तुर्किये (Türkiye) और सऊदी अरब ने दो ऐतिहासिक समझौता ज्ञापनों (MoU) पर हस्ताक्षर किए हैं, जो मध्य पूर्व के भू-राजनीतिक और आर्थिक नक्शे को बदल सकते हैं। इन समझौतों के तहत सीरिया और जॉर्डन के रास्ते खाड़ी देशों को यूरोप से जोड़ने वाला एक विशाल रेलवे और लॉजिस्टिक्स कॉरिडोर विकसित किया जाएगा। यह मार्ग इज़राइल को पूरी तरह दरकिनार करेगा और अमेरिका समर्थित इंडिया-मिडिल ईस्ट-यूरोप इकोनॉमिक कॉरिडोर (IMEC) के लिए सीधी चुनौती माना जा रहा है।
इन समझौतों पर 9 जून 2026 को रियाद में सऊदी अरब के परिवहन एवं लॉजिस्टिक्स सेवा मंत्री सालेह अल-जासेर और तुर्किये के परिवहन एवं अवसंरचना मंत्री अब्दुलकादिर उरालोग्लू ने उच्च स्तरीय वार्ता के बाद हस्ताक्षर किए। पहला समझौता लॉजिस्टिक्स सेवाओं, संयुक्त लॉजिस्टिक्स केंद्रों के निर्माण और संचालन से जुड़ा है, जबकि दूसरा रेलवे तकनीक, बुनियादी ढांचे और तकनीकी ज्ञान के आदान-प्रदान पर केंद्रित है।
इतिहास से प्रेरित नई परियोजना
यह परियोजना केवल आधुनिक बुनियादी ढांचे का विकास नहीं है, बल्कि इतिहास को फिर से जीवित करने का प्रयास भी है। प्रस्तावित मार्ग उस ऐतिहासिक हिजाज़ रेलवे के रास्ते पर आधारित है, जिसे 20वीं सदी की शुरुआत में उस्मानी (ऑटोमन) साम्राज्य ने इस्तांबुल को मक्का और मदीना से जोड़ने के लिए बनाया था। प्रथम विश्व युद्ध के बाद यह रेलवे लगभग निष्क्रिय हो गई थी।
अब एक सदी बाद इस मार्ग को फिर से विकसित किया जा रहा है। प्रस्तावित रेल लाइन तुर्किये के मौजूदा रेल नेटवर्क से शुरू होकर सीरिया के अलेप्पो और दमिश्क से होते हुए जॉर्डन के अकाबा बंदरगाह तक जाएगी और वहां से सऊदी अरब में प्रवेश करेगी। मक्का, मदीना और भविष्य के मेगासिटी प्रोजेक्ट NEOM को भी इस नेटवर्क का हिस्सा बनाने की योजना है। दीर्घकालिक लक्ष्य इस रेलमार्ग को ओमान तक विस्तारित करना है, जिससे होर्मुज जलडमरूमध्य पर निर्भरता कम हो सके।
कई महीनों की कूटनीतिक तैयारी
यह समझौता कई महीनों की कूटनीतिक कोशिशों का परिणाम है। अप्रैल 2026 में तुर्किये, सीरिया और जॉर्डन ने अम्मान में एक त्रिपक्षीय परिवहन समझौते पर हस्ताक्षर किए थे, जिसके तहत अगले चार से पांच वर्षों में सीमा-पार परिवहन ढांचे का पुनर्निर्माण करने पर सहमति बनी थी। इसका उद्देश्य सीरिया में वर्षों के संघर्ष के दौरान क्षतिग्रस्त रेल और सड़क नेटवर्क को फिर से विकसित करना है।
तुर्किये ने इस दिशा में काम भी शुरू कर दिया है। सीरिया सीमा के निकट लगभग 15 वर्षों से बंद पड़े रेलमार्गों की बहाली का कार्य चल रहा है। इसके अलावा, तुर्किये के परिवहन मंत्री उरालोग्लू ने बताया कि तुर्किये से इराक होते हुए सऊदी अरब तक दो परीक्षण मालवाहक यात्राएं सफल रही हैं, जिससे इस परियोजना को और गति मिली है।
सऊदी अरब के आधिकारिक रूप से शामिल होने के बाद यह पहल अब केवल क्षेत्रीय परियोजना नहीं रही, बल्कि दक्षिणी यूरोप से लेकर अरब प्रायद्वीप तक फैले एक अंतरमहाद्वीपीय लॉजिस्टिक्स कॉरिडोर का स्वरूप ले रही है।
रणनीतिक महत्व
इस परियोजना का महत्व केवल व्यापार तक सीमित नहीं है। वर्तमान में होर्मुज जलडमरूमध्य, जहां से दुनिया के लगभग 20 प्रतिशत तेल की आपूर्ति गुजरती है, क्षेत्रीय तनावों के कारण प्रभावित है। वहीं लाल सागर भी सुरक्षा चुनौतियों का सामना कर रहा है। ऐसे में इन समुद्री मार्गों को दरकिनार करने वाला एक सुरक्षित स्थलीय कॉरिडोर रणनीतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
तुर्किये के परिवहन मंत्री उरालोग्लू ने कहा कि वर्तमान संवेदनशील परिस्थितियों में व्यापार और लॉजिस्टिक्स श्रृंखला का बिना रुकावट संचालन पहले से कहीं अधिक आवश्यक हो गया है। तुर्किये स्वयं को खाड़ी देशों और यूरोप के बीच एक प्रमुख ट्रांजिट हब के रूप में स्थापित करना चाहता है।
IMEC के लिए चुनौती
इस परियोजना के राजनीतिक प्रभाव भी काफी महत्वपूर्ण हैं। तुर्किये ने स्पष्ट संकेत दिया है कि यह रेलवे इज़राइल के क्षेत्रीय प्रभाव को कम कर सकती है। कई विश्लेषकों ने इसे इज़राइल की सबसे महत्वपूर्ण आर्थिक परियोजनाओं में से एक IMEC के लिए बड़ा झटका बताया है।
IMEC की घोषणा 2023 में नई दिल्ली में आयोजित G20 शिखर सम्मेलन के दौरान की गई थी। इसका उद्देश्य भारत को संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब, जॉर्डन और इज़राइल के हाइफ़ा बंदरगाह के माध्यम से यूरोप से जोड़ना था।
हालांकि, 7 अक्टूबर 2023 को हमास के हमलों और उसके बाद गाज़ा युद्ध के कारण इस परियोजना की गति लगभग रुक गई। IMEC के लिए सऊदी अरब और इज़राइल के बीच संबंधों का सामान्यीकरण आवश्यक माना जाता था, लेकिन 2026 के एक सर्वेक्षण के अनुसार 99 प्रतिशत सऊदी नागरिक इज़राइल के साथ सामान्य संबंधों के विरोध में हैं, जिससे इस परियोजना की संभावनाएं काफी कमजोर हो गई हैं।
इसके अलावा, Atlantic Council के अनुसार IMEC को न्यूनतम स्तर पर चालू करने के लिए लगभग 5 अरब डॉलर की अतिरिक्त वित्तीय आवश्यकता है, जिसका अधिकांश हिस्सा जॉर्डन, इज़राइल और प्रस्तावित लॉजिस्टिक्स हब से जुड़ा है।
वहीं Foundation for Defense of Democracies के विश्लेषकों का कहना है कि तुर्किये के मॉडल की सबसे बड़ी ताकत यह है कि यह इज़राइल जैसे राजनीतिक रूप से संवेदनशील ट्रांजिट मार्ग पर निर्भर नहीं है।
सीरिया की वापसी
इस परियोजना का एक महत्वपूर्ण लेकिन कम चर्चित पहलू सीरिया की संभावित आर्थिक वापसी भी है। लंबे समय तक अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों और गृहयुद्ध से प्रभावित रहने के बाद अब सीरिया को क्षेत्रीय व्यापार नेटवर्क का महत्वपूर्ण केंद्र बनाने की दिशा में प्रयास हो रहे हैं।
रिपोर्टों के अनुसार सऊदी अरब सीरिया के युद्धग्रस्त बुनियादी ढांचे के पुनर्निर्माण में अरबों डॉलर का निवेश करने पर विचार कर रहा है, बशर्ते कि सीरिया इस नए व्यापारिक नेटवर्क का प्रमुख केंद्र बने। यदि ऐसा होता है, तो यह गृहयुद्ध के बाद सीरिया की सबसे बड़ी आर्थिक पुनर्स्थापना होगी।
बदलता हुआ क्षेत्रीय शक्ति संतुलन
यह रेलवे समझौता केवल एक परिवहन परियोजना नहीं, बल्कि मध्य पूर्व में बदलते शक्ति संतुलन का संकेत भी है। IMEC से बाहर रहने के बाद तुर्किये ने पिछले दो वर्षों में एक वैकल्पिक व्यापारिक ढांचा तैयार करने की दिशा में लगातार काम किया है, जिसका केंद्र अंकारा होगा, न कि तेल अवीव या वाशिंगटन।
सऊदी अरब द्वारा इस दृष्टिकोण का समर्थन करना यह दर्शाता है कि वह अपनी रणनीतिक साझेदारियों में विविधता लाना चाहता है और ऐसे व्यापारिक मार्ग विकसित करना चाहता है जो राजनीतिक और समुद्री जोखिमों से कम प्रभावित हों।
हालांकि इस परियोजना के सामने क्षतिग्रस्त बुनियादी ढांचा, जटिल कूटनीति और वित्तीय चुनौतियां जैसी कई बाधाएं मौजूद हैं, लेकिन एक रणनीतिक घोषणा के रूप में तुर्किये और सऊदी अरब ने मध्य पूर्व के मानचित्र पर एक नई रेखा खींच दी है—और यह रेखा इज़राइल से होकर नहीं गुजरती।


































