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जब उल्काएं थीं दीप, और दीप थे उत्सव: यहां जानें, क्यों आतिशबाज़ी भारतीय परंपरा का हिस्सा है, आयातित नहीं?

जो लोग पटाखों में प्रदूषण देखते हैं, वे शायद उस रोशनी का इतिहास नहीं जानते जिसने अंधकार युगों में भी भारत को आलोकित रखा।

Vibhuti Ranjan द्वारा Vibhuti Ranjan
22 October 2025
in इतिहास, ज्ञान, धर्म, पर्यावरण, फैक्ट चेक, भारत, विश्व, संस्कृति
जब उल्काएं थीं दीप, और दीप थे उत्सव: यहां जानें, क्यों आतिशबाज़ी भारतीय परंपरा का हिस्सा है, आयातित नहीं?

यानी दिवाली सिर्फ दीपोत्सव भर नहीं है, दिवाली आनंदोत्सव भी है।

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दिवाली की अगली सुबह आए अख़बारों में जो ख़बर पहले पेज में सबसे प्रमुखता के साथ छपी है, उसके अनुसार दिल्ली देश का ही नहीं दुनिया का सबसे प्रदूषित शहर है।
वैसे ये आम ट्रेंड बन चुका है- दिवाली के बाद अखबारों की पहली ख़बर AQI का बढ़ता स्तर और उसके लिए पटाख़ों को ज़िम्मेदार ठहराने से संबंधित ही होती है। टीवी चैनल्स की हेडलाइन और सोशल मीडिया भी दिवाली से पहले और बाद की तस्वीरें पोस्ट कर यही बताने की कोशिश की जाती है कि पटाखों की वजह से दिल्ली की हवा कितनी ज़हरीली हो गई और हिंदुओं की आतिशबाजी को लेकर अति उत्साह और अति सक्रियता का खामियाजा सभी लोगों को दमघोंटू हवा के रूप में भुगतना पड़ रहा है।

इसी के साथ ये चर्चा भी शुरू हो गई है कि क्या आतिशबाजी भारतीय प्राचीन परंपरा का हिस्सा है भी या नहीं? ज़्यादातर विद्वान दिवाली के अवसर पर पटाख़ों के इस्तेमाल की आलोचना करते हुए इसे आयातित परंपरा बताते हैं। ऐसी परंपरा जो मुख्यतः मुग़लों के साथ भारत में आई। 

पटाखे प्रदूषण के लिए कितना ज़िम्मेदार हैं, ये वैज्ञानिक शोध का विषय हैं, लेकिन यहां हम पटाखों और प्रदूषण की नहीं, बल्कि आतिशबाजी और उसके प्राचीन भारतीय परंपरा से संबंध पर प्रकाश डालेंगे।

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इसके लिए हमने कई ऐतिहासिक स्रोत खंगाले, कई पौराणिक ग्रंथों के पन्ने उलटे और कई इतिहासकारों से बात की तो एक अलग तस्वीर सामने आई- क्योंकि आप ये जान कर हैरान होंगे कि हमारे पूर्वजों को सदियों से पटाख़ों या आतिशबाज़ी जैसी विधियों का ज्ञान था और स्कंद पुराण जैसे ग्रंथ में भी दिवाली के दौरान आतिशबाज़ी का ऐतिहासिक रूप से वर्णन मिलता है।

बारूद और उसका इतिहास-सच क्या कहता है ?

बहुतों की तरह यह मान लेना कि बारूद और आतिशबाज़ी भारत में चीन के रास्ते मुग़लों के ज़रिए आई- तो ये पूरी तरह सही नहीं है। यह कहा जाता है कि बारूद 9वीं सदी में चीन में खोजा गया। मगर चीनी स्रोत खुद बताते हैं कि लगभग 664 ईस्वी के आसपास एक भारतीय भिक्षु वहां पहुँचा था और उसने नमक (सल्फेट) जैसी मिट्टी से प्रयोग कर कुछ प्रयोग किए— जिससे बारूद का विकास संभव हुआ। बहरहाल पश्चिमी विद्वान रॉजर पॉली भी मानते हैं कि बारूद की खोज में भारतीय प्रेरणा की भूमिका रही। भारत में भी अति-प्राचीन ग्रंथों में ऐसे कई साक्ष्य मिलते हैं- जिनसे पता चलता है कि उस समय भी लोग बारूद जैसे विस्फोटकों से न सिर्फ परिचित थे, बल्कि उनका प्रयोग भी करते थे।

कौटिल्य के अर्थशास्त्र का ज़िक्र

कौटिल्य के अर्थशास्त्र में भी पटाखों और बारूद जैसी चीज़ का जिक्र है। यहां वो कई तरह के आग्नेयास्त्रों का जिक्र करते हैं। खास कर ऐसे हथियार जिनसे धुआं पैदा होता है, इसमें वो बारूद जैसे मिश्रणों (शोरा, गंधक, कई प्रकार के तेल का उल्लेख करते हैं। जिन्हे अगर सही अनुपात में मिलाया जाए तो विस्फोट के साथ धुआँ और आग पैदा हो सकती है। वो लिखते हैं कि “सरसों, गोबर, घी और शोरा” के मिश्रण से ऐसा धुआँ बनता है, जो शत्रु को अंधा कर देता है।
इसी प्रकार वैशम्पायन कृत महाभारत में भी वैशम्पायन ऋषि ने धुएँ वाले गोले (स्मोक बॉल्स) बनाने और उनके इस्तेमाल का भी वर्णन किया है। इनसे स्पष्ट होता है कि हमारे पूर्वजों को रसायन-ज्ञान का अच्छा ज्ञान था और वे ऐसे तत्वों का प्रयोग रक्षा या उत्सव दोनों में करते थे।
बोगर सिद्ध के ग्रंथ बोगर सतकंडम में भी शोरा से एक द्रव्य वेदियुप्पु चेयनिर बनाने का वर्णन है — इसमें जो विधि बताई गई है वो काफी हद तक पटाखे बनाने की विधि से ही मेल खाती है।

स्थानीय परंपराएँ और भाषा-साक्ष्य

तमिलनाडु के शिवकाशी को पटाखों की नगरी कहा जाता है। पटाखे बनाने की सबसे ज्यादा फैक्ट्रियां यहीं स्थित हैं। शिवकाशी और आंध्र प्रदेश के कई हिस्सों में आज भी पटाखे बनाने के लिए पारंपरिक विधियों का इस्तेमाल किया जाता है। इनमें विस्फोटक बनाने के लिए गंधक, शोरा और रेत का प्रयोग होता है। यहाँ शोरा के लिए संस्कृत शब्द सूर्यकार का प्रयोग होता है, न कि फारसी शब्द शोरा। यह भाषा-साक्ष्य बताता है कि यह ज्ञान फारस या किसी बाहरी राष्ट्र से आयातित नहीं था, बल्कि इसे स्थानीय रूप से विकसित किया गया था।

दिवाली और आतिशबाज़ी के पौराणिक साक्ष्य

स्कंद पुराण (वैष्णव खंड)
इसी प्रकार दिवाली के अवसर पर पटाख़ों या आतिशबाज़ी के प्रयोग के भी ऐतिहासिक वर्णन हैं। स्कंद पुराण 18 पुराणों में प्रमुख स्थान रखता है। स्कंद पुराण के वैष्णव खंड में दिवाली का भी वर्णन किया गया है। इसमें बताया गया है कि दीपावली के दिन भक्तों को भगवान विष्णु की आराधना करनी चाहिए। स्कंद पुराण के अनुसार इस दिन अमावस की रात्रि पूर्वज (पितृ) स्वर्ग लोग से पृथ्वी लोक में आते हैं (उल्काओं के रूप में ) ऐसे में उनको रास्ता दिखाने के लिए दीप जलाने चाहिए साथ ही “उल्का” यानी अग्नि की मशाल हाथ में लेकर उत्सव मनाना चाहिए। ऐसी मशालें जिनमें लपट और चमक हो, साथ ही जो प्रकाश के साथ ध्वनि भी निकालती हों। इन उल्काओं को भी पटाख़ों के रूप में ही देखा गया।

आनंद रामायण में आतिशबाजी का उल्लेख

इसी प्रकार 15 वीं सदी में लिखी गई आनंद रामायण में भी दीवाली के समय रोशनी, आवाज़ और अग्नि से उत्सव मनाए जाने का ज़िक्र है। आनंद रामायण का रचनाकाल तुलसीदास कृत रामचरितमानस के समकालीन ही माना जाता है।

श्रीकृष्ण- रुक्मणी विवाह में फुलझड़ी का वर्णन

इसी प्रकार 16वीं सदी में महान संत हुए हैं- संत एकनाथ। उन्होने भी ने भी श्रीकृष्ण और रुक्मिणी के विवाह में आग्नेय यंत्रों और फुलझड़ी जैसे पटाखों का वर्णन किया है। दिलचस्प बात तो ये है कि उन्होने विशेषकर हाथ में लेकर चलाए जाने वाले पटाखे, जिससे फूल जैसा प्रकाश झरता है, उसका उल्लेख किया है। उन्होने इस पटाखे का नाम ‘फुलझड़ी’ बताया है। फुलझड़ी आज भी सबसे प्रचलित पटाखों में से एक है।

गुरु समर्थ रामदास ने भी अपने ग्रंथों में फुल, घोष जैसे पटाखों का उल्लेख किया है। यानी रौशनी देने वाले पटाखे ‘फुल’ और आवाज़ करने वाले ‘घोष’।

प्राचीन भित्तिचित्रों में आतिशबाजी के प्रतीक चिह्न

सिर्फ ग्रंथों और साहित्य में ही नहीं- आतिशबाजी के प्रयोग के कई अन्य प्रतीक भी मिलते हैं। कई मंदिरों के चित्रों और भित्ति चित्रों में फुलझड़ियां दिखाई गई हैं। 
तमिल नाडु के थ्यागाराज मंदिर में जो चित्रकारी की गई है, वहां भी दिवाली उत्सव और आतिशबाजी जैसे दृश्य मिलते हैं। ये भित्ति चित्र 9वीं सदी के बताए जाते हैं, तब तक भारत में मुग़लों का आगमन भी नहीं हुआ था। भारत में मुग़लों का आगमन ही 13-14 वीं सदी के आसपास शुरू होता है।

दिवाली आस्था का पर्व ही नहीं आनंदोत्सव भी है- आतिशबाजी उसी उल्लास का प्रतीक है

यानी दिवाली सिर्फ दीपोत्सव भर नहीं है, दिवाली आनंदोत्सव भी है। दिवाली उल्लास का पर्व है- राजा राम के अपने नगर लौटने और उससे उपजे आनंद, हर्ष और उत्साह का पर्व है। ये पर्व सनातनी आस्था के साथ उत्साह, प्रकृति के प्रति कृतज्ञता के भाव व्यक्त करने का पर्व है। स्वाभाविक सी बात है प्रसन्नता, उत्साह और उल्लास को प्रकट करने का जो भी धार्मिक रूप हो सकता है, वही दिवाली है। 
हमारे पूर्वजों ने दीप जलाकर और आतिशबाजी चला कर प्रभु की नगर वापसी को त्योहार में बदल दिया और वही परंपरा आज भी जीवित है। 
हां- आधुनिकता के दौर में इसमें बदलाव भी हुए हैं। आतिशबाज़ी का प्रयोग कहीं अधिक विस्तृत और स्वीकार्य हुआ है। लेकिन ये कहना कि आतिशबाजी एक जोड़ी हुई परंपरा है और दिवाली का इससे कोई संबंध नहीं या फिर ये दिवाली जैसे पर्व में इस्लामी प्रभाव का प्रतीक है- तो ये अनुचित है।
अनेकों साक्ष्य हैं जो ये बताते हैं कि बारूद का जन्म भले ही चीन में हुआ हो, लेकिन मिलती जुलती विधियों से पटाख़े भारत में पहले भी बनाए जाते थे और आतिशबाजी भी की जाती थी।

Tags: DiwaliFireworksHistory of FireworksIndiaIndian TraditionPollutionआतिशबाजीआतिशबाजी का इतिहासदीपावलीप्रदूषणभारतभारतीय परंपरा
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