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भाजपा ने मुस्लिम वोटबैंक विपक्ष के लिए छोड़ दिया, अब उसके लिए विपक्ष में भयंकर घमासान मच चुका है

वाह! PM मोदी और गृह मंत्री अमित शाह, क्या चाल चली है

Abhinav Kumar द्वारा Abhinav Kumar
18 January 2020
in समीक्षा
भाजपा ने मुस्लिम वोटबैंक विपक्ष के लिए छोड़ दिया, अब उसके लिए विपक्ष में भयंकर घमासान मच चुका है

(PC: YouTube)

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कुछ दिनों पहले कांग्रेस ने CAA के विरोध में विपक्षी पार्टियों की मीटिंग बुलाई थी लेकिन अधिकतर पार्टियों ने इस मीटिंग से दूर रहने का निर्णय लिया। इन पार्टियों में TMC, DMK और SP शामिल थीं। हालांकि ऐसा नहीं था कि ये विपक्षी पार्टियां CAA का विरोध नहीं कर रहीं या इस पर अपनी प्रतिक्रिया नहीं दे रहीं। लेकिन, इन सभी ने कांग्रेस द्वारा बुलाई बैठक में भाग नहीं लिया। इससे दो बातें स्पष्ट होती हैं। पहली यह कि विपक्ष एकजुट नहीं है और दूसरी यह कि कांग्रेस पर अन्य विपक्षी पार्टियों को भरोसा नहीं है। इससे कांग्रेस की अक्षमता भी झलकती है कि वह विपक्षी पार्टियों को किसी भी मुद्दे पर एकजुट नहीं कर पा रही है।इससे यह भी साबित होता है कि अन्य पार्टियां जितनी नफरत भाजपा से करती हैं, उतनी ही नफरत या उससे भी अधिक नफरत कांग्रेस से करती हैं। कांग्रेस का नेतृत्व उन्हें स्वीकार नहीं है। इसका एक कारण है, और वह है इन सभी पार्टियों का और कांग्रेस का एक समान वोट बैंक होना।

आइये देखते है कैसे कांग्रेस इन सभी क्षेत्रीय पार्टियों के वोट बैंक के बीच में आ रही है।

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सबसे पहले बात करते है पश्चिम बंगाल की। इस राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने CAA का जमकर विरोध किया। सिर्फ विरोध ही नहीं बल्कि उन्होंने स्वयं अपने राज्य में कई रैलियों का भी आयोजन किया। लेकिन, कांग्रेस की बुलाई बैठक में भाग नहीं लिया। इसके पीछे का कारण है मुस्लिम वोट बैंक। पश्चिम बंगाल में लगभग 30 प्रतिशत मतदाता मुस्लिम समुदाय के हैं और ममता बनर्जी द्वारा तुष्टीकरण कर अपने पक्ष में करने से पहले, इस समुदाय ने पारंपरिक रूप से कांग्रेस को ही वोट दिया था। 1990 के दशक में कांग्रेस के साथ रही ममता बनर्जी के पार्टी से अलग हो जाने के कारण पश्चिम बंगाल से कांग्रेस भी लगभग समाप्त हो चुकी है। इसी के कारण जो लोग कांग्रेस को वोट करते थे, अब वे ही ममता बनर्जी को वोट करते हैं। इस तरह से CAA के विरोध पर ममता बनर्जी यह नहीं चाहती कि उनका वोट बैंक बंटे और कांग्रेस को इसका फायदा हो। वह जानती हैं कि वर्ष 2021 में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं और वे अपना नुकसान नहीं करवाना चाहती हैं।

अब बात करते हैं उत्तर प्रदेश की। इस राज्य से सपा और बसपा दोनों ही बैठक में शामिल नहीं हुए। बता दें कि पिछले कुछ महीनों में, प्रियंका गांधी राज्य में अति-सक्रिय रही हैं, खासकर मुस्लिम समुदाय के बीच। यह बात सभी को पता है कि यूपी में सभी प्रमुख विपक्षी दल: सपा हो या बसपा या फिर कांग्रेस, सभी की नजर मुस्लिम वोटों पर है। इस समुदाय ने परंपरागत रूप से कांग्रेस को ही वोट दिया है, लेकिन 1990 और 2000 के दशक में यही वोट बैंक SP के हाथों चला गया। इस राज्य की कई सीटों पर यह भी देखा गया है कि मुसलमानों ने रणनीतिक रूप से भाजपा को हराने के लिए वोट किया है, विपक्ष में चाहे कोई भी पार्टी रहे सपा या कांग्रेस, उन क्षेत्रों में इन्हीं पार्टियों को वोट मिला है।

विरोधियों ने जिस तरह से CAA को मुस्लिम विरोधी होने का झूठ फैलाया है, उसका एक ही कारण है और वह है मुस्लिम समुदाय का वोट बैंक अपनी तरफ करना। इन तीनों ही पार्टियों में यह माना जा रहा है कि, जो भी पार्टी CAA की सबसे कट्टर विरोधी के रूप में सामने आएगी, मुस्लिम समुदाय का वोट उनके पास जाएगा। अगर सपा और बसपा कांग्रेस के नेतृत्व वाली बैठक में शामिल होती, तो कांग्रेस को ही मुस्लिम समुदाय अपना शुभचिंतक मान लेता और SP और BSP के हाथ से एक बड़ा वोट बैंक निकल जाता। प्रियंका गांधी की सक्रियता को देखते हुए, कांग्रेस को राजनीतिक स्थान देना सपा और बसपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती साबित होता।

चुनावी समीकरणों की बात करें तो यूपी में एक तरफ जहां बीजेपी को सवर्णों का साथ मिला; वहीं गैर-यादव ओबीसी और गैर-जाटव SC ने भी बड़ी संख्या में भाजपा को वोट दिया है। इस वजह से कांग्रेस पार्टी सपा और बसपा के वोट बैंक (मुस्लिम, यादव, जाटव) को अपने पक्ष में लेने की कोशिश कर रही है ,जो आमतौर पर भाजपा को वोट नहीं देते।

यहाँ यह जानना जरूरी है कि भाजपा के उदय से पहले AITC, SP, BSP, और DMK जैसे क्षेत्रीय दल ही मुख्य रूप से कांग्रेस को चुनौती देते थे। इसमें से अधिकतर बड़े नेताओं ने तो कांग्रेस से ही अलग हो कर अपनी पार्टी को खड़ा किया है, इसलिए फिर से कांग्रेस के नेतृत्व में एक मंच पर खड़ा होना उनका अंतिम विकल्प ही होगा।

इनमें से सभी पार्टियां एक ही वोट बैंक के लिए ही चुनाव में उतरती हैं इसलिए कांग्रेस के नेतृत्व में उतर कर, कोई भी पार्टी अपने पाँव पर कुल्हाड़ी नहीं मारना चाहेगी।

अगर थोड़ा दक्षिण की ओर देखें तो शिवसेना और DMK, दोनों ही क्रमशः महाराष्ट्र और तमिलनाडु में कांग्रेस के सहयोगी दल हैं, लेकिन इन्होंने भी कांग्रेस द्वारा आयोजित CAA विरोधी बैठक में भाग नहीं लिया। शिवसेना ने तो यह स्पष्ट कर दिया कि, उसका कांग्रेस के साथ गठबंधन महाराष्ट्र तक ही सीमित है। उसे पता है कि अगर वह CAA के विरोध में हो रही इस बैठक में भाग लेगी, उसके बाद जो भी हिंदुत्व पर उसका दावा है, वह भी चला जाएगा। जहां तक बात DMK की है, तो उसकी भी कांग्रेस के साथ स्थानिय चुनाव में सीट बँटवारे को लेकर खींचतान चल रही है। वहाँ भी दोनों पार्टियों का वोट बैंक एक समान ही है, और कांग्रेस को अधिक महत्व देने के कारण DMK का अपना वोट बैंक खत्म हो जाएगा। इस तरह से देखे तो कहीं से भी कांग्रेस को किसी पार्टी का साथ मिलने की उम्मीद नहीं है और इसका कारण कांग्रेस का वोट बैंक क्षेत्रीय पार्टियों तक सिमट कर रह जाना है।

नरेंद्र मोदी और अमित शाह के नेतृत्व में भाजपा ने वर्षों से चली आ रही जातिगत और धर्मगत राजनीति को तहस-नहस कर दिया है, और यह सुनिश्चित किया है कि विपक्ष चाहे तो मुस्लिम वोट बैंक का तुस्टिकरण कर अपने पक्ष में लेने की पूरी कोशिश कर सकता है। इसी वोट बैंक को अपने पक्ष में करने के ले लिए कोई भी पार्टी कांग्रेस के नेतृत्व या कांग्रेस के साथ आना ही नहीं चाहती है, और इस तरह से देश में विपक्षी पार्टियों की एकजुटता महज़ एक सपना बनकर रह गया है।   

 

Tags: CAAउत्तर प्रदेशकांग्रेसप्रियंका गांधीममता बनर्जीमुस्लिम वोटबैंकमुस्लिम समुदाय
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