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मिलिए शहरी नक्सली गैंग से जिन्होंने पुणे में दलितों के नाम पर अपना उल्लू सीधा किया

Nitesh Kumar Harne द्वारा Nitesh Kumar Harne
6 January 2018
in मत
पुणे नक्सली हिंसा
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1 जनवरी 2018 को दलितों की पेशवाओं पर 200 वर्ष पुरानी विजय पर शौर्य दिवस का आयोजन रखा गया था जिसमे कुछ सुनियोजित हिंसा को अंजाम दिया गया और इस घटना को एक सोची समझी चाल के तहत ब्राहमण बनाम दलित के रूप में पेश कर इस जातीय दंगों की आग महाराष्ट्र समेत पूरे देश में लगाई गयी। दलितों को ब्राह्मणों के खिलाफ भड़काकर जातीय दंगे करनेवाले इस कार्यक्रम परत दर परत खुलते ही इसके तार वास्तव में नक्सलवादियों से जुड़ते नजर आ रहे है। यह कार्यक्रम दलितों का शौर्य दिवस तो था लेकिन इसे अर्बन नक्सलियों ने पूरी तरह हाईजैक कर रखा था और एक सुनियोजित षड्यंत्र था।

जैसे-जैसे आयोजकों और मंचासीन लोगों की असलियत खुलती गई, वैसे-वैसे परत-दर-परत इसका खुलासा होता चला गया। भीमा-कोरेगाँव में यह आयोजन प्रतिवर्ष होता है, जिसमें कुछ हजार दलित शामिल होते हैं। लेकिन इस वर्ष लगभग आठ माह पहले से ही तैयारी शुरू की गई थी कि इसमें लाखों लोग शामिल हो पाए। षड्यंत्र कुछ ऐसा रचा गया कि सरकार पर दबाव बनाया जा सके और इस हंगामे को ब्राह्मण बनाम दलित के रूप में दिखाया जाए। अर्बन नक्सली नफरत के इस खेल में खासे माहिर हैं।

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पुणे में दलितों के कार्यक्रम में नजर आये नक्सली समर्थक चेहरे

यह कार्यक्रम सिर्फ दलितों का ही न होकर यह पूर्णतः नक्सलियों के लिए बनाया गया एक कार्यक्रम हो चुका था। इस कार्यक्रम की निमंत्रण पत्रिका पर निगाह डालते ही समझ में आ जाता है कि इस तथाकथित दलित आंदोलन को नक्सलवादियों ने पूरी तरह हाईजैक कर लिया था और इसे परदे के पीछे से फर्जी दलित चिंतकों तथा महिला विरोधी संगठन ऑल इण्डिया मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड और कुछ देशविरोधी गतिविधियों में लिप्त ताकतों ने समर्थन दिया हुआ था। एक नजर डालते है निमंत्रण पत्रिका के नामों पर

उमर खालिद : यह वो नाम है जिसे शायद ही देश में कोई हो जो नहीं जनता होगा। उमर खालिद जेएनयु में भारत तेरे टुकड़े होंगे जैसे देशविरोधी नारें लगनेवाले गैंग का मुखिया था। इस घटना के बाद उमर खालिद पर देशद्रोह का केस दर्ज हुआ लेकिन यह जमानत पर बाहर है। उमर खालिद के तार पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद से जुड़े है। कश्मीर में पत्थरबाजी के आकाओं से उमर खालिद की दोस्ती चर्चा में थी। देश भर के विश्वविद्यालयों में अराजकता फैलाने वाले देशविरोधी तत्वों का मास्टरमाइंड उमर खालिद दलितों के शौर्य दिवस के कार्यक्रम किस हैसियत और किस मकसद से शामिल था यह सोचने वाली बात है। जेएनयु काण्ड के बाद उमर खालिद अर्बन नक्सलियों का पोस्टर बॉय बनकर उभरा है।

सुधीर ढवले : यह हाल ही में नक्सलवादी गतिविधियों में शामिल होने को लेकर नागपुर की सेन्ट्रल जेल में चालीस महीने की कैद काटकर बाहर आया हैं। इसे पुणे के कार्यक्रम में अतिथि के रूप में आमंत्रित किया गया था।

सोनी सोरी : छत्तीसगढ़ की नक्सल समर्थक स्वघोषित समाजसेविका भी इस कार्यक्रम हिस्सा लेने पुणे पहुंची थी। दलितों के शौर्य दिवस के कार्यक्रम में नक्सल समर्थक को आमंत्रित करने का क्या मकसद था यह विचार करने वाली बात है।

जिग्नेश मेवानी: यह नाम गुजरात चुनाव से निकल कर आया है। जिग्नेश मेवानी आजकल फर्जी अम्बेडकरवादी गैंग का सदस्य है और खुद को दलितों का मसीहा के रूप में स्थापित करने की जुगाड़ में है। हाल ही में गुजरात में जातीय संघर्ष पैदा करके विधायक बना है।  यह अपनी जहरीले भाषण और भड़काऊ बयानबाजी के लिए जाना जाता है। शौर्य दिवस के एक दिन पूर्व हुए यलगार परिषद् में जिग्नेश मेवानी ने सरकार और मोदी के खिलाफ जमकर आग उगली थी। इसने दलितों को हिन्दुओं के खिलाफ भड़काने में अहम भूमिका निभायी थी। आजकल जिग्नेश और उमर खालिद के दोस्ती के किस्से काफी चर्चा में है। अर्बन नक्सल की गैंग का सदस्य होने के सरे गुण मौजूद है।

प्रकाश आंबेडकर: यह भारीप बहुजन महासंघ के अध्यक्ष है लेकिन इन्होने खुलेआम नक्सलवादियों का समर्थन किया है। इन्हें नक्सली समाज के दुश्मन नहीं बल्कि मित्र नजर आते है। यह खुलकर नक्सल्वाद का महिमामंडन करते है।  इस कार्यक्रम को परदे के पीछे से अंजाम देनेवालों में यह प्रमुखता से थे। प्रकाश अंबेडकर के रिश्तेदार मिलिंद तेलतुम्बडे, माओवादियों की सेन्ट्रल कमेटी का सचिव है और फिलहाल फरार है।

बी.जी. कोलसे पाटिल : मुम्बई उच्च न्यायालय के भूतपूर्व न्यायाधीश पहले तो महाराष्ट्र में भड़के मराठा आंदोलन को समर्थन दे रहे थे लेकिन वहां फायदा मिलता नहीं देख यह अब माओवादियों से हाथ मिलाने को आतुर है।

मौलाना अजहरी : आल इंडिया पर्सनललॉ बोर्ड के सदस्य है। यह वही संस्था है जो मुस्लिमों के हित की बात करती है लेकिन तीन तलाक और महिला हक़ के खिलाफ है। मौलाना अजहरी जैसे लोग भी पुणे के इस कार्यक्रम का हिस्सा थे।

उल्का महाजन, हर्षाली पोतदार तथा कबीर कला मंच के शिलेदार जो खुद पाँच वर्ष जेल में रहकर बाहर निकले हैं।

ये सभी लोग पुणे आंदोलन के सूत्रधार थे। इसी से समझा जा सकता है कि वास्तव में भीमा-कोरेगाँव का यह प्रदर्शन कतई दलितों का नहीं था, बल्कि शहरी नक्सलवादियों ने इसे पूरी तरह हाईजैक कर लिया था। पुणे के शनिवारवाडा में 31 दिसंबर की शाम एक आमसभा ली गयी थी जिसमे उमर खालिद और जिग्नेश मेवानी ने सरकार, प्रधानमंत्री मोदी, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और हिन्दुओं के खिलाफ जमकर जहर उगला था। यह वही उमर खालिद है जो साईबाबा नामक नक्सलवादी प्रोफ़ेसर को जमानत मिलने पर उनके स्वागत में नागपुर सेन्ट्रल जेल के बाहर हाजिर था।

अर्बन नक्सलवादियों की सरकार से दुश्मनी के पीछे का सच

पिछले तीन वर्षों में मोदी सरकार ने महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ समेत देश के कई इलाकों में नक्सली आतंकियों का सफाया तो किया ही है, बल्कि बाहर से आने वाली फंडिंग पर भी प्रभावी तरीके से रोक लगा रखी है। नोटबंदी जैसे फैसलों ने नक्सलियों और कश्मीर के पत्थरबाजों की कमर तोड़ रखी है। यही वजह है की इन शहरी नक्सली और आतंकी समर्थित काफी बेचैन है और बिलबिला रहे है। यह नक्सल समर्थित भारत तेरे टुकड़े होंगे गैंग के सरगना आये दिन ऐसे ही किसी घटना, किसी आंदोलन/प्रदर्शन की ताक में रहते हैं ताकि उसमें घुसपैठ करके हंगामा खड़ा किया जाए, सरकार के खिलाफ माहोल बनाया जा सकें और सरकारों को बदनाम करके खुद के लिए चन्दे की जुगाड़ बैठाई जा सके।

फडनवीस सरकार ने दिए जांच के आदेश, जल्द पता चलेगा हिंसा भड़काने के पीछे का मास्टरमाइंड

फडनवीस सरकार ने उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश की अध्यक्षता में जाँच आयोग बैठा दिया है, इससे इस सम्पूर्ण घटना के पीछे कौन लोग थे, उनका उद्देश्य क्या था और उन्हें कहाँ-कहाँ से फंडिंग मिल रही थी, इसकी जाँच होगी। इस घटना से इतना तो तय है की शहरों में घात लगाये बैठे यह अर्बन नक्सली किसी बड़े युद्ध की तैयारी में है। इन्हें पहचानना इसलिए भी मुश्किल है क्यूंकि दलितों के आड़ में यह चर्च फंडिंग के सहारे समाज में हमारे ही बीच छुपे बैठे है। यह अक्सर ऐसे ही किसी घटना और दलित आन्दोलन की रह देखते रहते है की इन्हें मौका मिले और यह इस घटना को अंजाम दे। यह दलितों को और अन्य जातियों को भड़काने और हंगामा कर जातियों में बांटने में माहिर होते है। गुजरात में इसका ताजा उदहारण देखने को मिला था। जिग्नेश मेवानी इसका एकदम नया उदहारण है जिसने ऊना काण्ड के बाद से लगातार दलितों को भड़काने का काम किया है और आखिरकार जातिवाद का जहर गुजरात चुनाव में देखने को मिला। आगे भी इस तरीके की घटनाओं को अंजाम देने की पूरी संभावनाएं है सरकार को चाहिए की ख़ुफ़िया तंत्रों के सहारे ऐसे लोगो पर समय रहते लगाम लगायें।

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