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बंदूक से आगे की लड़ाई  ‘दिमागी नक्सल’ और राष्ट्र को दिग्भ्रमित करने वाले नैरेटिव का खेल

Chandra Shekhar Patel द्वारा Chandra Shekhar Patel
22 August 2026
in चर्चित, मत
दिमागी नक्सल

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 15 अगस्त को लाल किले से अपने भाषण में दिमागी नक्सल का जिक्र किया था

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स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का संबोधन केवल सरकार की उपलब्धियों का लेखा–जोखा नहीं होता। वह देश की दिशा, चुनौतियों और आने वाले भारत की प्राथमिकताओं का राजनीतिक एवं वैचारिक संकेत भी देता है।
15
अगस्त 2026 के संबोधन में प्रधानमंत्री द्वारा नक्सलवाद के संदर्भ में इस्तेमाल किया गया “दिमागी नक्सल” शब्द इसी दृष्टि से गंभीर चर्चा की मांग करता है।प्रधानमंत्री ने कहा कि जंगलों में बंदूक लेकर चलने वाला नक्सलवाद अब अपनी अंतिम सांसें गिन रहा है, लेकिन नक्सली विचारधारा को वैचारिक समर्थन देने वाले तत्वों के प्रति देश को सजग रहना होगा। उन्होंने ऐसे तत्वों को पहचानने और अलग–थलग करने की बात कही।

यहां मूल प्रश्न यह नहीं है कि “दिमागी नक्सल” शब्द किस राजनीतिक दल को अच्छा लगा या किसे बुरा। असली प्रश्न यह है कि क्या किसी हिंसक विचारधारा का मुकाबला केवल उसके हथियारबंद स्वरूप को समाप्त करके किया जा सकता है?उत्तर है ,नहीं;  क्योंकि इतिहास गवाह है कि बंदूक को हराना अपेक्षाकृत आसान है, लेकिन उस विचार को हराना अधिक कठिन है जो बंदूक को सही ठहराता है।

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नक्सलवाद का पुराना चेहरा जंगलों में दिखाई देता था हथियार, बारूदी सुरंगें, हिंसा और भय। लेकिन किसी भी हिंसक विचारधारा की वास्तविक ताकत केवल उसके हथियारों में नहीं होती। उसकी असली ताकत उस नैरेटिव में होती है, जो समाज के किसी वर्ग में यह विश्वास पैदा करता है कि व्यवस्था अन्यायपूर्ण है, लोकतांत्रिक रास्ते निष्प्रभावी हैं और हिंसक संघर्ष ही परिवर्तन का एकमात्र रास्ता है।यही वह जगह है जहां “दिमागी नक्सल” की अवधारणा को समझना आवश्यक हो जाता है। हालांकि यह स्पष्ट रहना चाहिए कि “दिमागी नक्सल” कोई कानूनी अथवा वैज्ञानिक श्रेणी नहीं है। किसी सरकार की आलोचना करना, किसी नीति से असहमति रखना, विश्वविद्यालय में बहस करना, पत्रकारिता में सवाल उठाना या लोकतांत्रिक आंदोलन करना नक्सलवाद नहीं है। लेकिन यदि कोई व्यक्ति या संगठित नेटवर्क जानबूझकर हिंसक उग्रवाद को वैचारिक वैधता देता है, लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति योजनाबद्ध अविश्वास पैदा करता है, तथ्य और भ्रम को मिलाकर सामाजिक विभाजन बढ़ाता है अथवा युवाओं को संवैधानिक व्यवस्था के विरुद्ध हिंसक रास्ते की ओर धकेलता है, तो उसके तौर–तरीकों और उसके नैरेटिव की गंभीरता से पड़ताल आवश्यक है।क्योंकि आज की दुनिया में युद्ध केवल सीमा पर नहीं लड़े जाते। युद्ध दिमाग में भी लड़े जाते हैं।

यदि दिमागी नक्सल को एक राजनीतिक विमर्श के रुपक के रूप मे समझें तो उनके लक्षण क्या हो सकते हैं? सबसे पहला लक्षण है हिंसा और लोकतांत्रिक व्यवस्था के बीच नैतिक अंतर को मिटा देना। यदि निर्दोषों की हत्या, सुरक्षा बलों पर हमले या हथियारबंद विद्रोह को लगातार “क्रांति”, “मजबूरी” या “जनप्रतिरोध” जैसे शब्दों से उचित ठहराया जाए, तो यह केवल राजनीतिक मत नहीं रह जाता। यह हिंसा के लिए वैचारिक जमीन तैयार करने का प्रयास बन सकता है।दूसरा लक्षण है हर लोकतांत्रिक संस्था को अविश्वसनीय सिद्ध करने का लगातार प्रयास। सरकार गलत हो सकती है। न्यायपालिका के किसी निर्णय की आलोचना हो सकती है। चुनाव आयोग, मीडिया, संसद या विश्वविद्यालयों की आलोचना भी लोकतंत्र का हिस्सा है। लेकिन जब एक नैरेटिव में सेना, पुलिस, न्यायपालिका, संसद, चुनाव आयोग, मीडिया और लोकतांत्रिक संस्थाओं सभी को एक साथ षड्यंत्रकारी बताने की प्रवृत्ति पैदा हो, तो प्रश्न उठता है कि क्या उद्देश्य केवल आलोचना है या संस्थागत विश्वास को कमजोर करना भी? तीसरा लक्षण है आधे सत्य को पूर्ण सत्य बनाकर प्रस्तुत करना।आधुनिक प्रोपेगेंडा का यह सबसे प्रभावी हथियार है। पूरी तरह झूठी बात कई बार आसानी से पकड़ी जाती है, लेकिन आधा सच अधिक खतरनाक होता है। उसमें तथ्य का एक टुकड़ा होता है, संदर्भ हटा दिया जाता है, भावनात्मक शीर्षक लगाया जाता है और फिर उसे बार–बार दोहराया जाता है।चौथा लक्षण है हर घटना को ऐसे फ्रेम करना जिसमें राष्ट्र हमेशा अपराधी और हिंसक तत्व हमेशा पीड़ित दिखाई दें।आतंकवादी “आतंकवादी” नहीं, “विद्रोही” बन जाता है।हत्यारा “क्रांतिकारी” बन जाता है।सुरक्षा बल “दमनकारी शक्ति” बन जाते हैं।राज्य की कार्रवाई “अत्याचार” कहलाती है, और हिंसा में मारे गए सामान्य नागरिक कहानी से गायब हो जाते हैं। यह केवल शब्दों का परिवर्तन नहीं है। यह नैतिक दृष्टिकोण बदलने का प्रयास है।पांचवां लक्षण है युवाओं की वास्तविक समस्याओं को व्यवस्था के प्रति स्थायी घृणा में बदल देना।बेरोजगारी, गरीबी, भ्रष्टाचार, शिक्षा, सामाजिक असमानता और अवसरों की कमी वास्तविक समस्याएं हैं। इनके खिलाफ प्रश्न उठाना लोकतंत्र की आवश्यकता है। लेकिन जब इन्हीं समस्याओं के आधार पर युवाओं से कहा जाए कि “पूरी व्यवस्था ही दुश्मन है”, “लोकतंत्र से कुछ नहीं बदल सकता” और परिवर्तन का एकमात्र रास्ता हिंसक संघर्ष है, तब समस्या गंभीर हो जाती है। यही वह बिंदु है जहां प्रधानमंत्री के “दिमागी नक्सल” वाले वक्तव्य को समझना आवश्यक हो जाता है।

दिमागी नक्सल की अवधारणा को इसी व्यापक संदर्भ में समझना होगा। दुनिया ने इस नैरेटिव युद्ध को कई रूपों में देखा है आज वैचारिक संघर्ष केवल सभागारों, विश्वविद्यालयों, समाचार–पत्रों और पुस्तकों तक सीमित नहीं है। उसका एक बड़ा मैदान हमारे मोबाइल फोन की स्क्रीन बन चुका है। सोशल मीडिया ने लोकतांत्रिक संवाद को अभूतपूर्व विस्तार दिया है, लेकिन इसी के साथ एक ऐसी चुनौती भी सामने आई है जिसे दुनिया के प्रमुख शोध संस्थानों ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के ऑक्सफोर्ड इंटरनेट इंस्टिट्यूट (OII) और उसके  computational propaganda प्रोजेक्ट ने algorithms, automation, big data तथा सोशल मीडिया के माध्यम से जनमत को प्रभावित करने वाली संगठित गतिविधियों का वर्षों अध्ययन किया है  संगठित सोशल मीडिया हेरफेर के प्रमाण दर्ज किए और यहीं से लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ी चुनौती पैदा होती है। इस संदर्भ में भी  “दिमागी नक्सल” जैसे शब्दों पर भी गंभीरता से विचार करना चाहिए।

यदि इस शब्द का अर्थ ऐसे संगठित वैचारिक प्रभाव, प्रचार–तंत्र या डिजिटल अभियानों की ओर संकेत करना है जो लोकतांत्रिक संस्थाओं, सामाजिक विश्वास और राष्ट्रीय एकता को कमजोर करने के उद्देश्य से सूचना–युद्ध चलाते हैं, तो उस घटनाक्रम का अध्ययन भावनात्मक नारों से नहीं बल्कि प्रमाण, शोध और तथ्यों के आधार पर होना चाहिए।  यही आधुनिक नैरेटिव युद्ध की सबसे खतरनाक विशेषता है । वह हमेशा झूठ से शुरू नहीं होता,वह कई बार सच के चयन से शुरू होता है।एक वास्तविक घटना चुनिए, उसमें से केवल अपने उद्देश्य के अनुकूल तथ्य निकालिए।उसमें भावनात्मक भाषा जोड़िए। पुराना वीडियो या दूसरे देश की तस्वीर जोड़ दीजिए। फिर उसे हजारों सोशल मीडिया एकाउंट्स से बार-बार पोस्ट करवाइए।कुछ प्रभावशाली लोग भी उसे उठा लें। मुख्यधारा मीडिया उस विवाद को कवर करे और अंततः लोग मूल घटना और उससे निर्मित धारणा के बीच अंतर करना भूल जाएं। यही नैरेटिव निर्माण का चक्र है। नैरेटिव समाज को ऐसे ही दिग्भ्रमित करता है।
   नैरेटिव युद्ध का पहला चरण होता है भ्रम।
दूसरा – अविश्वास
तीसरा – क्रोध
चौथा – ध्रुवीकरण
और पांचवां संस्थाओं से विमुखता

पहले कहा जाता है“आपको पूरी सच्चाई नहीं बताई जा रही। ”फिर“मीडिया झूठ बोल रहा है।”फिर“सरकार झूठ बोल रही है।”फिर“न्यायपालिका भी उनके साथ है।”और अंततः“किसी संस्था पर विश्वास मत करो।”जब समाज इस अवस्था में पहुंचता है तो लोकतंत्र की सबसे बड़ी पूंजी- यानी विश्वास कमजोर होने लगता है।यही कारण है कि आज राष्ट्रीय सुरक्षा केवल टैंक, मिसाइल, सीमा और सैनिकों का विषय नहीं रह गई है। राष्ट्रीय सुरक्षा का एक बड़ा हिस्सा सूचना की विश्वसनीयता और नागरिकों की विवेकशीलता से जुड़ चुका है।

भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। यहां करोड़ों लोग अलग–अलग विचार रखते हैं। सरकारें बदलती हैं, राजनीतिक दल सत्ता में आते–जाते हैं, आंदोलन होते हैं, विश्वविद्यालयों में बहस होती है, मीडिया सरकार पर सवाल उठाता है और नागरिक अदालतों में सरकार के फैसलों को चुनौती देते हैं| यह कमजोरी नहीं, भारत की शक्ति है। सरकार की आलोचना दिमागी नक्सल नहीं। नीतियों का विरोध दिमागी नक्सल नहीं। सत्ता से असहमति दिमागी नक्सल नहीं। पत्रकारिता में प्रश्न दिमागी नक्सल नहीं। लेकिन हिंसक उग्रवाद को वैध ठहराना, जानबूझकर झूठे नैरेटिव से सामाजिक अशांति पैदा करना, युवाओं को लोकतांत्रिक व्यवस्था के विरुद्ध हिंसा के लिए प्रेरित करना अथवा संगठित सूचना अभियानों के माध्यम से देश के भीतर अविश्वास बढ़ाना इन सबकी गंभीर जांच आवश्यक है।यही संतुलन लोकतंत्र को भी बचाएगा और राष्ट्र को भी।भारत को उत्तर क्या देना चाहिए?

इसका उत्तर केवल सेंसरशिप नहीं है। इसका उत्तर है सत्य की गति को झूठ से तेज करना। सरकार को तथ्य तुरंत सार्वजनिक करने होंगे।मीडिया को सनसनी से अधिक सत्य को महत्व देना होगा। विश्वविद्यालयों को युवाओं में आलोचनात्मक चिंतन विकसित करना होगा।परिवारों को डिजिटल साक्षरता बढ़ानी होगी और नागरिकों को हर वायरल वीडियो को सत्य मानने से पहले पूछना होगा ,स्रोत क्या है? समय क्या है? पूरा संदर्भ क्या है? क्या स्वतंत्र स्रोत भी यही बात कह रहा है? क्या यह सूचना मुझे तथ्य दे रही है या केवल गुस्सा दिला रही है? क्योंकि जिस सूचना को पढ़कर हमारा विवेक समाप्त हो जाए और केवल क्रोध बच जाए, वहां हमें सबसे अधिक सावधान होना चाहिए।

भारत को ऐसा नागरिक चाहिए जो सरकार से प्रश्न पूछे, लेकिन राष्ट्र पर विश्वास रखे। जो सत्ता की आलोचना करे, लेकिन संविधान की मर्यादा समझे।जो सामाजिक अन्याय के खिलाफ आवाज उठाए, लेकिन हिंसा को समाधान न माने। जो दुनिया के किसी भी देश की अच्छी बात सीखे, लेकिन अपने देश के खिलाफ चलने वाले छलपूर्ण नैरेटिव को पहचान सके और सबसे महत्वपूर्ण जो किसी भी विचार को केवल इसलिए स्वीकार न करे क्योंकि उसे हजारों बार दोहराया गया है। भारत की नई पीढ़ी को “नैरेटिव का उपभोक्ता” नहीं, “सत्य का विवेकशील परीक्षक” बनना होगा। क्योंकि आने वाले वर्षों में संघर्ष केवल जमीन के लिए नहीं होगा। संघर्ष कहानी पर नियंत्रण के लिए भी होगा। कौन पीड़ित है? कौन अपराधी है? कौन देशभक्त है? कौन अत्याचारी है? किसे न्याय मिला? किसे नहीं मिला? इन प्रश्नों के उत्तर जिस समाज की सामूहिक चेतना तय करती है, उसकी दिशा भी वही तय करता है।
इसलिए प्रधानमंत्री मोदी के “दिमागी नक्सल” वाले बयान के पीछे छिपे बड़े प्रश्न को नजरअंदाज करना भारत के लिए उचित नहीं होगा।बंदूक वाले नक्सलवाद से लड़ना सुरक्षा बलों का काम है लेकिन उस विचार को परास्त करना, जो बंदूक को उचित ठहराता है, पूरे समाज की जिम्मेदारी है।और इस लड़ाई में सबसे बड़ा हथियार कोई कानून, कोई प्रचार या कोई राजनीतिक नारा नहीं ,सबसे बड़ा हथियार है सत्य।

सत्य के साथ विवेक,विवेक के साथ संविधान और संविधान के साथ राष्ट्र के प्रति अटूट विश्वास। यही वह त्रिशक्ति है जो भारत को न केवल नक्सलवाद से, बल्कि हर उस नैरेटिव से बचा सकती है जो भारत को भीतर से कमजोर, निराश और दिग्भ्रमित करना चाहता है।क्योंकि देश पहले सीमाओं पर नहीं टूटता ,देश पहले मन और मस्तिष्क में हारता है। और जो राष्ट्र अपने नागरिकों के विवेक को जागृत रखता है, उसे कोई भी नैरेटिव लंबे समय तक पराजित नहीं कर सकता। क्योंकि बंदूक को पराजित करना एक सुरक्षा चुनौती है, लेकिन उस विचार को पराजित करना जो बंदूक को सही ठहराता है, उससे कहीं बड़ी वैचारिक चुनौती है।

युवा के हाथ में प्रश्न होना चाहिए, पत्थर नहीं। युवा के सामने अवसर होना चाहिए, हिंसक क्रांति का भ्रम नहीं।

क्योंकि आज की दुनिया में युद्ध केवल सीमा पर नहीं लड़े जाते। युद्ध मन और मस्तिष्क में भी लड़े जाते हैं।

Tags: अर्बन नक्सलीदिमागी नक्सलनैरेटिव वॉरप्रधानमंत्री मोदीमाओवादलाल किला भाषण
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