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जानवरों की हड्डियों से बनी क्रोकरी का इस्तेमाल बंद करना क्यों आवश्यक है?

‘बोन चाइना’ हमारे धर्म में घुसपैठ है!

Animesh Pandey द्वारा Animesh Pandey
12 July 2022
in प्रीमियम
bone china

Source- Google

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कभी चीनी मिट्टी के प्यालों में चाय पी है? या उसके बने बर्तनों में भोजन किया है? आप भी सोच रहे होंगे, भला क्या घमंजेबाजी बतिया रहे हैं? परंतु कहीं न कहीं बोन चाइना का नाम तो अवश्य ही सुने होंगे। इस क्रॉकरी की चर्चा केवल भारत में ही नहीं अपितु संसार भर में है, परंतु क्या आपको आभास है कि इस क्रॉकरी के पीछे एक ऐसा सच भी है, जो घृणित है। पत्तलों, मिट्टी और तांबे एवं पीतल के बर्तनों में भोजन करने वाले भारतीयों को बोन चाइना जैसे ‘विष’ की ओर आकर्षित किया गया, जो न केवल हमारे लिए अधार्मिक है, अपितु हानिकारक भी।

वो कैसे? क्या आपको पता है बोन चाइना जानवरों की हड्डियों के चूरे से बनता है? बोन चाइना और सेरामिक [Ceramic] के प्यालों में कुछ मूलभूत अंतर होते हैं, जिन्हे जानना आपके लिए बहुत आवश्यक है। चीनी मिट्टी के बर्तन मुख्य कच्चे माल के रूप में प्राकृतिक मिट्टी और विभिन्न प्राकृतिक खनिजों से बनते हैं और कच्चे माल में 25% से अधिक की हड्डी पाउडर सामग्री के साथ चीनी मिट्टी के बर्तन बोन चाइना है। इसके अतिरिक्त हड्डी चीन और चीनी मिट्टी की चीज़ों के बीच सामग्री और शिल्प कौशल में अंतर उनके ग्रेड अंतर को निर्धारित करता है। बोन चाइना बनाने के लिए जानवरों की हड्डी का कोयला मुख्य पसंद है और इसकी सामग्री 40% तक होती है। वर्तमान में, दुनिया में सबसे अधिक बोन चाइना सामग्री के साथ ब्रिटिश शाही परिवार का उच्च गुणवत्ता वाला बोन चाइना 50% है।

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परंतु बोन चाइना का इतिहास भी बड़ा अनोखा है, जिसमें ब्रिटिश प्रदूषण भी सम्मिलित है। बता दें कि इसकी शुरुआत इंग्लैंड से हुई। दरअसल, इंग्लैंड के लोगों को चीनी मिट्टी के बने बर्तन बहुत अच्छे लगते हैं, इसलिए वहां की कंपनियां चीन से चीनी मिट्टी आयात करती थीं और फिर उससे बर्तन बनाकर बेचती थीं। चीन से मिट्टी इंग्लैड ले जाने में कंपनियों को बहुत अधिक खर्च करना पड़ता है, जिसका कोई और विकल्प तलाशने के दौर में बोन चाइना की शुरुआत हुई। सबसे पहले इंग्लैंड के थॉमस फ्रे ने 1748 में हड्डियों को राख बनाकर उससे बर्तन बनाए, जो चीनी मिट्टी जैसे मुलायम भी थे और उससे सुंदर भी। इसके बाद इंग्लैंड में खूब सारी कंपनियों ने बूचड़खानों से हड्डियां लाकर उनसे प्लेट बनानी शुरू कर दीं। करीब 200 सालों तक बोन चाईना सिर्फ यूके के पास था, लेकिन उसके बाद जापान, चीन और पूरी दुनिया में फैल गया। भारत में इसकी शुरुआत बंगाल से 1964 में हुई. कुछ ही समय बाद राजस्थान बोन चाइना के बर्तनों का गढ़ बन गया। 2009 के आंकड़ों के अनुसार राजस्थान में 16-17 टन बोन चाइना के बर्तन रोज बनते थे।

बोन चाइना इसलिए महंगा होती है क्योंकि इसके उत्पादन के लिए सैकड़ों टन हड्डियों की जरुरत होती है, जिन्हें कसाईखानों से जुटाया जाता है। इसके बाद इन्हें उबाला जाता है, साफ किया जाता है और खुले में जलाकर इसकी राख प्राप्त की जाती है। बिना इस राख के कभी भी बोन चाइना नहीं बन सकता। जानवरों की हड्डी से चिपका हुआ मांस और चिपचिपापन अलग कर दिया जाता है। इस चरण में प्राप्त चिपचिपे गोंद को अन्य इस्तेमाल के लिए सुरक्षित रख लिया जाता है। शेष बची हुई हड्डियों को 1000 सेल्सियस तापमान पर गर्म किया जाता है, जिससे इसमें उपस्थित सारा कार्बनिक पदार्थ जल जाता है। इसके बाद इसमें पानी और अन्य आवश्यक पदार्थ मिलाकर कप, प्लेट और अन्य क्राकरी बना ली जाती है। इस तरह बोन चाइना अस्तित्व में आता है। 50 प्रतिशत हड्डियों की राख 26 प्रतिशत चीनी मिट्टी और बाकी चाइना स्टोन। खास बात यह है कि बोन चाइना जितना ज्यादा महंगा होगा, उसमें हड्डियों की राख की मात्रा भी उतनी ही अधिक होगी।

जिस देश में कभी मिट्टी के बर्तन, तांबे, पीतल, लोहे इत्यादि के बर्तन प्रचलित थे, वहाँ पर बोन चाइना जैसा ‘विष’ कैसे प्रचलित हुआ? कारण एक ही है– साम्राज्यवाद। ब्रिटिश साम्राज्यवादियों के कारण क्रॉकरी में खाने की रीति प्रचलित हुई और जल्द ही देसी पतीलों और पत्तलों एवं बर्तनों का स्थान बोन चाइना के बर्तनों ने ले लिया। चोरी करने की आदत पाश्चात्य संस्कृति की बहुत पुरानी आदत है। 2021 में TFI ने एक लेख के जरिए बताया था कि कैसे जब हज़ारों वर्ष पहले पाश्चात्य संस्कृति अधपके मांस का भक्षण करती थी, तब भारतीय संस्कृति प्लांट आधारित डायट को बढ़ावा देती थी और अनेकों अन्न से परिपूर्ण लड्डुओं के सेवन को भी बढ़ावा देती थी। जो सेहत के लिए बेहद गुणकारी थी। जो आज विश्व के लिए Health Conscious है, उसे सदियों पहले भारत ने चिन्हित किया था।

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परंतु पश्चिमी देशों की यह क्रेडिट चोरी यहीं तक सीमित नहीं रही। हमें आज तक समझाया गया है कि ग्रहों के सिद्धांत के बारे में गैलीलियो और कोपरनिकस जैसे वैज्ञानिकों ने खोज की। लेकिन ऐसा तो संभव है नहीं कि उन्होंने यूं ही खोज निकाला हो। यदि उनसे पहले ग्रहों के मोशन, सूर्यग्रहण इत्यादि के बारे में कोई ज्ञान ना होता तो भारत में नवग्रह का सिद्धांत कैसे आया? जिन सिद्धांतों के लिए गैलिलियो और कोपरनिकस आज लाइमलाइट चुरा रहे हैं, उन्हें तो जाने कितने वर्षों पहले वराहमिहिर ने अपने ‘बृहद संहिता‘ में संकलित कर लिया था।

कभी जो विदेशी हमें पत्तलों पर खाने के लिए चिढ़ाते थे, आज वही पत्तलों पर खाने को बढ़ावा दे रहे हैं, और उन पर अपना अधिकार भी जमाना चाहते हैं। यह तो कुछ भी नहीं है। पाश्चात्य संस्कृति तो नीम, हल्दी और बासमती जैसे खाद्य पदार्थों तक को अपना सिद्ध करने पर तुली हुई थी, जिसके लिए भारत को लंबी, वैधानिक लड़ाइयाँ लड़नी पड़ी थी। हालांकि जो संस्कृति भारतीय संस्कृति द्वारा पेड़ के पत्तों से बनी प्लेटों तक को अपना बनाने से बाज़ नहीं आए, उससे और क्या आशा की जा सकती है? लेकिन हम हैं कि अभी भी विदेशियों से वैलिडेशन यानि स्वीकृति के लिए लालायित रहते हैं।

ठीक इसी प्रकार से योग शास्त्र की भी परंपरा युगों-युगों से चली आ रही है। जिसे पश्चिम ने ‘हॉट योगा’ और ‘PT ड्रिल’ बना दिया है। हालांकि अब इसके लिए हमें पाश्चात्य संस्कृति की अनावश्यक स्वीकृति से बचना होगा। हमें अपने आत्मसम्मान को सर्वोपरि रखते हुए पश्चिमी देशों को यह सिद्ध करना होगा कि हमारे शास्त्र को वे यूं ही अपनी सुविधा अनुसार नहीं चुरा सकते। अब बोन चाइना जैसी घृणित प्रवृत्ति को हम वर्षों से अपने ऊपर ढोते आ रहे हैं, और अब चूंकि कुछ पाश्चात्य लोगों को मिट्टी और तांबे के बर्तन ‘कूल’ लगने लगे हैं, इसलिए हम पुनः उन्हें आत्मसात करने लगे हैं, अन्यथा अपनी स्वस्थ संस्कृति के पुनरुत्थान की ओर सोचते भी नहीं।

और पढ़ें: हिंदुओं, अपनी सुप्त अवस्था को त्यागो और स्वयं को सशक्त और प्रशिक्षित करो

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