनिज भंडार भारत के लिए एक महत्वपूर्ण रणनीतिक संभावना तो रहेगा, लेकिन उसे पूरी तरह व्यावहारिक और उपयोगी संसाधन में बदलने में अभी समय लगेगा।

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