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जनआंदोलन के बाद ‘जनादेश’ की बारी: नेपाल की राजनीतिक संरचना की निर्णायक परीक्षा



नेपाल ने 2008 में ख़ुद को लोकतांत्रिक गणराज्य घोषित किया था, इन 18 वर्षों में नेपाल की जनता 14 प्रधानमंत्री देख चुकी है, लेकिन इस बार जनता सिर्फ प्रधानमंत्री नहीं तस्वीर बदलना चाहती है- क्या उसे विकल्प मिलेगा?

Anshuman द्वारा Anshuman
18 February 2026
in भारत, राजनीति
नेपाल एक बार फिर जनरेशन Z यानी युवाओं के नेतृत्व में

नेपाल एक बार फिर जनरेशन Z यानी युवाओं के नेतृत्व में

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नेपाल एक बार फिर जनरेशन Z यानी युवाओं के नेतृत्व में हुए व्यापक प्रदर्शनों के पाँच महीने बाद निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। पूरी दुनिया ने देखा कि कैसे इन प्रदर्शनों ने देश की राजनीति की जड़ें हिला दी थीं और तत्कालीन प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली को पद छोड़ना पड़ा। उसके बाद से देश में अंतरिम सरकार काम कर रही है, जिसकी कमान नेपाली सुप्रीम कोर्ट की पूर्व मुख्य न्यायाधीश सुशीला कार्की के हाथों में है। अब 5 मार्च को होने वाला चुनाव केवल नई सरकार चुनने की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह नेपाल की लोकतांत्रिक दिशा, राजनीतिक संस्कृति और भविष्य की स्थिरता की भी परीक्षा है।

सितंबर में हुए प्रदर्शनों ने पूरे देश को झकझोर दिया था। कई जगह हिंसा, आगजनी और टकराव की घटनाएँ सामने आयीं। हालात बिगड़ने पर राष्ट्रपति रामचंद्र पौडेल ने सेना और आंदोलन का प्रतिनिधित्व कर रहे समूहों से बातचीत के बाद अंतरिम व्यवस्था लागू की। प्रतिनिधि सभा को भंग कर नए चुनाव का रास्ता साफ किया गया। कार्की के नेतृत्व वाली इस गैर-राजनीतिक अंतरिम सरकार का मुख्य काम था—देश में शांति बहाल करना, निष्पक्ष चुनाव कराना और युवाओं की उन मांगों पर विचार करना जो लंबे समय से अनसुनी की जा रही थीं।

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जेन Z आंदोलन के बाद पहला आम चुनाव- कितना तैयार नेपाल ?

हिंसा और प्रदर्शन के बाद नये सिरे से खडे़ होने को तैयार नेपाल में चुनाव की तैयारी के दौरान सरकार ने नए मतदाताओं के पंजीकरण को आसान बनाया, युवाओं को नाम दर्ज कराने के लिए अतिरिक्त समय दिया और चुनाव प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी बनाने की कोशिश की। एक प्रगतिशील कदम उठाते हुए विदेश में रहने वाले नेपाली नागरिकों को मतदान की सुविधा देने का विचार भी सामने आया, हालांकि तकनीकी और कानूनी कारणों से यह इस बार संभव नहीं हो सका। 

बीते साल दिसंबर में अंतरिम सरकार ने आंदोलन से जुड़े कई नेताओं के साथ समझौता किया। इसमें संविधान में सुधार, चुनाव प्रणाली में बदलाव, न्यायपालिका और प्रशासन में पारदर्शिता, तथा भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त कदम जैसे मुद्दे शामिल थे। इन प्रदर्शनों को औपचारिक रूप से जन आंदोलन का दर्जा दिया गया, जिससे उन्हें नेपाल के ऐतिहासिक जनआंदोलनों की कड़ी में जोड़ा गया।
अगर गहराई से आकलन करे तो नेपाल में आंदोलन पूरी तरह एकजुट नहीं रहा। कुछ समूहों के बीच विचारों में मतभेद सामने आए। राजशाही समर्थक संगठनों ने अंतरिम सरकार की वैधता पर सवाल उठाए और राष्ट्रपति को ज्ञापन देकर कार्की के इस्तीफे की मांग की। इससे यह संकेत मिले कि नेपाल की राजनीति अभी भी कई धाराओं में बंटी हुई है। 
लोकतांत्रिक गणराज्य, संवैधानिक सुधार, और कुछ वर्गों में राजशाही की वापसी की चाह जैसी अलग-अलग सोच साथ-साथ मौजूद हैं।

सिर्फ प्रधानमंत्री बदलेगा या सिस्टम ?

नेपाल आज जिस ऐतिहासिक दौर से गुजर रहा है, वह केवल चुनावी राजनीति का प्रश्न नहीं बल्कि लोकतांत्रिक परिपक्वता की परीक्षा भी है। 2008 में नेपाल ने खुद को संघीय लोकतांत्रिक गणराज्य घोषित किया था। लेकिन तब से अब तक वहां 14 प्रधानमंत्री बदल चुके हैं। सरकारें अक्सर गठबंधन पर टिकी रहीं और थोड़े समय में गिरती-बनती रहीं, और इसी अस्थिरता ने युवाओं के असंतोष को आक्रोश में बदल दिया और फिर जो हुआ उसे पूरे विश्व ने देखा। उन्हें लगा कि राजनीतिक दल आपसी खींचतान और सत्ता संतुलन में उलझे हैं, जबकि आम जनता के मुद्दे जैसे रोजगार की कमी, महंगाई, शिक्षा की गुणवत्ता, स्वास्थ्य सेवाएँ, और विदेश पलायन जैसे के तैसे बने हुए हैं।

नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी के नेता केपी शर्मा ओली ने इन प्रदर्शनों को अपनी राष्ट्रवादी नीतियों के खिलाफ साजिश बताया। उन्होंने संसद भंग करने के फैसले को सही ठहराया और अदालत में चुनौती भी दी। हालांकि इसमें भी उनकी खुद की पार्टी में मतभेद सामने आये और कुछ नेताओं ने कहा कि उनकी पार्टी चुनाव की तैयारी भी कर रही है, जबकि दूसरी ओर अंतरिम सरकार को असंवैधानिक भी बता रही है। और कुछ नेताओं ने यह भी माना कि युवाओं की मांगों में दम है और उन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
दूसरी तरफ नेपाली कांग्रेस में भी बदलाव की लहर चली। वरिष्ठ नेता शेर बहादुर देउबा पर जनता का दबाव बढ़ा। पार्टी के युवा चेहरे गगन थापा ने खुले तौर पर सुधार की बात की। पार्टी में आंतरिक चुनाव और नेतृत्व परिवर्तन को लेकर विवाद हुआ, जिसके बाद थापा के नेतृत्व में नया ढांचा बना। उन्होंने प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में खुद को प्रस्तुत किया और कई सुधार प्रस्ताव रखे जैसे प्रधानमंत्री के लिए कार्यकाल सीमा, टिकट वितरण में पारदर्शिता, भाई-भतीजावाद पर रोक, और भ्रष्टाचार के मामलों की निष्पक्ष जांच।
इन्हीं सबके बीच में माओवादी धड़ा भी सक्रिय हुआ। पुष्प कमल दहल के नेतृत्व में छोटे वामपंथी दलों के साथ मिलकर नया गठबंधन बना। वहीं, नई राजनीति का दावा करने वाली राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी ने खुद को पारंपरिक दलों के विकल्प के रूप में पेश किया और इसके प्रमुख रबी लामिछने  ने अन्य नए चेहरों के साथ मिलकर व्यापक मोर्चा बनाने की कोशिश की। 
काठमांडू के मेयर बालेन शाह और पूर्व ऊर्जा प्रमुख कुलमन घीसिंग के साथ भी एक राजनीतिक प्रयास हुआ, लेकिन वह ज्यादा समय तक टिक नहीं पाया। इन सबके बीच नेपाल की राजनीति को करीब से देखने वाले मानते हैं कि नेपाल की वैकल्पिक राजनीति भी अपने भीतर चुनौतियों से घिरी है।

सत्ता परिवर्तन नहीं युवाओं के विश्वास की परीक्षा

हमें एक बात समझने की जरुरत है कि प्रदर्शनों के बाद हो रहे इन चुनावों का महत्व केवल सत्ता परिवर्तन तक सीमित नहीं है बल्कि यह युवाओं के विश्वास की परीक्षा है। लगभग आधे से अधिक मतदाता 18 से 40 वर्ष की आयु के हैं, लेकिन प्रमुख दलों में युवाओं की भागीदारी अभी भी सीमित है। राजनीतिक नेतृत्व नई पीढ़ी को आगे आने का पूरा अवसर देने में झिझकता दिखाई देता है। यही कारण है कि बदलाव की प्रक्रिया धीमी और कठिन लगती है।
नेपाल के सामने कई बड़े मुद्दे और चुनौतियां हैं जैसे आर्थिक सुधार, रोजगार सृजन, पर्यटन और जलविद्युत क्षेत्र का विकास, विदेश में काम करने गए नेपाली युवाओं की सुरक्षा, शिक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था में सुधार, तथा भ्रष्टाचार पर नियंत्रण बड़े मुद्दे हैं। साथ ही कूटनीतिक नजरिये से हम देखें तो नेपाल की भारत और चीन जैसे बड़े पड़ोसी देशों के बीच संतुलन बनाए रखना भी एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक चुनौती है।

एक बात तो तय है कि आने वाली सरकार चाहे किसी भी दल की हो, उससे जनता की अपेक्षाएँ बहुत अधिक हैं। अगर वह युवाओं की आवाज को अनसुना करती है, तो असंतोष फिर उभरने की आशंका को हम नकार नहीं सकते हैं। फिर भी उम्मीद पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। युवाओं की बढ़ती राजनीतिक भागीदारी, नागरिक समाज की सक्रियता और पारदर्शिता की मांग यह संकेत देती है कि समाज बदलाव के लिए तैयार है। सवाल केवल नेतृत्व का नहीं, बल्कि राजनीतिक संस्कृति का है, क्या दल अल्पकालिक सत्ता समीकरणों से ऊपर उठकर दीर्घकालिक नीतिगत स्थिरता पर ध्यान देंगे? लेकिन अगर राजनीतिक दल ईमानदारी से सुधार की दिशा में कदम उठाते हैं, तो यह चुनाव नेपाल की लोकतांत्रिक यात्रा में एक नए अध्याय की शुरुआत बन सकता है।
राजनीतिक इच्छाशक्ति यहाँ निर्णायक कारक बनेगी। सुधारों चाहे वे सुशासन, भ्रष्टाचार नियंत्रण, आर्थिक पुनरुत्थान या संघीय ढांचे के प्रभावी कार्यान्वयन से जुड़े हों के लिए निरंतरता और धैर्य दोनों आवश्यक हैं। जनता की अपेक्षाएँ अब केवल वादों तक सीमित नहीं हैं वे परिणाम देखना चाहती है। अंततः यह चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन का माध्यम बनेगा या एक नई राजनीतिक संस्कृति की शुरुआत करेगा, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि नेतृत्व कितनी ईमानदारी से जवाबदेही स्वीकार करता है और क्या वह दीर्घकालिक राष्ट्रीय हित को प्राथमिकता देता है। यही मोड़ तय करेगा कि निराशा भारी पड़ेगी या उम्मीद एक नए अध्याय की शुरुआत करेगी।

Tags: janaandolanjustice sushila kulkarniNepalnepal communist partynepal governmentPresidentsuprem courtअंतरिम सरकारजनआंदोलनोंनेपालनेपाल कम्युनिस्ट पार्टीराष्ट्रपतिसुप्रीम कोर्ट
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