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1971 – जब अमेरिका ने चीन को भारत पर आक्रमण करने के लिए उकसाया

एजेंडा का चक्कर बाबू भैया!

Abhinav Kumar द्वारा Abhinav Kumar
16 December 2021
in इतिहास
1971 War

Source- TFI

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आज विजय दिवस है। आज ही के दिन 1971 में भारत ने पाकिस्तान के खिलाफ युद्ध जीता और एक नए देश का निर्माण कर विश्व को चेतावनी दी थी कि भारत को कम आंकना किसी भी देश के लिए घातक सिद्ध हो सकता है। यह चेतावनी अमेरिका के लिए भी थी, जो उस समय भारत के खिलाफ कई षड्यंत्र रच रहा था। यह 93,000 से अधिक सेना को बंदी बनाने वाली जीत, तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन और सुरक्षा सलाहकार हेनरी किसिंजर के भारत विरोधी पूर्वाग्रहों को भी एक चेतावनी थी। हालांकि, कम लोग ही यह जानते हैं कि जब भारत-पाकिस्तान को अपने पश्चिमी तट से लेकर पूर्वी तट तक और कराची से लेकर बांग्लादेश की धरती तक रौंद रहा था, तब अमेरिका, चीन को भारत पर आक्रमण करने के लिए उकसा रहा था।

निक्सन का चीन के साथ Re-approchement अभियान

दरअसल, भारत-पाकिस्तान का युद्ध उस दौर में आरंभ हुआ था, जब अमेरिका में कुख्यात रिचर्ड निक्सन और उनके सुरक्षा सलाहकर हेनरी किसिंजर की जोड़ी शासन कर रही थी। इन दोनों को ही भारत फूटी आंख भी नहीं सुहाता था। भारत का रूस के साथ बढ़ते संबंधों के कारण इन्हें लगता था कि भारत एक Russian Stooge है। यही नहीं, चीन की उस दौरान रूस के साथ बढ़े तकरार के मौके को भुनाने के लिए इन दोनों ने चीन के साथ Re-approchement अभियान चलाया और इसके लिए उन्होंने मोहरा बनाया पाकिस्तान के तानाशाह याह्या खान को।

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पाकिस्तान और चीन की दोस्ती का फायदा उठाते हुए अमेरिका ने चीनी समर्थन के लिए हरसंभव कोशिश की जो वह कर सकता था, जिससे एशिया में उसे सोवियत संघ के विरुद्ध एक मजबूत देश मिल जाए। निक्सन के इस गणित में भारत कहीं भी नहीं था। साल 2002 में NSA और The George Washington University’s Cold War Group ने कई अमेरिकी दस्तावेज़ को Declassify किया था, जिसमें अमेरिका के इस योजना का खुलासा हुआ था। इसमें स्पष्ट लिखा था कि “1969 की शुरुआत में राष्ट्रपति पद पर बैठने के बाद से और इससे भी पहले, कम से कम संभावित परमाणु खतरे को रोकने के लिए नहीं, बल्कि प्रतिकूल चीन-सोवियत संबंधों का लाभ उठाकर, शीत युद्ध में सोवियत संघ के साथ एक और मोर्चा खोलने के लिए निक्सन चीन के साथ संबंधों को बदलने में रुचि रखते थे।”

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चीन को साधने में पाकिस्तान ने की अमेरिका की मदद

अक्टूबर 1970 में, किसिंजर ने पाकिस्तान के तानाशाह जनरल याह्या खान से मुलाकात की, जिन्होंने एक साल पहले चीन और अमेरिका के बीच संचार के लिए एक चैनल की पेशकश की थी। उसी समय पाकिस्तान ने बताया कि चीन के प्रधानमंत्री का एक महत्वपूर्ण संदेश आया है। इससे अमेरिका खुश हो गया और बांग्लादेश की समस्या को नजरंदाज करते हुए ‘Ping Pong Diplomacy’ पर ही अपने ध्यान को केन्द्रित रखा। उसी समय, अमेरिकी राष्ट्रपति निक्सन ने चीन जाने में अपनी रुचि के बारे में सार्वजनिक बयान दिए।

फ्रांसीसी मूल के लेखक, पत्रकार, इतिहासकार और तिब्बत विशेषज्ञ क्लाउड अर्पी ने अपने लेख में बताया है कि 27 अप्रैल, 1971 को पाकिस्तानी राजदूत ने तत्कालीन चीनी प्रधानमंत्री Zhou Enlai का जवाब दिया। इस संदेश में यही था कि Mao Zedong और Zhou Enlai, तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति निक्सन की यात्रा में रुचि दिखा रहे हैं। इसी सकारात्मक जवाब को देख कर निक्सन ने जुलाई 1971 में किसिंजर को चीन की गुप्त यात्रा पर भेज दिया, जिसे आज भी अमेरिका और चीन के संबंधों में एक अहम मोड़ माना जाता है।

अमेरिका ने ऑपरेशन सर्चलाइट के अत्याचार की खबरों को दबाया

यहां ध्यान देना होगा कि यह वही समय है, जब पाकिस्तानी सेना ने पूर्वी पाकिस्तान में ऑपरेशन सर्चलाइट चला कर अत्याचार का वो तांडव आरंभ किया था, जो विश्व युद्ध के बाद कभी भी नहीं देखा गया था। पाकिस्तानी सेना द्वारा किए जा रहे जुल्मों से बचने के लिए लाखों शरणार्थी भारत में शरण लेने लगे थे। परंतु, वाशिंगटन को इससे कोई मतलब नहीं था और इस मामले को अमेरिका ने दबाने का कुत्सित प्रयास भी किया। इसी दौरान अमेरिका ने चीन को पाकिस्तान के तरफ से भारत पर चढ़ाई करने का सुझाव भी दे दिया था। तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति निक्सन और सुरक्षा सलाहकरा किसिंजर को ढाका स्थित महावाणिज्य दूतावास में तैनात अपने कर्मचारियों से पाकिस्तानी सेना द्वारा किए जा रहे ‘आतंक के तांडव’ की रिपोर्ट मिली, लेकिन उन्होंने इसे नजरंदाज कर दिया।

और पढ़े: Navy Day: जब पाकिस्तान ने डाली थी द्वारका पर बुरी नज़र, तो बदले में मिली थी कराची की तबाही

NSA वेबसाइट ने इसकी पुष्टि करते हुए कहा कि निक्सन और किसिंजर नहीं चाहते थे कि पश्चिमी पाकिस्तान के लोग अमेरिका के खिलाफ हो जाएं और चीन के साथ चल रहे उनके प्रयास पर कोई आंच आए। दस्तावेजों के अनुसार जब शरणार्थी मुद्दा भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध का कारण बना, तब निक्सन और किसिंजर ने सोचा कि चीन, जिसका पाकिस्तान के साथ घनिष्ठ संबंध था, वह संकट में भूमिका निभा सकता है। भारतीय प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी की वाशिंगटन यात्रा के बाद, 5 नवंबर, 1971 को किसिंजर के साथ निक्सन की मुलाकातों के दिलचस्प विवरण हैं। तब किसिंजर ने कहा था कि “भारतीय वैसे भी कमीने हैं। वे वहां [बांग्लादेश में] युद्ध शुरू कर रहे हैं।”

किसिंजर और निक्सन ने चीन को उकसाया

तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति निक्सन और उनके सुरक्षा सलाहकरा किसिंजर चाहते थे कि चीन भारत पर अधिक दबाव डाले। दस्तावेजों के अनुसार किसिंजर ने कहा, ‘मुझे लगता है कि हमें [चीन को] बताना होगा कि उनकी ओर से भारतीय सीमा पर चढ़ाई बहुत महत्वपूर्ण हो सकती है।’

10 दिसंबर से किसिंजर ने भारत के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए चीनियों को प्रोत्साहित करना शुरू किया। दस्तावेजों के अनुसार किसिंजर ने कहा, ‘यदि पीपुल्स रिपब्लिक भारतीय उपमहाद्वीप की स्थिति को सुरक्षा के लिए खतरा मानता है और यदि वह अपनी सुरक्षा की रक्षा के लिए उपाय करता है, तो अमेरिका उन प्रयासों का विरोध करेगा जो People’s Republic (चीन) के खिलाफ हस्तक्षेप करने के लिए आगे बढ़ेगा।’ अर्थात् वे स्पष्ट रूप से यह कह रहे थे कि चीन, भारत पर हमला करे। साथ ही मदद का आश्वासन देने हुए यह भी कह रहे हैं कि जो भी चीन को भारत के खिलाफ आगे बढ़ने से रोकने का प्रयास करेगा, उससे वे युद्ध के लिए तैयार हैं।

और पढ़े: 1971 में इंदिरा गांधी POK को वापस ले सकती थीं, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया

इसी बीच 12 दिसंबर 1971 को, संयुक्त राष्ट्र में चीन के राजदूत Huang Hua ने किसिंजर के साथ न्यूयॉर्क में एक तत्काल बैठक के लिए कहा था। किसिंजर निश्चिंत थें कि बीजिंग भारतीय सीमा की ओर आगे बढ़ने वाला है। ऐसे में तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति निक्सन को यह चिंता सताने लगी कि अगर सोवियत संघ चीन के खिलाफ आ गया, तो अमेरिका क्या करेगा? इस पर किसिंजर ने उनसे कहा, ‘हमें परमाणु हथियारों की पैरवी नहीं करनी है। हमें सतर्क रहना होगा, हमें सेना को भेजना पड़ सकता है। हमें उन्हें (चीन को) बमबारी में सहायता देनी पड़ सकती है।’ हालांकि, ऐसा कुछ हुआ नहीं और चीन ने अपने आप को अपनी सीमा में ही रखना उचित समझा।

जब अमेरिका के विरुद्ध भारत का साथ देने आ गया था रुस

हालांकि, उस समय निक्सन और किसिंजर ने जानबूझ कर पाकिस्तानी सेना की मदद के लिए एक अमेरिकी विमानवाहक पोत और अन्य नौसैनिक बलों को बंगाल की खाड़ी में भेजने का फैसला किया था। अमेरिका ने अपने 7वें बेड़े को भारत के खिलाफ उतार दिया था, ब्रिटेन ने भी अपने ईगल नामक बेड़े को भारत के खिलाफ बंगाल की खाड़ी में भेज दिया था। जिसके बाद भारत ने रुस से सहायता मांगी और रुस ने भारत का साथ देते हुए अपना 40वां बेड़ा भेज दिया। जिसे देखते ही अमेरिका और ब्रिटेन की हालत पतली हो गई थी। ब्रिटेन ने तो यहां तक कह दिया था कि ‘We are so late’। अमेरिका का मानना था कि ‘सोवियत हथियारों द्वारा समर्थित सोवियत कठपुतली’ को पाकिस्तान पर जीत से रोका जा सके। इसमें भी निक्सन को सफलता नहीं मिली।

भारतीय सेना ने न सिर्फ कराची को धूल धूसरित किया, बल्कि पाकिस्तान से विश्व के सबसे बड़े सार्वजनिक आत्मसमर्पण पत्र हस्ताक्षर करवाया। यह कहानी थी अमेरिका के धोखे की, जो वह चीन और पाकिस्तान के साथ मिल कर भारत को देना चाहता था। आज विजय दिवस के दिन भारत के इस जीत का उत्सव और दोगुना हो जाता है, जब यह पता चलता है कि अमेरिका ने न सिर्फ पाकिस्तान की मदद की, बल्कि चीन को भी भारत के खिलाफ उकसाने का प्रयास किया, जिसमें वह सफल नहीं हो सका था।

और पढ़े: JFR Jacob – भारत के वो शूरवीर जिन्होंने 1971 के युद्ध में पाकिस्तान के पराजय की पटकथा रची

Tags: अमेरिकाभारतीय सेनाविजय दिवस
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