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अरबी इस्लाम के मोह ने कैसे किया भारतीय मुस्लिमों को भारत से अलग

Abhinav Kumar द्वारा Abhinav Kumar
10 October 2019
in संस्कृति
वहाबी इस्लाम
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भारत में इस्लाम की शुरुआत 8वीं शताब्दी में हुई थी। भारत पर उम्मयद खलीफा ने डमस्‍कस में बलूचिस्‍तान और सिंध पर 711 ईसवी में मुहम्‍मद बिन कासिम के नेतृत्‍व में चढ़ाई कर इस्लामी आक्रमण की शुरुआत की थी। तभी से भारत की सनातन संस्कृति का इस्लाम से परिचय हुआ। इसके बाद लगातार हुए आक्रमणों के कारण भारत में इस्लाम रच बस गया। उत्तर-पश्चिम से आई सेनाओं ने भारत में ही डेरा डाल लिया और यहीं के हो गए। इन आक्रांताओं ने भारत के लोगों का जबरन धर्म परिवर्तन भी कराया। जिसके कारण भारत में मुस्लिम समुदाय की जनसंख्या बढ़ती गयी। आज इनकी आबादी 14 फीसदी है।

इस्लाम को इसके fundamentalism के लिए जाना जाता है लेकिन भारत में यह ब्रिटिश काल से ही अपने उदार रूप में आना शुरू हो चुका था। कारण था भारत की विविधताओं से भरी संस्कृति जो भारत के converted मुस्लिमों के अंदर अप्रत्यक्ष रूप से उन्हें उदार बना रही थी। रूढ़ीवाद से कोशों दूर मुस्लिम समुदाय के लोग खुशी-खुशी भारतीयता को अपनाकर जीवन व्यतीत कर रहे थे।

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जब देश का विभाजन हुआ तो भारत के कई भागों में दंगे हुए, लाखों लोग विस्थापित हुए लेकिन भारत के बार्डर इलाकों में यह अधिक हुआ। देश के अंदरूनी हिस्सों में किसी भी मुस्लिम को कोई फर्क नहीं पड़ा। हैरानी की बात तो यह है उस समय मुस्लिमों के नाम भी हिन्दू नाम ही हुआ करते थे।

उस दौर में दिल से सभी हिन्दू ही थे बस मजहब अलग था। वह अपने दिन भर के कार्यक्रम में सैकड़ों बार राम का नाम लेते थे और उन्हें इस्लाम का ‘इ’ भी नहीं पता था बस नाम के पीछे मियां लगा रहता था। उन्हें यह भी पता नहीं था कि वह मुस्लिम क्यों और कैसे हैं।

शारीरिक बनावट और परिधान से भी वह हिंदुओं से अलग नहीं थे तथा कोई फर्क नहीं निकाल सकता था। त्योहार भी तब बड़े धूम-धाम से मनाया जाता था चाहे वह ईद हो या दुर्गा पूजा। किसी को किसी से कोई परेशानी नहीं होती थी। सभी बस मिल कर एक-दूसरे के त्योहारों का आनंद उठाया करते थे।

भारतीय मुसलमान “अल्लाह हाफ़िज़” के बजाय “खुदा हाफ़िज़” कहना पसंद करते हैं, जो अरब देशों में अभिवादन का मानक है। अरब देशों में ‘रमदान मुबारक’ का प्रयोग किया जाता है जबकि भारतीय उपमहाद्वीप में रमजान का।

ऐतिहासिक रूप से भारतीय उपमहाद्वीप के ज्यादातर मुसलमान इस महीने को रमजान कहते आए हैं। फारसी भाषा से आया यह शब्द भारत में उर्दू से लेकर बांग्लाभाषी मुसलमानों तक समान रूप से प्रचलित रहा है। अब रमदान – जिसे मुसलमान अरबी शब्द कहते हैं, बोलने का चलन तेजी से बढ़ा है। इस बदलाव का शिकार सिर्फ ‘रमजान’ नहीं है। ‘खुदा’ जैसे शब्द जो सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों जैसे उर्दू शायरी का बेहद अहम शब्द रहा है, उसे भी अरबी नाम से बदला जा रहा है।

भारतीय उपमहाद्वीप में विदा लेते-देते समय ‘खुदा हाफिज’ सदियों से बोला जाता रहा है लेकिन, अब इसकी जगह ‘अल्लाह हाफिज’ का इस्तेमाल शुरू हो चुका है।

हालांकि अब वो पुराने समय का सौहार्द कट्टरता में परिवर्तित हो चुका है। आज के मुस्लिम दूर से ही अपने परिधान और अपने वेश-भूषा से पहचान में आ जाते हैं। बढ़ी हुई लंबी दाढ़ी और जालीदार टोपी से कोसों दूर से ही उनकी पहचान जाहीर हो जाती है। लंबे कुर्ते-पैजामे और अरबी अल्फाजों का चलन आजकल अपने चरम पर है। नई पीढ़ी आने से पहले ही इस्लाम अधिक रूढ़िवाद की ओर जा रहा है।

छोटे-छोटे बच्चे अब हलाल और हराम की बात करने लगे हैं। आखिर यह कैसे हुआ? कभी एक जमाने में मजून मियां कहे जाने वाले साहब आज मोहम्मद माजून रशीद कैसे बन गए?

इसका बस एक मात्र कारण हैं उदार इस्लाम से रूढ़ीवादी इस्लाम में परिवर्तन। लेकिन यह परिवर्तन कौन ला रहा है। इसका जवाब है भारतीय इस्लाम का अरबीकरण। भारतीय इस्लाम पर खुद अरब के इस्लाम में आए बदलाव का असर देखा जा रहा है। प्रथम विश्व युद्ध के बाद सऊद परिवार ने अरब खाड़ी के एक बड़े हिस्से पर कब्जा कर लिया था। यह परिवार इस्लाम की कट्टर विचारधारा – वहाबी का समर्थक है और इसकी वजह से सऊदी अरब में मुसलमान वहाबी धारा को सबसे ज्यादा मानते हैं। जैसे-जैसे पूरे विश्व में औद्योगीकरण बढ़ता गया, पेट्रोल-डीजल की मांग बढ़ती गई वैसे-वैसे सऊदी अरब और समृद्ध होता गया।

भारतीय उपमहाद्वीप के मुसलमानों का उच्च तबका इस समय इन अरबी शब्दों को अपनी सांस्कृतिक पहचान मानकर अपना रहा है। इसके जरिए वे आम मुसलमान नहीं बल्कि उस तरह के मुसलमान बन रहे हैं जो सऊदी अरब द्वारा प्रचारित हैं। भारत से लगभग 32 लाख मुस्लिम विदेश में प्रवास में रह रहे हैं। उनकी पहली पसंद अरब खाड़ी के देश होते हैं जहां वहाबी इस्लाम का ही बोलबाला है। वहीं 2010 के प्यू रिसर्च सेंटर के अनुमानों के अनुसार, भारत की अंतरराष्ट्रीय प्रवासी आबादी का एक बड़ा हिस्सा मुस्लिमों का होता है। भारतीय अंतर्राष्ट्रीय प्रवासी आबादी का अनुमानित 27% मुस्लिम था, जबकि भारत की कुल आबादी में मुस्लिमों की 14% आबादी है।

जब इतनी संख्या में भारत के मुस्लिम वहाबी इस्लाम मानने वाले अरब देशों में नौकरी के लिए जाते हैं तो इसका असर उनके रहन-सहन, खान-पान और पहनावा पर भी पड़ता है। एक सीधा-सादा भारतीय संस्कृति से जुड़ा मुस्लिम एक कट्टर रूढ़िवादी मुस्लिम में परिवर्तित हो कर वापस आता है। जब वह वापस आता है तो वह अरब देशों का शरिया कानून अपने घर परिवार और समाज में लागू करना शुरू कर देता है। इसका परिणाम यह होता है कि ऐसे लोगों की अगली पीढ़ी लगातार कट्टरता की ओर बढ़ जाती है। आमिर खान द्वारा निर्मित फिल्म सीक्रेट सुपरस्टार में इन्हीं मुद्दों को दर्शाया गया है। सउदी अरब में काम करने वाली इंसिया मलिक के पिता ने अपनी बेटी को संगीत का अभ्यास नहीं करने देते, क्योंकि यह इस्लाम के खिलाफ है।

ऐतिहासिक रूप से, इस्लाम को मानने वालों ने अपने नामकरण और पहनावे में भारतीय प्रथाओं का पालन किया। लेकिन, पिछले कुछ दशकों में, मुसलमान सूफी / बरेलवी जैसे भारतीय संस्करण से इस्लाम के सऊदी / वहाबी / देवबंदी / सलाफी संस्करण की ओर बढ़ रहे हैं। अब अरबी नाम, बुर्का का प्रचलन भारत में वहाबी इस्लाम की बढ़ती लोकप्रियता कट्टरवाद की ओर संकेत करता है। खाड़ी देशों का पैसा धीरे-धीरे भारत में इस्लाम का चेहरा बदल रहा है। पूरा चेहरा ढकना भारत में बहुत असामान्य था। लेकिन यह अब कई परिवारों में दैनिक जीवन का हिस्सा है जिनके सदस्य खाड़ी देशों में रहते हैं या रह रहे हैं। यह प्रवृत्ति उत्तर भारत तक ही सीमित नहीं है, केरल और तमिलनाडु जैसे राज्यों में भी यह देखा जा रहा है।

जैसे पश्चिमी देशों से आने वाले प्रवासी भारतीय भारत को रूढ़िवादी देश के रूप में देखते हैं और चाहते हैं कि समाज मॉडर्न और अधिक खुला हो। ठीक वैसे ही खाड़ी देशों से आने वाले मुसलमानों को लगता है कि भारतीय समाज ‘पश्चिमी मूल्यों’ पर बहुत खुला है, और महिलाओं को अनावश्यक स्वतंत्रता देता है अल्लाह के बताए रास्ते से भटक रहा है। खाड़ी देशों में कमाए गए रुपयों से अब यही लोग मदरसों को फंडिंग करते हैं, जो बच्चों को रूढ़िवादी इस्लामी मूल्य सिखाते हैं।

इसी का कारण है कि आज समाज में लोगों के बीच आपसी सौहार्द कम होता जा रहा है। आज अगर किसी त्योहार पर जुलूस भी निकलता है तो पत्थरबाजी देखने को मिलती है। यह भारत में बढ़ते वहाबी इस्लाम का ही प्रकोप है। देश की लिबरल मीडिया गैंग इन्हीं रूढ़िवादियों का बचाव करने पर उतारू है ताकि उन्हें अपना मसाला मिलता रहे और समाज को बाँट कर अपनी खिचड़ी पकाते रहें। साथ ही अरब देश भी भारतीय उपमहाद्वीप का वहाबीकरण कर अपना दबदबा बनना चाहते हैं ताकि वह इस्लामी देशों पर एकछ्त्र राज कर सकें। भारत के मुस्लिमों को यह समझना होगा कि कट्टरता से कभी भी समाज का भला नहीं हुआ है और अब उन्हें भी अपने भारतीय इतिहास और जुड़ाव को महसूस करना चाहिए ताकि आपसी प्रेम बढ़े और देश में शांति स्थापित हो।

Tags: अरबीकरणकट्टरवादभारतीय मुस्लिमवहाबी इस्लामसऊदी अरब
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