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क्या सिंधिया [शिंदे] परिवार वास्तव में उतने बुरे थे?

हर सिक्के की भांति इस कथा के भी दो पहलू हैं...

Animesh Pandey द्वारा Animesh Pandey
6 April 2023
in इतिहास
सिंधिया परिवार
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“अंग्रेज़ों के मित्र सिंधिया ने छोड़ी रजधानी थी”

“झांसी की रानी” नामक कविता में जब इस छंद का उल्लेख होता है, तो अनवरत ही ग्वालियर की शिंदेशाही की ओर ध्यान जाता है, जिनका आज भी भारत के इतिहास एवं राजनीति में एक महत्वपूर्ण प्रभाव है। इस छंद का ऐसा प्रभाव रहा कि कई लोग आज भी सिंधिया [शिंदे] परिवार को संदेह की दृष्टि से देखते  हैं। परंतु क्या शिंदे प्रारंभ से ही साम्राज्यवादी समर्थक थे?

इस लेख में पढिये उस सिंधिया [शिंदे] परिवार के बारे में , जिसके सम्पूर्ण सत्य से अभी भी भारत अपरिचित है, और जिन्हे सम्पूर्ण न्याय नहीं दिया गया।

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सिंधिया [शिंदे] परिवार परिवार का इतिहास

सत्य के अनेक रूप होते हैं, अंतर इस बात से पड़ता है कि आप कौन सा रूप जाने हैं और देखे हैं। भारतीय संस्कृति के पुनरुत्थान में रानोजी शिंदे की उतनी ही बड़ी भूमिका है, जितनी होल्कर और अन्य मराठाओं की। जब पेशवा बाजीराव ने शासन किया, तो उन्होंने यशस्वी और युवा योद्धाओं एवं सलाहकारों को अपने मंत्रिमंडल में नियुक्त किया, ताकि छत्रपति और पेशवा के बीच में जो उच्चाधिकारी यानि nobility बाधा समान थी, उसे नियंत्रित किया जा सके।

इसी बीच उदय हुआ रानोजी शिंदे का, जिन्हे मल्हार राव होल्कर के साथ मिलकर मालवा एवं मध्य भारत के अन्य प्रांतों से “चौथ” यानि कर वसूलना प्रारंभ किया। धीरे धीरे इनके परिवार का इतना प्रभाव बढ़ा, कि वे मराठा सेना के विभिन्न युद्धों में भी सम्मिलित हुए। इसमें दत्ताजी शिंदे भी प्रमुख थे, जिन्होंने उत्तर भारत में मराठा साम्राज्य की सीमाओं का विस्तार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। परंतु 1760 में पहले इनकी हत्या, और पानीपत के तृतीय युद्ध में जानकोजी शिंदे के वीरगति को प्राप्त होने से शिंदेशाही परिवार को काफी नुकसान हुआ।

परंतु शीघ्र ही एक योद्धा सिंधिया [शिंदे] परिवार एवं हिंदवी स्वराज्य की प्रतिष्ठा को पुनर्स्थापित करने हेतु उठ खड़े हुए। इनका नाम था महादजी शिंदे, और ये पानीपत के तृतीय युद्ध के उन चंद योद्धाओं में सम्मिलित थे, जिन्होंने भाग भी लिया, और वे इस युद्ध में चोटिल भी हुए। उन्होंने मराठाओं के गौरव को मिट्टी में मिलते हुए करीब से देखा था, और इसीलिए वे आयुपर्यंत मराठा गौरव को पुनर्स्थापित करने हेतु लड़ते रहे। उनके रहते अंग्रेज़ बंगाल से आगे ही नहीं बढ़ पाए, और उन्ही के रहते मैसूर के सुल्तान हैदर अली और उसके कट्टरपंथी पुत्र फतेह अली खान [जिसे इतिहास टीपू सुल्तान के नाम से बेहतर जानता है] की हेकड़ी को केवल उसी क्षेत्र तक सीमित रखा।

और पढ़ें: रघुनाथ राव और माधवराव के बीच वह “महाभारत”, जिसे रोका जा सकता था

1857 का वो महत्वपूर्ण युग….

जब महादजी शिंदे का निधन, तब तक अंग्रेज़ों की बढ़ती सक्रियता के बाद भी भारत में मराठा साम्राज्य सबसे शक्तिशाली और स्वतंत्र था। परंतु जो प्रयास पेशवा माधवराव, स्वयं महादजी और नाना फड़नवीस जैसे लोगों ने किये थे, वे अक्षुण्ण नहीं रह पाए और 19वीं सदी के प्रारंभ तक मराठा भी दुर्बल होने लगे।

इसी बीच जब 1857 का विद्रोह भड़का, तो शिंदे शाही केवल ग्वालियर तक सीमित था। उस समय जयाजीराव सिंधिया [शिंदे] का शासन था। वे अपने पूर्वजों जितने सशक्त नहीं थे, परंतु अंग्रेज़ों के साथ बहुत अधिक मित्रता भी नहीं रखना चाहते थे। वे एक समय चाहते थे कि अंग्रेज़ों से भिड़े, परंतु उनके मंत्री दिनकर राव ने उन्हे निष्पक्ष रहने का सुझाव दिया।

और पढ़ें: “द लास्ट स्टैंड ऑफ द मराठास: नाना फडणवीस का अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष”

एक भूल का इतना बड़ा दंड?

इसी बात को “अंग्रेज़ों से मित्रता” के रूप में भ्रमित किया गया, जिसने युद्ध से पूर्व सिंधिया द्वारा ग्वालियर छोड़ने की घटना ने अधिक बल दिया, परंतु जयाजीराव सिंधिया ने क्यों राजधानी छोड़ी, यह आज भी रहस्य है। ये घटना जाने अनजाने मेवाड़ और कश्मीर प्रांतों की दुविधा स्मरण कराता है, जहां पूर्व में आक्रान्ताओं के विरुद्ध जमकर युद्ध होते थे, परंतु जब समस्या सिर पे आई, तो उक्त शासक बगलें झाँकने लगे। ये नासमझी कही जा सकती है, परंतु विश्वासघात कहना काफी अनुचित होगा।

जयाजीराव ने जो किया सो किया, परंतु 1857 में केवल वही एक नहीं थे, जो ऐसे पसोपेश में उलझे थे। बहुत ही काम प्रांत या क्षेत्र ऐसे थे, जिन्होंने मुखर तौर पर क्रांतिकारियों का साथ दिया। हर कोई स्वेच्छा से तो पंजाब, बंगाल या हैदराबाद की भांति अंग्रेज़ों का समर्थक नहीं बना था। परंतु अन्य राजपरिवारों या प्रांतों की तुलना में ग्वालियर के सिंधिया [शिंदे] परिवार को अपनी प्रतिष्ठा पुनर्स्थापित करने में काफी समय लग गया।

और पढ़ें: “द लास्ट स्टैंड ऑफ द मराठास: नाना फडणवीस का अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष”

प्रारंभ तो विजयाराजे सिंधिया से ही हुआ था, जो कांग्रेस के रंग रूप पहचान चुकी थी, और उन्होंने श्यामा प्रसाद मुखर्जी को अपना स्पष्ट समर्थन दिया, जिनके साथ मिलकर भारतीय जनसंघ की स्थापना की गई, जिनके आदर्शों पर आज भारतीय जनता पार्टी चलने का दावा करती है। माधवराव सिंधिया और वसुंधरा राजे को छोड़ दें, तो ज्योतिरादित्य सिंधिया भी ग्वालियर के सिंधिया [शिंदे] परिवार की प्रतिष्ठा को पुनर्स्थापित करने में जुट गये है, और शिंदे परिवार का प्रभाव अब भी भारत पर विद्यमान रहेगा।

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