तिब्बत सीमा से सटे नेपाल के रसुवा जिले में भोटेकोशी नदी के उफान ने रोंगटे खड़े करने वाली तबाही मचाई है। नदी में अचानक आए बेकाबू सैलाब के चलते कुछ ही मिनटों में सड़कें, पक्की इमारतें और पूरे के पूरे गांव बह गए। इस जल प्रलय में अब तक सैंकड़ो लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी है, जबकि 1,000 से ज्यादा लोग लापता हैं। लापता लोगों में भारत और अमेरिका समेत दुनिया के 26 देशों के नागरिक शामिल हैं। वैज्ञानिक और भू–विशेषज्ञ इस भयानक आपदा का सीधा कनेक्शन सीमा पार तिब्बत में हो रही अनियंत्रित गतिविधियों से जोड़ रहे हैं। तिब्बत के पठार पर चीन लगातार भारी निर्माण कार्य कर रहा है, जिसकी वजह से वहां के ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं और पहाड़ों पर बनी प्राकृतिक बर्फीली झीलें (GLOFs) फट रही हैं। इन्हीं झीलों का अचानक छूटा पानी जब नीचे उतरता है, तो नेपाल, भारत और पूरे दक्षिण एशिया के लिए मौत का पैगाम लेकर आता है। चीन की यह मनमानी पूरे हिमालयी इलाके के लिए खतरे की घंटी बन चुकी है।
ऊंचाई का फायदा और कीमती खजाने पर नजर
तिब्बत समुद्र तल से 4 हजार मीटर से भी ज्यादा ऊंचाई पर है। इस भारी ऊंचाई की वजह से चीनी सेना को भारतीय उपमहाद्वीप पर नजर रखने और अपनी स्थिति मजबूत करने में भारी मदद मिलती है। चीन के लिए यह इलाका एक प्राकृतिक ढाल की तरह काम करता है, जो उसके मुख्य शहरों को दक्षिण–पश्चिम की तरफ से पूरी सुरक्षा देता है। इसके अलावा तिब्बत में तांबे का बहुत बड़ा भंडार है, जो चीन के कुल तांबे का 30 फीसदी से भी ज्यादा है। यहां की खारी झीलों से निकलने वाला लिथियम, क्रोमियम और दुर्लभ खनिज चीन की इलेक्ट्रिक गाड़ियों, मोबाइल बैटरी और आधुनिक हथियारों के उद्योग के लिए बेहद जरूरी हैं। इसी दौलत पर कब्जा जमाए रखने के लिए चीन यहां लगातार पैर पसार रहा है।
एशिया के पानी पर चीन का पहरा
तिब्बत को ‘एशिया का वॉटर टावर‘ कहा जाता है क्योंकि यहां से ब्रह्मपुत्र, सिंधु, सतलुज, मेकांग, यांग्त्जी और पीली नदी जैसी 10 बड़ी नदियां निकलती हैं। इन नदियों के मुहाने पर कब्जा होने से चीन के पास भारत, बांग्लादेश, पाकिस्तान और वियतनाम जैसे देशों के करीब 200 करोड़ लोगों का पानी रोकने या मोड़ने की ताकत आ गई है। चीन अब ब्रह्मपुत्र नदी पर मेडोग में 60 गीगावाट का एक बहुत बड़ा बांध बनाने की तैयारी कर रहा है। यह बांध दुनिया के सबसे बड़े ‘थ्री गॉर्जेस बांध‘ से भी तीन गुना बड़ा होगा। अगर चीन ने इन नदियों के पानी को रोका या बिना बताए अचानक भारी पानी छोड़ दिया, तो निचले देशों में भयंकर सूखा या प्रलयंकारी बाढ़ आ सकती है।
सेना के लिए सड़कों और रेल की बिसात
चीन तिब्बत में हर सड़क और रेल लाइन इस तरह बना रहा है कि जंग के वक्त उसकी सेना और भारी तोपें कुछ ही घंटों में सीमा तक पहुंच सकें। भारत सीमा के करीब बनने वाला G695 हाईवे और तिब्बत का 1 लाख 20 हजार किलोमीटर लंबा सड़क नेटवर्क इसी मकसद से तैयार हुआ है। सिचुआन–तिब्बत रेल लाइन बनने के बाद चेंगदू से ल्हासा की दूरी 48 घंटे से घटकर केवल 13 घंटे रह जाएगी। इसके अलावा ल्हासा और न्यिंगची के हवाई अड्डों पर लड़ाकू विमानों के लिए खास रनवे और मिसाइलें तैनात की गई हैं। सीमा के ठीक पास चीन ने 600 से ज्यादा नए गांव बसाए हैं, जहां रहने वाले लोग सेना के लिए जासूसी और मदद का काम करते हैं।
तेजी से पिघलती बर्फ और जमीन धंसने का डर
तिब्बत का पठार दुनिया के बाकी हिस्सों की तुलना में तीन गुना तेजी से गर्म हो रहा है। भारी मशीनों के चलने और निर्माण से निकलने वाले धुएं व कालिख की वजह से यहां के 80 फीसदी ग्लेशियर सिकुड़ रहे हैं। तिब्बत की जमीन के नीचे जमी लाखों साल पुरानी बर्फ पिघलने लगी है। इस जमी हुई बर्फ के पिघलने से जमीन के अंदर दबी खतरनाक मीथेन गैस बाहर निकल रही है, जो हवा को और ज्यादा गर्म कर रही है। बर्फ पिघलने की वजह से तिब्बत के लगभग 70 फीसदी रास्तों पर जमीन धंसने और बड़े–बड़े लैंडस्लाइड का खतरा बना हुआ है।
पड़ोसी देशों की खेती और जिंदगी पर आफत
चीन जब पहाड़ों पर बड़े–बड़े बांध बनाता है, तो नदियों के साथ बहकर आने वाली उपजाऊ मिट्टी और गाद वहीं रुक जाती है। इसका सीधा नुकसान असम, पूर्वोत्तर भारत और बांग्लादेश के किसानों को होता है, क्योंकि उनके खेतों को प्राकृतिक खाद नहीं मिल पाती और जमीन बंजर होने लगती है। इसके साथ ही चीन ने तिब्बत के मूल चरवाहों को उनकी जमीनों से हटा दिया है और जंगलों को काटकर रास्ते बना दिए हैं। हिमालय के इस नाजुक संतुलन से छेड़छाड़ का खामियाजा आने वाले सालों में पूरे दक्षिण एशिया को भुगतना पड़ेगा।

































