ग्लोबल इन्वेस्टमेंट बैंक Jefferies ने 9 सितंबर को जारी अपनी रिपोर्ट में इसे “India’s New Industrial Revolution” यानी भारत की नई औद्योगिक क्रांति बताया है। रिपोर्ट के मुताबिक भारत के पास बड़ा घरेलू बाजार, बढ़ती निजी भागीदारी और लगातार मिलता सरकारी नीतिगत समर्थन है। यही तीन ताकतें स्पेस, सेमीकंडक्टर, डेटा सेंटर, इलेक्ट्रॉनिक्स, सोलर और एयरोस्पेस जैसे सेक्टरों को नई रफ्तार दे रही हैं। दरअसल, इस बदलाव की सबसे बड़ी खासियत यह है कि सरकार अब सिर्फ एक सेक्टर में निवेश नहीं कर रही, बल्कि अलग-अलग उद्योगों के लिए ऐसा इकोसिस्टम तैयार किया जा रहा है, जिसमें निजी कंपनियां उत्पादन बढ़ाएं, विदेशी कंपनियां भारत में निवेश करें और देश धीरे-धीरे आयात पर निर्भरता कम करके ग्लोबल सप्लायर बने।
आखिर क्या है नया Industrial Revolution ?
औद्योगिक क्रांति का मतलब सिर्फ नई फैक्ट्रियां लगना नहीं है। इसका मतलब है उत्पादन के तरीके, तकनीक, पूंजी और सप्लाई चेन में ऐसा बदलाव जो पूरी अर्थव्यवस्था की क्षमता बढ़ा दे। भारत में अभी कुछ ऐसा ही बदलाव दिखाई दे रहा है। सेमीकंडक्टर में चिप बनाने से लेकर स्पेस में प्राइवेट रॉकेट, डेटा सेंटर में AI की कंप्यूटिंग क्षमता, इलेक्ट्रॉनिक्स में कंपोनेंट मैन्युफैक्चरिंग, सोलर में पूरी वैल्यू चेन और एयरोस्पेस में ग्लोबल कंपनियों के लिए पार्ट्स बनाने तक भारत अपनी औद्योगिक क्षमता का विस्तार कर रहा है। और यही बदलाव विकसित भारत 2047 की बड़ी तस्वीर से जुड़ता है। जैफरीज की रिपोर्ट में बताया गया है कि कैसे भारत नई औद्योगिक क्रांति के विभिन्न क्षेत्रों में निवेश बढ़ाता जा रहा है।
1. Space: अब सिर्फ ISRO नहीं, Private Space Economy की उड़ान भी
भारत का स्पेस सेक्टर अब केवल ISRO के मिशनों तक सीमित नहीं है। Indian Space Policy 2023 ने पूरी स्पेस वैल्यू चेन में निजी कंपनियों के प्रवेश का रास्ता खोला है। सरकार के मुताबिक 2014 में भारत में सिर्फ एक स्पेस स्टार्टअप था, जबकि 2026 में यह संख्या 400 के पार पहुंच चुकी है। भारत की स्पेस इकोनॉमी करीब 8-9 अरब डॉलर से बढ़कर अगले वर्षों में 40-45 अरब डॉलर तक पहुंचने का लक्ष्य रखती है।
Jefferies के मुताबिक Skyroot, Pixxel और Agnikul जैसी कंपनियां अब प्रोटोटाइप से आगे बढ़कर कमर्शियल एग्जीक्यूशन की तरफ बढ़ रही हैं। यानी आने वाला स्पेस सेक्टर सिर्फ सरकारी मिशनों का हिस्सा नहीं, बल्कि एक बड़ा कारोबारी और औद्योगिक बाजार भी होगा।
2. Semiconductor: चिप के लिए दूसरे देशों पर निर्भरता कम करने की कोशिश
दुनिया की हर आधुनिक अर्थव्यवस्था की रीढ़ सेमीकंडक्टर है। मोबाइल, कार, AI सर्वर, रक्षा उपकरण और इलेक्ट्रॉनिक्स—लगभग हर आधुनिक उत्पाद में चिप की जरूरत होती है। Jefferies के मुताबिक भारत में सेमीकंडक्टर सेक्टर अब सिर्फ नीति और घोषणा के स्तर पर नहीं है, बल्कि execution phase में पहुंच चुका है। करीब 20 अरब डॉलर के निवेश, एक चिप फैब के निर्माण और कई OSAT यानी पैकेजिंग एवं टेस्टिंग परियोजनाओं के साथ भारत इस उद्योग की बुनियाद तैयार कर रहा है।
सरकार ने भी सेमीकंडक्टर फैब और OSAT सुविधाओं के लिए परियोजना लागत के 50% तक वित्तीय सहायता का प्रावधान किया है। यानी लक्ष्य सिर्फ चिप आयात कम करना नहीं, बल्कि भारत को वैश्विक चिप सप्लाई चेन का हिस्सा बनाना है।
3. Data Centres: AI की दौड़ में भारत का नया इंफ्रास्ट्रक्चर
AI जितना आगे बढ़ेगा, उतनी ही ज्यादा कंप्यूटिंग क्षमता और डेटा सेंटर की जरूरत होगी। यही वजह है कि डेटा सेंटर भारत की नई औद्योगिक कहानी का अहम हिस्सा बन गया है।
Jefferies के अनुसार पिछले पांच वर्षों में भारत की डाटा सेंटर करीब पांच गुना बढ़कर लगभग 2 GW हो गई है। अगले पांच वर्षों में इसके करीब 10 GW तक पहुंचने की उम्मीद है। इस विस्तार में लगभग 45 अरब डॉलर का निवेश का अनुमान है । इसका फायदा केवल डेटा सेंटर कंपनियों को नहीं मिलेगा, बल्कि पावर, कूलिंग, कंस्ट्रक्शन, रियल एस्टेट, नेटवर्क और इलेक्ट्रिकल इक्विपमेंट जैसे कई सेक्टरों को मिलेगा।
4. Electronics: Assembly से Components Manufacturing तक
भारत मोबाइल फोन बनाने में तेजी से आगे बढ़ा है, लेकिन अगली चुनौती सिर्फ फोन को सिर्फ अंसेबल करना नहीं , बल्कि उसके ज्यादा से ज्यादा हिस्से भारत में बनाना है। Jefferies का अनुमान है कि मोबाइल कंपोनेंट्स में भारत का वैल्यू एडीशन मौजूदा 20 प्रतिशत से कम छह वर्षों में बढ़कर करीब 50% हो सकती है। यानी अगला चरण असेंबली से कपोनेंट मैनूफैक्चरिंग की ओर बढ़ने का है।
5. Solar: Importer से Global Manufacturing Hub बनने की कोशिश
ग्रीन एनर्जी की वैश्विक दौड़ में सोलर मैन्युफैक्चरिंग भारत के लिए बड़ा अवसर है। Jefferies के मुताबिक भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा सोलर फोटोवोल्टिक मेनफैक्चरिंग बेस चुका है। इसमे से करीब 35 GW सेल कैपेसिटी चालू है, जबकि लगभग 100 GW अतिरिक्त क्षमता निर्माणाधीन है। रिपोर्ट का अनुमान है कि 2030 तक सोलर वैल्यू चेन का करीब 90% हिस्सा के निर्माण केवल देश में ही हो।
हालांकि यहां चुनौती भी बड़ी है। हाल की एक IEEFA रिपोर्ट ने बताया कि भारत में मोड्यूल कैपेसिटी तेजी से बढ़ी है, लेकिन अपस्ट्रीम यानी इंगोट वेफर और सेल मैनूफैक्चिरंग में अभी अंतर बना हुआ है। यानी अगली चुनौती सिर्फ ज्यादा सोलर पैनल बनाना नहीं, बल्कि पूरी सप्लाई चेन को भारत में खड़ा करना है।
6. Aerospace: दुनिया के विमानों की सप्लाई चेन में भारत
छठा बड़ा सेक्टर है एयरोस्पेस। दुनिया में विमानों की मांग बढ़ रही है और Boeing तथा Airbus जैसी कंपनियों को बड़ी सप्लाई चेन की जरूरत है। Jefferies के अनुसार भारत को कम लागत वाली मैन्युफैक्चरिंग और इंजीनियरिंग टैलेंट दोनो का फायदा मिल रहा है । रिपोर्ट के मुताबिक Boeing और Airbus पहले से भारत से हर साल करीब 1.4-1.6 अरब डॉलर का आयात करते हैं। भारतीय कंपनियां अब केवल छोटे पार्ट्स तक सीमित नहीं हैं, बल्कि ग्लोबल ओइएम कंपनियों की सप्लाई चेन में अपनी जगह बना रही हैं।































