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भाजपा-जदयू का मेल हुए दस दिन नहीं हुए, और मीडिया ने बिहार को असहिष्णु घोषित कर दिया

Marmik Shah द्वारा Marmik Shah
9 August 2017
in मत
बिहार
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भाजपा और जदयु की सरकार को बने दस दिन भी नहीं हुए, और मीडिया ने इन्हे असहिष्णु करार दे दिया

अभी दस दिन भी नहीं हुए हैं, जब नितीश बाबू ने दल बदलते हुए दागदार महागठबंधन को छोड़ा और मौके की नजाकत को समझते हुए भाजपा का सहयोगी बने, और अब बिहार असहिष्णु भी बन गया। जिस शराबबंदी और अन्य कथित विकासवादी परियोजनाओं के गुणगान करते हमारी मीडिया थकती नहीं थी, अब अछूत और अपवित्र हो गयी है इनके लिए। अब बिहार की चर्चा सिर्फ सांप्रदायिकता के चश्मे से ही देखी जाती है। शासन तो वही व्यक्ति कर रहा है, बस नज़रिया बदल गया है। लालू प्रसाद यादव, जिसने बिहार को लगभग दो दशक तक अपने चंगुल में कैद करके रखा, इनके हिसाब से जातिगत राजनीति से कोई वास्ता नहीं रखते थे।

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जिसके लिए लुटयेंस मीडिया कुख्यात है, उसी को बखूबी निभाते हुए और बड़े निष्ठा से अपने मालिकों के तलवे चाटते हुए ये महागठबंधन के टूटते ही असहिष्णुता और गौ रक्षकों के रंगों से बिहार को रंगने लग गए हैं।

अब सवाल ये नहीं की बिहार में शासन प्रशासन सुधरेगा की नहीं, बल्कि यह है की कैसे सांप्रदायिकता एक ही हफ्ते के अंदर-अंदर बिहार सरकार का एक महत्वपूर्ण अंग कैसे बन गयी?

ये हैरानी की भी बात है की जो मीडिया संगठन गौ रक्षा के मुद्दे पर चीर फाड़ करने में कोई संकोच नहीं करती, वो अब तक इससे पहले के जितने भी गौ रक्षा से जुड़े मुद्दे हैं, उनपर कभी पहले क्यों नहीं बात की? शासन प्रशासन की दिक्कत अब कैसे इन्हें इतनी तकलीफ देने लेगी?

26 जुलाई 2017 से पहले और बाद की मीडिया कवरेज में व्यापक बदलाव ये बताने के लिए काफी है, की कैसे मीडिया किसी भी सरकार, जिसमें भाजपा या हिन्दू राष्ट्रवाद का रत्ती भर भी अंश मौजूद है, को सर्वथा गलत ठहराने पर तुली रहती है।

 

आप उदाहरण के लिए द वायर के लेखों की सूची को ही देख सकते हैं, जो बिहार में 26 जुलाई 2017 के पहले और बाद में प्रकाशित हुई थी।

 

26th July, 2017 के पहले

दही उर्वरक – बिहार में कृषि लागत घटाने का कारगर उपाय – 17/7/2017

बिहार को एक असली राजनैतिक की आवश्यकता है, अपने आप में यकीन करे – 12/07/2017  

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नितीश की राजनैतिक आत्महत्या की पहेली  – 04/08/2017 [बाकी आप समझदार है]

ऊपर के शीर्षक तो सिर्फ एक वामपंथी मीडिया हाउस की उपज है। ये बदलाव इतना साफ और स्पष्ट है की मेरे जैसा नौसिखिया भी इनके इरादे भाँप गया, आखिर इतनी तेज़ी से इन्होंने अपनी विचारधारा विकास से हटाकर अति राष्ट्रवाद और गौ रक्षा के मुद्दे पर जो घसीट लिया।

पाठकों की सुविधा के लिए नीचे क्विंट और द इंडियन एक्सप्रेस के लेखों की सूची भी नीचे डाली गयी है।

ऐसे मीडिया संगठनों के लिए खबरें प्रचारित और प्रसारित करना अपनी सहूलियत के हिसाब से किया जाता है। खबरें बताने में ये दोगलापन इनके राजनैतिक आकाओं के प्रति इनकी वफादारी की झलक देता है, जो इनके खबरें छापने पर अपना नियंत्रण रखते हैं। हजारों, लाखों करोड़ों के घोटाले, इस्लामिक आतंकवाद, बलात्कार और मानव तस्करी इनके लिए कोई मायने नहीं रखते, और अगर कुछ है तो एक कथित गौरक्षक का हमला, जो कथित रूप से अवैध गौहत्या का विरोध करता है, जिसे जानबूझकर वाइरल किया जाता है, ताकि एजेंडा सर्वोपरि रहे, और न की सच्ची खबर और जानकारी।

वैसे यह कोई नई बात नहीं है, क्योंकि अगर कोई इनकी पत्रकारिता को एक साफ चश्मे से देखेगा, तो उसे पता चलेगा की इनमें कितना पक्षपात कूट कूट के भरा है। यही मीडिया हाउस पंजाब में चुनाव तक ड्रग्स का मुद्दा उठा रहे द, पर काँग्रेस की सरकार आते ही सब चुप, जैसे स्वर्ग उतर आया हो पंजाब में।

यही दिल्ली के चुनावों के पहले भी हुआ था, जहां मीडिया वालों ने चर्चों अथवा मस्जिदों पर हुए कुछ छिटपुट हमलों का तमाशा बना आम आदमी पार्टी को अनुचित तरजीह दी, सिर्फ इसलिए ताकि नई दिल्ली में भाजपा सत्ता में न आ सके। आम आदमी पार्टी के सत्ता में आते ही ऐसी सारी खबरें ऐसे गायब हो गयी, जैसे गधे के सिर से सींग।

पिछले 20 महीने से महागठबंधन के अंतर्गत बिहार में किसी प्रकार की कोई समस्या नहीं था, पर भाजपा जदयु की सरकार आते ही पूरा शासन प्रशासन सिर्फ एक हफ्ते के अंदर ही चरमराने लगा, हैं?

सरकार पर सवाल उठाना निस्संदेह जनता का अधिकार है, पर सवाल के पीछे का तर्क भी तो वाजिब होना चाहिए। पक्षपाती सवाल ही तो सारे फ़सादों की जड़ है।

लुटयेंस मीडिया की बत्ती तब गुल हो जाएगी, जब पी चिदम्बरम एक आतंकवादी इशरत जहां का महिमामंडन करेगा, या सोनिया गांधी करोड़ों रुपया डकार जाएगी, या फिर कर्नाटक के उर्जा मंत्री डीके शिवकुमार के घर से करोड़ों के नोटों के बंडल मिलेंगे, पर मजाल है की देश का प्रधानमंत्री भ्रष्ट नेताओं के खिलाफ एक उंगली भी उठा ले। तृणमूल शासित बंगाल हो या केजरीवाल शासित दिल्ली, उंगली उठने की देर है और फिर मीडिया की भसड़ शुरू। यही पक्षपाती पत्रकारिता है जिससे हमारे देश को ज़्यादा खतरा है, क्योंकि बाहरी दुश्मनों से ज़्यादा खतरा अब अंदरूनी दुश्मनों से होने लगा है।

सोशल मीडिया की उदय एक दोधारी तलवार है, क्योंकि यह हमारे लिए वरदान भी है और श्राप भी। अब बिकी हुई मीडिया को पहचानना ज़्यादा आसान है, पर इतने सार ज्ञान के कारण हमारी याददाश्त भी धीरे धीरे कमजोर होने का खतरा बना हुआ है।

जैसे जैसे विपक्ष की करतूतें खुलकर सामने आ रही है, चाहे वो नेशनल हेराल्ड हो बोफोर्स या राष्ट्रकुल खेल घोटाला, चारा घोटाला हो या फिर सोलर पैनल घोटाला हों, लोग अब वामपंथी प्रतिक्रिया के चक्कर में कथित सेक्युलर पार्टियों के कई पाप भुलाने को विवश हो रहे हैं, क्योंकि ये मीडिया आपको सही मुद्दा दिखाना ही नहीं चाहती, वरना अब तो जितने घोटाले हुए हैं, उसके हिसाब से आधी विपक्ष से देश के कई कारागार भरे होते।

समाचार संगठन अपना एजेंडा फैलाने में कोई संकोच नहीं करते, जैसे उन्होने अभी एक ऐसे मामले में किया जहां एक भाजपा के नेता के बेटे पर एक लड़की के गलत नीयत से पीछा करने के आरोप लगा था। इसे राष्ट्रीय मुद्दा बनाने में मीडिया ने कोई कसर नहीं छोड़ी, पर जब आरएसएस कार्यकर्ताओं की केरल में हत्या होती है, तो इनहि मीडिया वालों के मुंह में दही जम जाता है।  [ध्यान रहे, हम किसी दोषी का बचाव नहीं कर रहे, बस हम यहाँ पर मीडिया के पक्षपाती रवैये का विरोध कर रहे हैं]

ऐसे लोगों का इसी विषैली विचारधारा को जारी रखना पड़ा अब काफी मुश्किल होगा, जब हम जैसे सच्चाई के प्रहरी मौजूद हों। पाठकों के लिए बस इतना ही कहना चाहता हूँ की हम जब अभी ऐसा दोगलापन किसी लेख में देखेंगे, जिससे भोली भाली जनता इनके बहकावे में आए, तब तब हमारी आवाज़ और मुखर होगी।

1] बीफ लेजाने वाले आदमी को दबोचा गया, पीटा गया, ट्रक ज़ब्त

[2] मांस के ऊपर बिहार में पहली मारपीट

[3] मोदी को इस्तीफा दे देना चाहिए: तृणमूल

Tags: नितीश कुमारबिहारमीडियामोदीलालू
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टिप्पणियाँ 1

  1. Virat says:
    9 years पहले

    लगता है की अमित शाह पाकिस्तान में भी सरकार बनायेंगे. :D

    Reply

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