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चीन एक शानदार देश है, जिसपर CCP ने कब्जा किया हुआ है, चीन को इस बुरी शक्ति से जल्द ही आज़ादी चाहिए

चीन और CCP में फर्क समझिए!

Abhinav Kumar द्वारा Abhinav Kumar
16 September 2020
in इतिहास
चीन
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आज चीन का नाम सुन कर सबसे पहला ख्याल एक ऐसे देश की छवि उभरती है जो किसी गली के गुंडे की तरह बर्ताव करता है और लोगों से गुंडई दिखा कर उनके सामानों को हड़पने की सोच रखता है। परन्तु चीन ऐतिहासिक रूप से ऐसा नहीं था। ना तो वह किसी अन्य देश पर गुंडई दिखाता था और ना ही किसी देश की जमीन हड़पता था। यह कारनामा या परिवर्तन जो भी कह ले, कम्युनिस्ट पार्टी यानी CCP की है। CCP सूट-बुट पहने उन अतांकियों का संगठन है जिसने चीन जैसे सुंदर देश पर कब्ज़ा जमाया हुआ है, ठीक उसी प्रकार जैसे तालिबान ने अफगानिस्तान पर कब्जा किया था। बस अंतर इतना है कि CCP वर्ष 1949 से सत्ता में रहने के बाद अब इतनी ताकतवर हो चुकी है और सभी देशों में अपने प्रोपोगेंडा तंत्र को मजबूत कर चुकी है कि कोई उसका विरोध नहीं करना चाहता।

इतिहास पलट कर देखें तो यह स्पष्ट पता चलेगा कि प्राचीन चीन के सांस्कृतिक तत्व दुनिया भर में फैले हैं। तब यह देश दुनिया की सबसे प्रमुख सांस्कृतिक शक्तियों में से एक था। भारत के साथ चीन के संबंध सिर्फ सांस्कृतिक ही नहीं बल्कि आर्थिक भी थे। सिल्क रोड के माध्यम से दोनों देशों के बीच व्यापार दुनिया भर में प्रसिद्ध था। बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार से दोनों देशों के सांस्कृतिक मेलजोल को समझा जा सकता है। चीन के कई यात्री भारत यात्रा पर आए और भारत के बारे में विस्तार से लिखा। चाहे वो चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के राज में Fa-Hien की भारत यात्रा हो या हर्षवर्धन के राज में Hiuen-Tsang की यात्रा। सभी ने सांस्कृतिक आदान-प्रदान के लिए भारत की यात्रा की।

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कुछ अन्य उदाहरण में Xuanzang (b 604) और Ching (635–713), दोनों बिहार के नालंदा विश्वविद्यालय में छात्र थे।  Xuanzang ने पश्चिमी क्षेत्रों पर The Great Tang Records लिखा, जो भारत की उनकी यात्रा आधारित है।

वहीं वर्ष 1405 और 1433 के बीच, मिंग राजवंश चीन ने एडमिरल झेंग हे के नेतृत्व में सात नौसैनिक अभियानों की एक श्रृंखला प्रायोजित की थी। झेंग ने भारत, बंगाल, और सीलोन(श्रीलंका), फारस की खाड़ी, अरब सहित कई भारतीय राज्यों और बंदरगाहों का दौरा किया था। इसी तरह से भारत और चीन की संस्कृति के बीच एक दूसरे से सांस्कृतिक आदान प्रदान 18वीं शताब्दी तक निरंतर चलती रही।

इतिहास देखा जाए तो यह समझना मुश्किल नहीं है कि पश्चिमी देशों का उत्थान लगभग 1700 AD के बाद आए Industrial Revolution से ही शुरू हुआ। उससे पहले तो पश्चिम के देश एशियाई देशों की बराबरी का सोच भी नहीं सकते थे। तब भारत और चीन इस क्षेत्र में अपनी बुलंदी को पार कर चुके थे। 

परंतु उसके बाद पश्चिमी देशों ने पूरे एशिया को अपने कब्जे में कर लिया और ऐसा आतंक मचाया कि इन देशों में खाने के लाले पड़ गए। उसी दौरान एक और बीमारी का जन्म हुआ जिसे आज हम साम्यवाद या कम्युनिज्म कहते हैं। रूस में इस बीमारी ने सबसे पहले आतंक मचाया और फिर वहां से कई देशों में फैला जिसमें चीन सबसे प्रमुख था। चीन के कुछ शिक्षाविद् कम्युनिज्म से प्रभावित हो कर उसे चीन ले गए और चीन की कम्युनिस्ट पार्टी का गठन किया। तब से लेकर आज तक इस बीमारी ने चीन जैसे शांत देश को किसी गली के कुत्ते की तरह बना दिया है।

CCP की स्थापना वर्ष 1921 में Chen Duxiu and Li Dazhao द्वारा की गई थी। यह पार्टी तेज़ी से बढ़ी और 1949 तक इसने चीनी गृहयुद्ध के बाद कुओमितांग (KMT) की राष्ट्रवादी सरकार को मुख्य भूमि चीन से ताइवान खदेड़ कर चीन पर कब्जा जमा लिया, जिसके बाद 1 अक्टूबर 1949 को “पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ़ चाइना” की स्थापना हुई।

यहीं से चीन की किस्मत बदलनी शुरू हुई और यह स्वतंत्र विचारो वाला देश CCP की चंगुल में फंसता चला गया कि आज तक बाहर नहीं निकल पाया है।

CCP ने देश को नियंत्रित कर धीरे-धीरे सभी संस्थाओं जैसे सशस्त्र बल पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) मीडिया, व्यापार यहां तक कि जनता के आम जीवन को भी अपने नियंत्रण में कर लिया। आज हालात यह कि ना तो चीनियों को किसी प्रकार की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है और ना ही कोई विकल्प।

आधुनिक चीन की नींव रखने वाले Mao Zedong के हाथ अपने ही लोगों के खून से रंगे थे। चीन को नई ऊंचाई तक पहुंचाने के लिए माओ ने एक नया आर्थिक मॉडल अपनाया और विकास का नारा दिया जिसमें करोड़ों चीनियों की जान की भी कोई कीमत नहीं थी। माओ की सनक ने 4.5 करोड़ लोगों की जान ली इसके बाद फिर से 10 साल बाद माओ ने सांस्कृतिक क्रांति का नारा दिया और फिर 3 करोड़ लोगों की जान ली।

CCP के इस सांस्कृतिक क्रांति ने जनता को उस ऐतिहासिक चीन की सांस्कृतिक जड़ों से ही काट दिया जिसके आधार इस देश की नींव पड़ी थी। उसके बाद ना तो वहां की ऐतिहासिकता बची और ना ही भविष्य की पीढ़ियों को पढ़ाने के लिए ऐतिहासिक संस्कृति बची।

सांस्कृतिक क्रांति के दौरान बड़ी संख्या में सांस्कृतिक खजानों को नष्ट कर दिया गया था और कई कला और शिल्प के अभ्यास को प्रतिबंधित कर दिया गया था। ना सिर्फ मंदिरों और पूजा स्थलों को नष्ट किया गया बल्कि लेखकों और शिल्पकारों को भी या तो मार दिया गया या फिर सार्वजनिक रूप से उन्हें दंड दिया गया। ये वही समय था जब CCP ने चीन की ऐतिहासिकता को मिटा कर उसे माओवाद के लाल रंग से लिख दिया।

संस्कृति को मिटाना ही नहीं बल्कि माओ ने तो गौरैयों को भी मारना शुरू कर दिया था। जब माओ चीन की सत्ता संभाल रहे थे तब उन्होंने एक अभियान शुरू किया था, जिसे ‘फोर पेस्ट कैंपेन’ के नाम से जाना जाता है।

 

यह वर्ष 1958 से लेकर वर्ष 1962 तक चले चीन के Great Leap Forward के दौरान चला था। माओ जेडोंग के नेतृत्व में चली इस मुहिम के तहत मच्छर, मक्खी, चूहा और प्यारी मासूम गौरैया को मारने का लक्ष्य रखा गया था। तब लोगों में यह धारणा बनाई गयी थी कि इन चार जीवों से ही मनुष्यों में बीमारी फैलती है, और गौरैया अनाज खा कर नुकसान ही करती है इसीलिए इनका खात्मा बेहद आवश्यक है।

 

इस कारण से चीन में पर्यावरण का इकोलॉजिकल चक्र बिगड़ गया और चीन में एक भयानक अकाल पड़ा और देखते ही देखते करोड़ों लोग भूखमरी से मारे गए। चीनी सरकार के आंकड़ों के मुताबिक, करीब 15 मिलियन यानी 1.50 करोड़ लोगों की मौत भूखमरी से हुई थी। हालांकि, कुछ अन्य रिपोर्ट्स के मुताबिक, 45 मिलियन यानी 4.50 करोड़ लोग भूखमरी की वजह से मारे गए थे। यह चीन के इतिहास की सबसे बड़ी त्रासदियों में से एक थी। 

सिर्फ इतना ही नहीं, भूख के मारे लोगों ने खाने के लिए एक दूसरे की हत्या तक करनी शुरू कर दी थी। जब चीन की सरकार अन्न से लोगों का पेट भरने में असफल होने लगी, तो लोगों को जनजीवों और जानवरों को खाने के लिए प्रेरित किया गया।

चीन के अंदर इस भुखमरी ने लोगो को जागृत किया जिससे धीरे-धीरे CCP के खिलाफ माहौल बनना शुरू हुआ।

हालांकि, यह माहौल अभी बन ही रहा था कि चीन के अंदर वर्ष 1989 में तियानमेन चौक पर चीनी सरकार के खिलाफ प्रदर्शन हुआ और छात्र सड़कों पर उतरे। तब चीन में CCP की सरकार ने उस दौरान आंदोलन को टैंकों से ऐसे कुचला जैसे फसल के बुआई से पहले खेतों को समतल कर खर-पतवार को कुचल दिया जाता है। यही नहीं, ऐसे सरकार विरोधी घटनाओं को भविष्य में रोकने के लिए चीनी सरकार ने “Patriotic Education Campaign” चलाया। इस कैम्पेन के तहत चीन की शिक्षा प्रणाली में अमूल-चूल परिवर्तन किया गया परंतु इसी परिवर्तन ने चीन की अगली पीढ़ी में राष्ट्रवाद की ऐसी भावना पैदा की कि आज यह देश सीसीपी के इशारों पर नाचने लगा है। यह कैंपेन कुछ और नहीं बल्कि भविष्य के लिए चीनी युवाओं का ब्रेन वाश की प्लैनिंग थी जिससे CCP को देश के अंदर से चुनौती ना मिले। इस कैंपेन के तहत ऐसा इतिहास पढ़ाया गया कि चीनी युवाओं को यह विश्वास हो गया कि पश्चिमी सभ्यता उन्हें नुकसान पहुंचाना चाहती है और CCP उन्हें बचा रही है। इसी तरह ब्रेनवाश कर चीन के लोगों की स्वतंत्रता छीन ली गई और उन्हें मानसिक तौर पर CCP का गुलाम बना लिया गया।

CCP ने उस दौरान सिर्फ अपने देश की जनता को गुलाम ही नहीं बनाया बल्कि वैश्विक ताकत बनने की प्रक्रिया भी शुरू की।

उसी समय चीन के सर्वेसर्वा नेता डांग श्याओपिंग। उन्होंने चीन को आर्थिक ताकत बनाने के लिए वर्ष 1978 में आर्थिक क्रांति की शुरुआत की थी। इन्हीं सुधारों की शुरुआत होने से चीन भविष्य में विकास दर में वृद्धि के लिए आधार तैयार किया और आज विश्व की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है।

1979 से 2010 तक, चीन (China) की औसत वार्षिक जीडीपी वृद्धि दर 9.91% थी, जो 1984 में 15.2% के ऐतिहासिक उच्च स्तर पर पहुंच गई थी। 1990 में विश्व अर्थव्यवस्था में चीन की अर्थव्यवस्था की हिस्सेदारी 2 प्रतिशत से भी कम थी जोकि 2018 में बढ़कर 18.69 प्रतिशत हो गयी। 

 

यह आर्थिक बढ़त चीन को ताकतवर नहीं बना रही थी बल्कि CCP को ताकतवर बना रही थी। इसी ताकत के आधार पर चीन ने दुनिया को अपने उपर आश्रित करना शुरू किया और अपनी सैन्य ताकतों को भयंकर तरीके से बढ़ाना शुरू किया। अगर 1949 से पहले देखा जाए तो चीन ने कभी आक्रामकता नहीं दिखाई लेकिन CCP द्वारा चीन पर कब्जा जमाए जाने के बाद 1950 में कोरिया पर हमला कर अपने आक्रामकता की शुरुआत की इसके बाद 1962 में भारत, 1969 में रूस के साथ, 1979 में वियतनाम के साथ युद्ध कर अपने क्षेत्रों का विस्तार करना शुरू किया।

आज CCP अपनी ताकतों को परमाणु और समुद्री ताकतों से परिपूर्ण कर चुका है और BRI के तहत कई देशों को अपने ऋण जाल में फंसा चुका है। आज के दौर में चीन की कम्युनिस्ट पार्टी उसी तरह की विस्तारवादी पार्टी बन चुकी है जिस तरह ईस्ट इंडिया कंपनी 18वीं और 19वीं सदी थी बस अंतर यह है कि CCP के पास पूरा का पूरा एक देश उनके कब्जे में है।

चीन की आज जो भी हालत है उसके लिए वहां की जनता नहीं बल्कि CCP जिम्मेदार है। चीन के लोग मेहनत करते हैं लेकिन सबसे अधिक शोषण उन्हीं का किया जाता है। इसीलिए उन्हें ही अपने देश को और एशिया को बचाने के लिए क्रांति की शुरुआत करनी होगी, जिसका सिर्फ और सिर्फ एक ही मकसद होगा और वह मकसद होगा चीन में लोकतन्त्र की स्थापना करना। लोकतान्त्रिक रूप से चुना गया एक नेता किसी भी स्थिति में अधिक जिम्मेदार होता है। उदाहरण के लिए ताइवान को ही देखा जा सकता है। जब तक चीन में कम्युनिस्ट पार्टी की सत्ता है, तब तक माओ और शी जिनपिंग जैसे नेता खड़े होते रहेंगे और चीन कभी भी CCP के चंगुल से बाहर नहीं निकल सकेगा।

 

Tags: CCPचीन
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2 October 2026

वो कहते हैं “दुर्घटना से देर भली”। आज भारत की आक्रामकता से कोई भी अनभिज्ञ नहीं है। परंतु स्वतंत्रता के पश्चात प्रारम्भिक दो दशकों में...

22 मार्च को भगत सिंह ने अपने साथियों को पत्र लिखा था
इतिहास

‘मैं एक शर्त पर ज़िंदा रह सकता हूं…’: अपने आखिरी पत्र में भगत सिंह ने साथियों से क्या कहा?

28 September 2026

भारत के स्वतंत्रता संग्राम के नायकों की चर्चा भगत सिंह का नाम लिए बगैर हमेशा अधूरी ही मानी जाएगी। भगत सिंह का योगदान इतिहास के...

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