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तमिलनाडु सरकार अपने फायदे के लिए मंदिरों में दान किए गए सोने को पिघला रही है

आखिर कब तक हिंदू मंदिरों को बनाया जाता रहेगा निशाना!

Aniket Raj द्वारा Aniket Raj
14 October 2021
in चर्चित
तमिलनाडु के मंदिरों

Source- Google

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जो समाज अपने इतिहास को भूल जाता है, इतिहास उसके भविष्य को निगल जाता है। पूर्व के आक्रांता ‘गोरी और गजनवी’ बन कर लूटते थे और आज के नेता शासक बन कर लूट रहे हैं, परंतु हमेशा सोमनाथ और विश्वनाथ ही लूटा जाएगा क्योंकि आप “धर्मो रक्षति रक्षितः” का अर्थ भूल चिरनिद्रा में सो गए हैं। आपके इसी सुसुप्तावस्था का लाभ लेकर तमिलनाडु की स्टालिन सरकार ने मंदिरों के सोना को पिघला कर राज्य और शासन के प्रयोग में लाने का निर्णय लिया है। अगर आपके चेतना की चिरनिद्रा इतने पर भी भंग नहीं होती तो आपकी जानकारी के लिए बता दें कि यह प्रक्रिया 1977 से चली आ रही है।

हिंदुओं के धार्मिक और संवैधानिक अधिकारों को ताक पर रख तमिलनाडु सरकार भक्तों द्वारा अपने भगवान के लिए दान किए गए सोने को पिघला रही है! सरकार अपने निर्धारित लक्ष्य का लगभग 25 प्रतिशत पहले ही पूरा कर चुकी है और अब तक 500 किलोग्राम से अधिक सोना पिघलाया जा चुका है। तमिलनाडु के महाधिवक्ता आर षणमुगसुंदरम ने न्यायमूर्ति आर महादेवन और न्यायमूर्ति अब्दुल कुद्दोज की खंडपीठ से कहा- “लगभग 500 किलोग्राम सोना पिघलाया गया है और बैंकों में जमा कर राज्य सरकार ने इससे ब्याज के जरिए 11 करोड़ रुपये कमाए हैं।”

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दरअसल, तमिलनाडु में लगभग 36,400 मंदिर हैं जो HR&CE बोर्ड के अंतर्गत आते हैं। तमिलनाडु सरकार इस बोर्ड के अंतर्गत आने वाले मंदिरों के करीब 2,000 किलोग्राम सोने के आभूषणों को 24 कैरट के शुद्ध सोने में पिघलाकर बैंकों में जमा कराएगी। सरकार पहले चरण में 47 ग्रेड-ए मंदिरों के साथ इसकी शुरुआत करेगी और फिर सभी मंदिरों को चरणबद्ध तरीके से इसके अंतर्गत लाया जाएगा।

तमिलनाडु सरकार के इस कदम का भंडोफोड़ तब हुआ जब मुख्यमंत्री ने बुधवार को मानव संसाधन और सीई मंत्री पीके शेखर बाबू, पर्यटन, संस्कृति और मानव संसाधन और सीई प्रमुख सचिव बी चंद्र मोहन, मानव संसाधन और सीई आयुक्त जे कुमार गुरुबारन और अन्य अधिकारियों की मौजूदगी में सचिवालय से योजना के पुनरुद्धार का शुभारंभ किया। सरकार के इस निरंकुश निर्णय के विरोध में दो याचिकाकर्ताओं ने मद्रास उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति आर महादेवन और अब्दुल कुद्दोज की पीठ के समक्ष गुहार लगाई है।

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आदेश को रद्द करने हेतु कानूनी तर्क

एम श्रवणन और गोपाल कृष्णन द्वारा दायर याचिकाओं में 9 सितंबर और 22 सितंबर को सरकार द्वारा पारित किए गए आदेश को रद्द करने की मांग की गई थी, जिसमें कहा गया था कि कीमती संपत्ति से मंदिर को वंचित करना संविधान के अनुच्छेद 300-A के तहत संपत्ति के संवैधानिक अधिकार का उल्लंघन है।

याचिकाकर्ता के अधिवक्ता गोपाल शंकर नारायणन ने कहा कि भक्तों को मंदिरों के आभूषणों के बारे में कोई जानकारी नहीं है क्योंकि विभाग द्वारा कोई रजिस्टर ठीक से नहीं रखा गया जबकि  अदालत ने उसी के संबंध में पहले एक आदेश जारी किया था। उन्होंने न्यायालय के समक्ष यह तर्क भी रखा की ज्वेल्स रूल्स के नियम 11 में कहा गया है कि ट्रस्टी ही एकमात्र व्यक्ति है जो गहनों की मरम्मत या बदलने का फैसला कर सकता है, और नियम 13 ट्रस्टी को गहने पिघलाने की शक्ति प्रदान करता है।

उन्होंने पूछा कि जब 60 से अधिक वर्षों से कोई रजिस्टर नहीं रखा गया है, ऐसे में ट्रस्टी कैसे जान सकते हैं कि मंदिरों के लिए कौन से गहनों की आवश्यकता थी और कौन से गहने 10 साल पुराने थे। ट्रस्ट का एकमात्र कार्य मंदिरों का प्रशासन करना है। विभाग के पास सोने को छूने का कोई अधिकार नहीं है। जिसपर न्यायाधीशों ने याचिकाकर्ताओं से कहा कि यदि आवश्यक हो तो 21 अक्टूबर तक अतिरिक्त हलफनामा दाखिल करें।

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बीजेपी ने बोला जोरदार हमला

तमिलनाडु सरकार के इस कदम का विरोध करते हुए तमिलनाडु भाजपा के प्रवक्ता नारायण थिरुपति ने कहा, “सरकार जो कर रही है वह अवैध है। स्वर्ण चढ़ावा विशिष्ट देवताओं को भेंट या प्रसाद स्वरूप दिया जाता है और HR&CE विभाग का इसपर कोई अधिकार नहीं है। भक्त किसी भी प्रकार का भेंट उस मंदिर को मजबूत करने के लिए चढ़ातें है। अतः सरकार का उसपर कोई अधिकार नहीं है। यहां तक ​​कि मंदिरों के उत्थान हेतु सोने के उपयोग का सरकारी दावा भी गलत है क्योंकि सरकार द्वारा आज तक मंदिर से लिए गए सोने के उपयोग का कोई ब्योरा नहीं है।”

बताते चले कि मंदिर स्वर्ण मुद्रीकरण योजना 1979 में शुरू की गई थी और इसके तहत भक्तों द्वारा प्राचीन श्री मीनाक्षी सुंदरेश्वर मंदिर, मदुरै, श्री धंदायुथपनी स्वामी मंदिर, पलानी, श्री सुब्रह्मण्य स्वामी मंदिर, तिरुचेंदूर और समयपुरम में मरिअम्मन मंदिर सहित नौ प्रमुख मंदिरों में दान किए गए सोने को “gold bars” छड़ों परिवर्तित कर दिया गया था।

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निष्कर्ष

मंदिर आस्था का केंद्र है, यह हमारी संस्कृति और गौरवशाली परंपरा की वाहक है। परंतु सरकार ने इसे शोषण का जरिया बना लिया। हिंदुओं की चुप्पी ने उन्हें और बल दिया है। तमिलनाडु की स्टालिन सराकर का यह निर्णय अत्यंत निरंकुश है। अगर इसे धार्मिक दृष्टिकोण से न भी देखें, तो संविधान के अनुच्छेद-26 के अनुसार यह हमारा मूलभूत अधिकार है, इसका अतिक्रमण हिंदुओं के मूलभूत अधिकारों का दमन है। इस मामले की अगली सुनवाई 21 अक्टूबर को होने वाली है तब स्थिति और स्पष्ट होगी। लेकिन स्टालिन सरकार की नियति में खोट साफ दिख रहा है।

Tags: HR&CE बोर्डतमिलनाडु सरकार
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