सुपर अल नीनो की आशंका ने दुनिया भर में मौसम को लेकर चिंता बढ़ा दी है। प्रशांत महासागर में समुद्र की सतह का तापमान असामान्य रूप से बढ़ने का असर बारिश, गर्मी और सर्दी के सामान्य चक्र पर पड़ सकता है। भारत के लिए यह चिंता इसलिए ज्यादा है, क्योंकि यहां मौसम में बदलाव का सीधा असर खेती, खाद्य आपूर्ति और महंगाई पर पड़ता है। उत्तर भारत में अगर इस बार सर्दी कम पड़ी और फरवरी-मार्च में तापमान तेजी से बढ़ा, तो गेहूं की पैदावार प्रभावित हो सकती है। वहीं, बारिश का असामान्य वितरण किसानों की मुश्किलें बढ़ा सकता है।
हालांकि, सुपर अल नीनो का मतलब यह नहीं है कि भारत में कम सर्दी, बेमौसम बारिश या खराब फसल निश्चित है। असली खतरा तब बढ़ेगा, जब मौसम के कई प्रतिकूल बदलाव एक साथ सामने आएंगे।
क्या है सुपर अल नीनो और दुनिया क्यों चिंतित है?
अल नीनो प्रशांत महासागर में होने वाली एक प्राकृतिक जलवायु प्रक्रिया है। इसमें भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्सों में समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से अधिक हो जाता है। इससे हवाओं और वायुमंडलीय गतिविधियों में बदलाव आता है, जिसका असर दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में बारिश और तापमान पर पड़ सकता है।
जब यह घटना असाधारण रूप से मजबूत होती है, तो इसे आम तौर पर सुपर अल नीनो कहा जाता है। इसके दौरान कुछ क्षेत्रों में सूखे और गर्मी का खतरा बढ़ सकता है, जबकि दूसरे क्षेत्रों में अत्यधिक बारिश और बाढ़ जैसी स्थितियां बन सकती हैं।
भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि इस बदलाव का असर मानसून, सर्दियों और कृषि चक्र पर कितना पड़ता है। इतिहास में अल नीनो की कई घटनाएं भारत में कमजोर मानसून से जुड़ी रही हैं, लेकिन हर बार परिणाम एक जैसे नहीं रहे। हिंद महासागर की स्थिति और क्षेत्रीय मौसम प्रणालियां भी अहम भूमिका निभाती हैं।
क्या इस बार उत्तर भारत में कम पड़ेगी सर्दी?
सुपर अल नीनो को लेकर चिंता के बीच उत्तर भारत में सर्दियों के सामान्य से गर्म रहने का जोखिम भी महत्वपूर्ण है। अगर जनवरी के बाद तापमान तेजी से बढ़ा और फरवरी-मार्च में गर्मी समय से पहले आ गई, तो इसका असर गेहूं की फसल पर पड़ सकता है।
गेहूं की अच्छी पैदावार के लिए फसल के विकास और दाने बनने के दौरान अनुकूल तापमान जरूरी होता है। पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और राजस्थान जैसे प्रमुख गेहूं उत्पादक क्षेत्रों में सर्दियों का मौसम फसल की गुणवत्ता और उत्पादन तय करने में अहम भूमिका निभाता है।
कम ठंड और समय से पहले बढ़ती गर्मी के कारण फसल जल्दी पक सकती है। इससे दानों को पूरी तरह विकसित होने के लिए कम समय मिलता है और उनका वजन घट सकता है। नतीजतन, प्रति हेक्टेयर उत्पादन प्रभावित होने की आशंका रहती है।
हालांकि, यह मान लेना जल्दबाजी होगी कि सुपर अल नीनो के कारण पूरे उत्तर भारत में सर्दी कम पड़ेगी। पश्चिमी विक्षोभ, हिमालय में बर्फबारी और स्थानीय मौसम प्रणालियां भी सर्दियों के तापमान को प्रभावित करती हैं।
बेमौसम बारिश भी बढ़ा सकती है किसानों की मुश्किलें
सर्दियों में बारिश गेहूं के लिए उपयोगी हो सकती है, लेकिन उसका समय और मात्रा बेहद महत्वपूर्ण है। जरूरत से ज्यादा बारिश, खेतों में जलभराव या फसल पकने के समय खराब मौसम नुकसान पहुंचा सकता है।
बेमौसम बारिश और तेज हवाओं से गेहूं के पौधे गिर सकते हैं। इससे कटाई में देरी और दानों की गुणवत्ता खराब होने का खतरा बढ़ता है। दूसरी ओर, अगर बारिश कम हुई और सिंचाई की पर्याप्त व्यवस्था नहीं रही, तो फसल को जरूरी नमी नहीं मिल पाएगी।
यानी किसानों के सामने दोहरा जोखिम हो सकता है—एक तरफ असामान्य बारिश और दूसरी तरफ कम ठंड के बाद तेजी से बढ़ता तापमान। हालांकि, इन दोनों स्थितियों का एक साथ आना तय नहीं है। इसके लिए आने वाले महीनों के मौसम पूर्वानुमानों पर नजर रखना जरूरी होगा।
गेहूं की फसल प्रभावित हुई तो बढ़ सकती है खाद्य महंगाई
गेहूं भारत के प्रमुख खाद्यान्नों में शामिल है। इसका इस्तेमाल आटा, रोटी, ब्रेड और कई दूसरे खाद्य पदार्थों में होता है। इसलिए उत्पादन में बड़ी गिरावट का असर किसानों से आगे बढ़कर आम परिवारों के बजट तक पहुंच सकता है।
अगर पैदावार घटती है और बाजार में उपलब्ध गेहूं की मात्रा कम होती है, तो कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है। गेहूं महंगा होने से आटे की कीमतें भी बढ़ सकती हैं। यदि मौसम की प्रतिकूल परिस्थितियां दूसरी फसलों को भी प्रभावित करती हैं, तो खाद्य महंगाई का दायरा और बढ़ सकता है।
हालांकि, कीमतों में कितनी तेजी आएगी, यह केवल फसल पर निर्भर नहीं करेगा। सरकारी भंडार, बाजार में उपलब्ध आपूर्ति, सरकारी खरीद और आयात-निर्यात से जुड़े फैसले भी इसमें महत्वपूर्ण होंगे।
खाद्य सुरक्षा के लिए क्यों अहम है अगला फसल चक्र?
भारत के लिए खाद्य सुरक्षा का मतलब पर्याप्त अनाज उत्पादन के साथ लोगों तक उसकी सुलभ कीमत पर पहुंच सुनिश्चित करना भी है। गेहूं की पैदावार में बड़ी गिरावट होने पर सरकारी खरीद प्रभावित हो सकती है और सार्वजनिक वितरण प्रणाली के लिए उपलब्ध अनाज पर दबाव बढ़ सकता है।
ऐसी स्थिति में सरकार को अपने भंडार, खरीद व्यवस्था और बाजार में आपूर्ति की समीक्षा करनी पड़ सकती है। जरूरत पड़ने पर भंडार से अनाज जारी करना या व्यापार नीति में बदलाव करना भी विकल्प हो सकते हैं।
दूसरी ओर, पर्याप्त भंडार और समय पर कदम उठाकर कीमतों में अचानक बढ़ोतरी के असर को कम किया जा सकता है। इसलिए अभी से उत्पादन, मौसम और खाद्यान्न भंडार के संकेतों पर नजर रखना जरूरी है।
भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती क्या है?
सुपर अल नीनो की आशंका भारत के लिए केवल मौसम की चेतावनी नहीं है। यह कृषि उत्पादन, खाद्य महंगाई और खाद्य सुरक्षा से जुड़ा संभावित जोखिम है। उत्तर भारत में कम ठंड, समय से पहले बढ़ता तापमान, बारिश का असामान्य वितरण और सिंचाई के पानी की कमी एक साथ सामने आए, तो गेहूं की फसल पर दबाव बढ़ सकता है।
लेकिन अभी खराब फसल या खाद्य संकट की भविष्यवाणी करना सही नहीं होगा। आने वाले महीनों में वास्तविक तापमान, बारिश, बुवाई का रकबा, मिट्टी की नमी और सरकारी भंडार की स्थिति ही बताएगी कि खतरा कितना बड़ा है।
भारत के लिए असली चुनौती सुपर अल नीनो से डरने की नहीं, बल्कि उसके संभावित असर के लिए तैयार रहने की है। अगर मौसम प्रतिकूल रहा, तो समय रहते किसानों को सलाह, सिंचाई की व्यवस्था और बाजार में पर्याप्त अनाज की उपलब्धता सुनिश्चित करना महंगाई और खाद्य सुरक्षा के जोखिम को कम करने में अहम होगा।
































