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नर्मदा बचाओ आंदोलन पर स्वामीनाथन अय्यर मेधा पाटकर के कट्टर समर्थक से धुर विरोधी कैसे बन गये?

मेधा पाटकर को समझ जाना चाहिए कि उनका छल-प्रपंच अब नहीं चलेगा

Animesh Pandey द्वारा Animesh Pandey
5 September 2022
in चर्चित, मत
Narmada Bachao Andolan
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नर्मदा बचाओ आंदोलन, इन तीन शब्दों का हमारे बचपन से कुछ न कुछ नाता तो अवश्य है। यदि कभी इसमें भाग न लिया हो, तो इसके बारे में अवश्य सुना होगा जिसकी पुरोधा थीं पर्यावरणविद मेधा पाटकर। मेधा पाटकर, जो कथित रूप से आदिवासियों एवं नर्मदा नदी के संरक्षण की हितैषी थी परंतु वास्तविकता इससे कोसों दूर थी जिसे स्वयं मेधा पाटकर के कट्टर समर्थकों को भी स्वीकारना पड़ रहा है।

अय्यर के एक लेख में क्या लिखा गया है?

इन्हीं में से एक हैं पत्रकार एवं आर्थिक विश्लेषक स्वामीनाथन एस ए अय्यर जिन्होंने हाल ही में सरदार सरोवर प्रोजेक्ट के समर्थन में टाइम्स ऑफ इंडिया में एक रोचक लेख लिखा है। इस लेख में उन्होंने न केवल पीएम मोदी द्वारा इस जन कल्याण परियोजना की विशेषताएं गिनायीं अपितु यह भी रेखांकित किया कि कैसे कुछ लोग इस परियोजना को अवरुद्ध करने में लगे हुए थे, जिनमें दुर्भाग्यवश वे स्वयं भी थे। यह भी रेखांकित किया गया है कि कैसे वे सब के सब पूर्णतया गलत सिद्ध हुए।

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‘आदिवासी बच्चों के 13 करोड़ डकार गयी मेधा पाटकर, देश विरोधी गतिविधियों में किया इस्तेमाल’

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The thing about this article by Aiyar is not the confession that they were horribly wrong about the Narmada project but that this is just one of the hundreds of such incidents where the Left-Liberal cabal has been horribly wrong.

In fact, they have never been right in their act pic.twitter.com/7uZ953ERrI

— Akhilesh Mishra (मोदी का परिवार) (@amishra77) September 4, 2022

https://twitter.com/ARanganathan72/status/1566357657543356416?t=2SOUMDPSQgqUwDKnA5UQuw&s=09

इसी लेख में स्वामीनाथन अय्यर ने रेखांकित किया कि कैसे जिन समुदायों को इस परियोजना द्वारा प्रभावित होने के खतरे से मेधा पाटकर डराती रहती थी, उल्टे उन्हीं लोगों को इस परियोजना से सबसे अधिक लाभ हो रहा है। इसके ठीक उलट मेधा पाटकर के सभी खोखले दावे झूठे सिद्ध हुए हैं, और ये भी सिद्ध हुआ है कि वे वास्तव में कभी भी गुजरात के निवासियों को उनके मूल अधिकार देना ही नहीं चाहती थीं और कच्छ के निवासियों को सदैव जलापूर्ति से वंचित रखना चाहती थी।

परंतु यह नर्मदा बचाओ आंदोलन था क्या, जिसके सबसे कट्टर समर्थकों में से एक, स्वामीनाथन अय्यर तक को अपने स्वर बदलने पड़े हैं?

सरदार सरोवर, जो सरदार वल्लभ भाई पटेल का अपना स्वप्न था, इसे कई बार रोकने की कोशिश की गयी। कई बार अध्ययन कर इसकी ऊंचाई बढ़ाई गयी। तमाम उतार-चढ़ाव के बाद आखिरकार यह डैम बनकर तैयार हुआ और अब अपने उच्चतम स्तर पर आ चुका है।

और पढ़ें- ‘आदिवासी बच्चों के 13 करोड़ डकार गयी मेधा पाटकर, देश विरोधी गतिविधियों में किया इस्तेमाल’

इसके पीछे की कहानी क्या है?

सरदार सरोवर डैम विश्व का दूसरा सबसे बड़ा कंक्रीट का बांध है। देश के सबसे बड़े बांध के निर्माण की नींव भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने 1961 में रखी थी, लेकिन इसका उद्घाटन 17 सितंम्बर 2017 को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने 67 वें जन्मदिन पर किया था।

असल में वर्ष 1980 के दशक के मध्य में भारत की चर्चित कथित सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर सामने आयीं। 1985 में पहली बार उन्होंने बांध स्थल का दौरा किया उसके बाद पाटकर और उनके सहयोगियों ने सरदार सरोवर बांध के निर्माण और उद्घाटन के खिलाफ बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन किया। काशीनाथ त्रिवेदी, प्रभाकर मांडलिक, फूलचंद पटेल, बैजनाथ महोदय, शोभाराम जाट आदि ने मिलकर घाटी नवनिर्माण समिति का गठन किया और वर्ष 1986-88 के मध्य में बांध का पुरजोर विरोध किया। वर्ष 1987 में इन्होंने नर्मदा कलश यात्रा भी निकाली।

वर्ष 1988 के अन्त में यह विरोध ‘नर्मदा बचाओ आन्दोलन’ के रूप में सामने आ गया। पाटकर इसमें समन्वयक की भूमिका में थीं और कई लोग जैसे राकेश दीवान, श्रीपाद धर्माधिकारी, आलोक अग्रवाल, नंदिनी ओझा और हिमांशु ठक्कर इसमें शामिल हुए। मेधा पाटकर के अलावा अनिल पटेल, वामपंथी लेखिका अरुधंती रॉय, बाबा आम्टे व 200 से अधिक गैर सरकारी संगठन भी शामिल हुए। बांध के उद्घाटन के बावजूद मेधा पाटकर और अन्य कार्यकर्ताओं ने अपने “जल सत्याग्रह” से पीछे हटने से इन्कार कर दिया। इन छद्म विरोधियों को भविष्य में होने वाले विकास से कोई मतलब नहीं था।

इस डैम से विकास के कई नये रास्ते खुलेंगे। इससे गुजरात में 8,00,000 हेक्टेयर भूमि और राजस्थान में 2,46,000 हेक्टेयर भूमि बांध के जल द्वारा सिंचित होगीं। यह चार राज्यों के 131 शहरों, कस्बों तथा 9,633 गांवों को पेयजल प्रदान करेगा।

और पढ़ें- ओडिशा के ढिंकिया गांव के लोगों ने नौटंकीबाज सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर को खदेड़ा

अब लोग जागरुक हो रहे हैं

मेधा पाटकर की असल औकात क्या है, अब यह सोशल मीडिया की कृपा से पता चल चुकी है। कुछ माह पूर्व कथित सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर को ओडिशा के जगतसिंहपुर जिले के ढिंकिया गांव में बड़े पैमाने पर विरोध का सामना करना पड़ा। यहां हाल ही में एक JSW स्टील परियोजना को लेकर हड़कंप मच गया था और स्थानीय लोगों ने पाटकर को “वापस जाने” के लिए कहा था।

असल में दो अलग-अलग जनहित याचिकाओं के बाद, ओडिशा उच्च न्यायालय ने राज्य को निर्देश दिया था कि सरकार महीने के अंत तक स्थिति पर रिपोर्ट सौंपेगी।। इसके अलावा, अदालत ने तीन जनहित याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए वकीलों के पैनल का गठन किया था, जिसमें ढिंकिया में प्रस्तावित स्टील प्लांट का विरोध कर रहे लोगों के मानवाधिकारों की सुरक्षा की मांग की गयी थी।

कोर्ट ने जगतसिंहपुर जिला प्रशासन को सभी आवश्यक व्यवस्था करने का आदेश दिया था ताकि पंचायत के लोग बिना किसी भय और दबाव के समिति के समक्ष जेएसडब्ल्यू परियोजना पर अपने विचार व्यक्त कर सकें। मेधा पाटकर, पहले कुजंगा उप-जेल में देवेंद्र से मिलीं, उसके बाद वह देवेंद्र के परिवार से मिलने के लिए ढिंकिया चली गयीं। बस, बात गांव वालों और अन्य लोगों समेत जब जेएसडब्ल्यू परियोजना के समर्थकों को पता चली वैसे ही मेधा पाटकर का विरोध शुरू हो गया। ऐसे में मेधा पाटकर को उनके साथ आए लोगों के साथ विरोध स्थल से लौटना पड़ा क्योंकि ग्रामीणों ने ढिंकिया में उनके प्रवेश को रोक दिया, जो दक्षिण कोरियाई स्टील प्रमुख पोस्को के खिलाफ विस्थापन विरोधी आंदोलन का केंद्र भी है।

यह घनघोर बेइज़्ज़ती यूंही नहीं मेधा के हिस्से आयी बल्कि पूर्व में किये गये कर्मकांड मेधा पाटकर की ऐसी छवि बना चुके हैं कि अब कोई भी आंदोलन मेधा की उपस्थिति चाहता ही नहीं है। चूंकि नर्मदा बचाओ आंदोलन की संस्थापक इन्हीं मेधा पाटकर के कारणवश “सरदार सरोवर बांध” के पानी को सही समय पर लोगों तक नहीं पहुंचने दिया। सरदार सरोवर बांध से बहुत लोगों का जनजीवन प्रभावित था पर एजेंडाधारी सामाजिक कार्यकर्ता के कारण लोग बांध के पानी से लंबे समय तक वंचित रहे।

जब आपके अपने बिरादरी वाले तक आप पर विश्वास करना छोड़ दे तो समझ जाना चाहिए कि आपका समय अब खत्म हो चुका है, समझ जाना चाहिए कि अब आपकी कोई औकात नहीं है। इसके बाद भी कुछ नादान परिंदे हैं जिनको मेधा पाटकर जैसों में अपना मसीहा दिखता है। अब ऐसे लोगों का ईश्वर ही भला करे।

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