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मोपला नरसंहार: क्या हुआ जब मालाबार के हिंदू अपनी ज़मीन लेने वापस पहुँचे

भाग-2

Animesh Pandey द्वारा Animesh Pandey
14 September 2021
in इतिहास
मोपला नरसंहार: कैसे टीपू सुल्तान और उसके पिता हैदर अली ने मोपला नरसंहार के बीज बोए थे
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केरल के मालाबार में हुए नरसंहार की कोरी कल्पना भी रोम-रोम में भय का संचार करती है। ये नरसंहार हत्या का वो तांडव था जिससे मनुष्य की अंतरात्मा तक कांप उठे। पिछले संस्करण में हम इस बात से अवगत हुए थे कि कैसे मोपला नरसंहार की नींव मैसूर के सल्तनत में पड़ी थी, जब हैदर अली और उसके बेटे फतेह अली अथवा टीपू सुल्तान के बर्बर और निरंकुश शासन के कारण मोपिलाह मुस्लिमों और उनके अत्याचारों को बढ़ावा मिला। परंतु ऐसा भी नहीं था कि हमारी मातृभूमि वीरों से वंचित रही थी। टीपू सुल्तान के निरंकुश शासन के विरुद्ध जनविद्रोह स्वाभाविक था, और वह हुआ भी।

आज के अंक में आपका परिचय इस तथ्य से होगा कि कैसे मलाबार पर अंग्रेजों के शासन में सनातन धर्म के अनुयाइयों ने हैदर अली और टीपू सुल्तान के शासन में जो खोया था, उसे पुनः प्राप्त तो किया, परंतु हैदर और टीपू के अत्याचारों के कारण मुस्लिमों और हिंदुओं में जो कड़वाहट उत्पन्न हुई थी, उससे ऐसी खाई उत्पन्न हुई जो फिर कभी नहीं पाटी जा सकी। हम ये जानेंगे कि आखिर ऐसे क्या कारण थे कि निरंकुश शासकों का सफल विद्रोह करके भी हम मोपला जैसे नृशंस नरसंहार नहीं रोक पाए। इस संस्करण में हम उन तथ्यों से परिचित होंगे कि कैसे हमारे पूर्वजों ने टीपू सुल्तान के निरंकुश शासन से विद्रोह कर अपना सम्मान और अपना यश मालाबार में पुनः प्राप्त तो किया, परंतु उस संस्कृति की रक्षा करने के लिए वे एक सशक्त व्यवस्था की रचना नहीं कर पाए।

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जैसा हमने पिछले अंक में आपको बताया था, मोपला दंगों के पीछे मैसूर के अंतिम इस्लामिक शासक, सुल्तान फतेह अली खान अर्थात टीपू सुल्तान और उसके पिता, हैदर अली की महत्वपूर्ण भूमिका थी। केरल में इस्लामी क्रूरताओं के साथ मैसूर सुल्तानों के आगमन से पहले मप्पिलाओं ने अपने हिंदू राजाओं की अवज्ञा करने की हिम्मत तक नहीं की थी, परंतु हैदर अली और टीपू सुल्तान के साथ हाथ मिलाने के बाद, उन्होंने हिंदू आबादी के विरुद्ध इस्लामी अत्याचारों में न केवल उनकी सहायता की अपितु उस हिन्दू विरोधी मानसिकता को अपनाया भी।

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हैदर अली तो हैदर अली, उसके पुत्र टीपू सुल्तान ने भी अपनी बर्बरता से मालाबार की भूमि को रक्तरंजित किया। परंतु अब प्रश्न ये उठता है – यदि टीपू सुल्तान और हैदर अली ने इतने अत्याचार ढाए थे, तो फिर मोपला दंगों की आवश्यकता क्यों पड़ी? वास्तव में, मालाबार के मुस्लिम निवासियों को उस क्षेत्र में सम्पूर्ण वर्चस्व चाहिए था।

टीपू सुल्तान के बर्बर शासन से सभी अवगत हैं, परंतु उसके बर्बर शासन के विरुद्ध विद्रोह से हमें अधिकतर अपरिचित ही रखा गया है। 1789 आते-आते टीपू के बर्बर शासन के विरुद्ध मालाबार में विद्रोह प्रारंभ हो गया था, जिसे कुचलने के लिए 1790 में स्वयं टीपू सुल्तान को मालाबार भूमि आने को विवश होना पड़ा। इसी बीच मालाबार के विद्रोहियों की रक्षा हेतु त्रावणकोर के दीवान, राजा केशवदास पिल्लई के नेतृत्व में नेदुमकोट्टा के समक्ष दोनों सेनाओं का सामना हुआ।

जहां टीपू को इस्लामी सेनाओं और फ्रेंच शासन का समर्थन प्राप्त था, तो वहीं त्रावणकोर को अप्रत्यक्ष तौर पर ब्रिटिश साम्राज्य का समर्थन प्राप्त था। यह युद्ध इसलिए प्रारंभ हुआ था क्योंकि मालाबार में टीपू के अत्याचार का विद्रोह कर रहे कई गैर-मुस्लिम योद्धाओं ने त्रावणकोर में शरण ली थी, और जब टीपू सुल्तान ने त्रावणकोर के शासक धर्मराज से उन योद्धाओं को सौंपने को कहा, तो उनका प्रतिनिधित्व कर रहे युवा सेनापति केशव पिल्लई ने उनका प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया।

थ्रिसुर [Thrissur] में पाँच माह तक चले इस भीषण युद्ध का कोई परिणाम नहीं निकला, परंतु इसने शनै शनै: टीपू सुल्तान के अत्याचारी शासन के पतन की नींव डाल दी थी, क्योंकि त्रावणकोर पर आक्रमण मंगलुरु में हस्ताक्षरित ब्रिटिश मैसूर समझौते का उल्लंघन था, जो तीसरे ब्रिटिश मैसूर युद्ध का कारक बना, और इसी के कारण 1799 में टीपू सुल्तान को श्रीरंगपटनम में भीषण युद्ध के बाद त्रावणकोर और ब्रिटिश साम्राज्य की संयुक्त सेना ने यमलोक भेज दिया। उस एक क्षण के लिए एक अत्याचारी, निरंकुश आक्रांता का नाश करने के लिए ‘दो वैचारिक शत्रु’ एक हुए थे। इसी विद्रोह से आरंभ हुआ था हिंदुओं का वापस अपनी संपत्ति पर दावा।

तद्पश्चात ब्रिटिश साम्राज्य के नेत्रों में सबसे बड़ी बाधा बने टीपू सुल्तान का अंत हुआ, तो वहीं त्रावणकोर समेत सम्पूर्ण मालाबार को मैसूर के निरंकुश शासन से कुछ समय के लिए मुक्ति मिल गई।

परंतु, क्या इससे हिंदुओं और मुस्लिमों के बीच के संबंधों में जो खटास आई, वो कम हुई। ऐसा बिल्कुल नहीं हुआ। इसके विपरीत ऐसे अनेक उदाहरण हैं, जिनसे यह सिद्ध होता है कि टीपू के निरंकुश शासन से विद्रोह करके मालाबार में सनातनियों ने अपनी संपत्ति, अपना सम्मान पुनः प्राप्त तो किया, परंतु कहीं न कहीं धार्मिक उन्माद के बीज यहीं से उत्पन्न होने लगे। इसी विद्रोह के पश्चात जिन संपत्तियों को सनातनियों ने पुनः प्राप्त किया, वहाँ से मोपला मुस्लिमों के मस्तिष्क में प्रतिघात की भावना उमड़ने लगी, जो कहीं न कहीं कश्मीर के नरसंहार से भी सांस्कृतिक रूप से जुड़ा हुआ है।

ये कैसे संभव है? 1852 में ब्रिटिश अधिकारी टी एल स्ट्रेन्ज को मालाबार के विशेष मंडलायुक्त यानि कमिश्नर के रूप में नियुक्त किया गया था। उन्होंने हिन्दू और मुस्लिम जमींदारों के बीच के अंतर को स्पष्ट रेखांकित करते हुए अपने रिपोर्ट में लिखा, “मैं … आश्वस्त हूं और हालांकि ऐसे उदाहरण हैं कि एक पट्टेदार के लिए इस व्यवस्था में व्यक्तिगत कठिनाई पैदा हो सकती है, परन्तु इस समस्त कार्य व्यवहार में हिन्दू जमींदार अपने काश्तकार, चाहे मोपला या हिंदू, सामान्यत: सौम्य, भेदभाव से रहित और न्यायसंगत रहता है। वहीं मोपला पट्टेदार, विशेष रूप से दक्षिण मालाबार के तालुकों में, जहां उपद्रव का प्रकोप सर्वाधिक है, अपने दायित्वों से बचने में बहुत कुशल हैं। झूठे और अपमानजनक मुकदमेबाजी का सहारा लेते हैं। जिन हिस्सों में सर्वाधिक उपद्रव हुए हैं, वहां हिंदू मोपला से इतना डरे हुए हैं कि अधिकतर मोपला मुस्लिमों के विरुद्ध अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाने की हिम्मत भी नहीं जुटा पाते। कई मोपला पट्टेदार ऐसे हैं, जो किराए का भुगतान भी नहीं करते हैं।’’ इस बात की पुष्टि अधिवक्ता एवं इतिहासकार सी शंकरण नायर ने भी की है।

स्ट्रेंज ने यह भी कहा था कि, ” चूंकि भूमि हिंदुओं के पास है और पैसा मप्पिलाओं के पास है, इसलिए भूमि पाने के लिए मप्पिलाओं ने कट्टरता को प्रोत्साहित किया। अंत में इसका परिणाम यह हुआ कि सभी क्षेत्र में मप्पिला बढ़ते गए तथा भूमि निश्चित रूप से मप्पिलाओं के कब्जे में चली गयी।”

वहीं मालाबार के जिलाधिकारी रह चुके मिस्टर कोनोली 1852 में अपनी रिपोर्ट में उल्लेख करते हैं कि,

“पिछले कई वर्षों से मालाबार की भूमि वीभत्स आक्रमणों से रक्तरंजित हुई है, जो हिंदुओं पर मोप्ला मुस्लिमों ने किए हैं। धनाढ्य और सम्मानित हिंदुओं को सार्वजनिक तौर पर अपमानित किया गया, इनपर आक्रमण किया गया, इनके निवासों को अग्नि के हवाले किया और फिर पुलिस या सेना से संघर्ष में अपना सर्वस्व अर्पण किया। पूर्व में मपिल्ला यदा कदा महिलाओं और बच्चों को छोड़ दिया करते थे, परंतु इस बार जो भी मिलता, सबका नाश होता!”

यहाँ ध्यान देने वाली बात यह है कि कोनोली ने यह बात टीपू की मृत्यु के 50 वर्ष पश्चात 1852 में कही थी। अर्थात उसकी मृत्यु के बाद अपनी संपत्ति को पुनः प्राप्त करने वाले हिंदुओं के विरुद्ध वातावरण बन चुका था तथा वर्ष 1921 के नरसंहार के लिए मजबूत दीवार खड़ी हो चुकी थी। टीपू की मृत्यु के पश्चात हिंदुओं के खिलाफ छोटे-बड़े कई दंगे हुए, कभी संपत्ति को लेकर तो कभी भूमि को लेकर।

परंतु कथा इतने पर समाप्त नहीं होती। मालाबार में सांप्रदायिक हिंसा के पीछे एक और कारण भी था, मोपला मुस्लिमों का अलग स्वभाव, जिसपर अंग्रेज़ों का भी कोई नियंत्रण नहीं था। ब्रिटिश शासन के आधिकारिक रिकॉर्ड्स के अनुसार, तत्कालीन जिला पुलिस अधीक्षक आर एच हिचकॉक बताते हैं, “खिलाफत आंदोलन के नेटवर्क से कहीं अधिक महत्वपूर्ण, मपिल्लाओं के बीच संचार की पारंपरिक प्रणाली थी। यह ऐसा बिंदु था जो हिंदू और मपिल्ला के बीच एक बड़ा अंतर निर्मित करता था। कुछ बाजारों में पूर्ण रूप से मपिल्ला ही मौजूद हैं, और अधिकांश मपिल्ला सप्ताह में कम से कम एक बार शुक्रवार की नमाज के लिए और अक्सर मस्जिदों में अन्य समय पर भी एकत्र होते हैं। इसलिए वे अपनी किसी तरह की सार्वजनिक राय बना सकते हैं और जोड़ सकते हैं, लेकिन यह सारा काम मजहब की आड़ में किया जाता है। इस कारण हिंदू या यूरोपीय लोगों को भी इसके बारे में कुछ भी जानकारी होना कठिन हो जाता।”

ये नींव एक दिन में तो अवश्य नहीं पड़ी होगी। इसके पीछे वर्षों का परिश्रम, तुष्टीकरण, और अनेकों प्रकार के प्रपंच सम्मिलित हैं, जिनसे मोपला के निकृष्ट आक्रान्ताओं को अपने कुकृत्य करने की प्रेरणा मिली होगी। इतिहास ऐसे ढेरों उल्लेख, उद्धरणों, साक्ष्यों तथा प्रमाणों से पटा पड़ा है।

आवश्यकता है तो बस आपको अपने चेतना को झकझोरने की। सच आपके सामने ही खड़ा है। अगले अंक में हमारा प्रयास इस पक्ष पर रहेगा कि कैसे इस द्वेष को बढ़ावा देते हुए 50 से भी अधिक हिंसक घटनाएँ हुई, जिन्होंने शनै शनै: मोपला के भीषण और नृशंस नरसंहार की नींव रखी। हम इस विषय पर भी चर्चा करेंगे कि कैसे वाम और ”वाम के हाथ’ अर्थात काँग्रेस नें इस घटना को न सिर्फ छुपाया बल्कि छद्म राष्ट्रवाद और कृषक विद्रोह के नाम पर इस्लामी कट्टरपंथियों का महिमामंडन किया और धार्मिक कट्टरता के इस वीभत्स स्वरूप को एक ‘कृषि आंदोलन’ का रूप देने का प्रयास किया।

भाग 1 – मोपला नरसंहार: कैसे टीपू सुल्तान और उसके पिता हैदर अली ने मोपला नरसंहार के बीज बोए थे

Tags: टीपू सुल्तानमोपला नरसंहार
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‘मैं एक शर्त पर ज़िंदा रह सकता हूं…’: अपने आखिरी पत्र में भगत सिंह ने साथियों से क्या कहा?

28 September 2026

भारत के स्वतंत्रता संग्राम के नायकों की चर्चा भगत सिंह का नाम लिए बगैर हमेशा अधूरी ही मानी जाएगी। भगत सिंह का योगदान इतिहास के...

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