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ईरानी मिसाइलों का असर: हमले के लिए US को अपनी ज़मीन और हवाई क्षेत्र नहीं देगा UAE, लेकिन अब ट्रम्प क्या करेंगे ?

UAE का ताजा रुख़ बताता है कि खाड़ी देश डिप्लोमेसी के ज़रिए इस समस्या का जल्द अंत चाहते हैं, लेकिन क्या अब ईरान ट्रम्प की पुरानी शर्तें मानेगा?

Sambhrant Mishra द्वारा Sambhrant Mishra
13 March 2026
in विश्व
हॉर्मुज स्ट्रेट बहाल करवाने में ट्रम्प की नाकामी ने खाड़ी देशों के उन पर भरोसे को लगभग खत्म कर दिया

हॉर्मुज स्ट्रेट बहाल करवाने में ट्रम्प की नाकामी ने खाड़ी देशों के उन पर भरोसे को लगभग खत्म कर दिया

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मिडिल-ईस्ट में जारी जंग के बीच एक बहुत बड़ा अपडेट आया है। ये अपडेट संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) की तरफ़ से आया है, जहां उनकी राज्य मंत्री लाना नुसैबेह ने साफ़ कहा है कि अब अमेरिका को ईरान पर हमला करने के लिए यूएई के हवाई क्षेत्र या उसकी ज़मीन का इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं दी जाएगी। उनके इस वक्तव्य में कई बातें ऐसी थीं जो इस युद्ध की न सिर्फ दिशा-दशा तय करेंगी, बल्कि भविष्य में ये क्षेत्र कैसा होने वाला है, इसके संकेत भी देती हैं।

लाना नुसैबेह Lana Nusseibeh ने खाड़ी देशों पर ईरान के हमलों की कड़ी निंदा करते हुए इन्हें गंभीर, गैरकानूनी और बिना किसी उकसावे के किया गया हमला बताया। लेकिन जब उनके पूछा गया कि क्या उनका देश इसके बदले ईरान पर कोई जवाबी पलटवार करेगा ? उन्होने लगभग इससे इनकार कर दिया। उन्होने कहा कि UAE कूटनीति को ही आगे बढ़ने का रास्ता मानता है। यही नहीं उन्होने ये भी साफ़ किया कि अब उनका देश अमेरिका को ईरान पर हमला करने के लिए अपने हवाई क्षेत्र या जमीन का इस्तेमाल नहीं करने देगा।
ये बयान ऐसे समय पर आया है जब ये पूरा क्षेत्र जंग में तेजी से उलझता जा रहा है। हॉर्मुज स्ट्रेट के ज़रिए होने वाला कारोबार लगभग ठप हो गया है और ट्रम्प इसे बहाल करने में न सिर्फ नाकाम नज़र आए हैं, बल्कि उन्होने अपने हाथ भी पीछे खींच लिए हैं।

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UAE का ये रुख़ क्या बताता है?

दो बातें जो स्पष्ट रूप से समझी जा सकती हैं वो हैं
पहली-
इन देशों का अमेरिका ख़ासकर ट्रम्प के ऊपर से भरोसा तेजी से घटा है और उन्हें इस बात का एहसास हो रहा है कि ट्रम्प ने इज़रायल के कहे पर आँख मूँद कर चलते हुए उनके देशों को खामखां एक अंतहीन और खर्चीली जंग में उलझा दिया है।

दूसरी–
ईरान ने खाड़ी के इन धनकुबेर देशों पर हमला कर उन्हें कमजोर नस की तरह दबाने की जो रणनीति बनाई थी (ताकि ये देश अमेरिका को बातचीत की मेज़ पर लाने को मजबूर कर सकें) वो काम करती नज़र आ रही है।

बातचीत की मेज़ पर लौटना ही ट्रम्प का एक मात्र विकल्प ?

UAE की तरफ़ से ये बयान ऐसे वक्त पर आया है, जब ट्रम्प हॉर्मुज जलडमरूमध्य में आवागमन सुरक्षित बनाने के लिए नेवी भेजने से साफ़ इनकार कर चुके हैं। जैसा कि हमने पहले भी बताया था कि ईरान की सबसे बड़ी ताक़त उसकी मिसाइलें नहीं, बल्कि हॉर्मुज स्ट्रेट है, जिसे वो जब चाहे बंद कर खाड़ी देशों और दुनिया भर की इकॉनमी को हिला सकता है, अरबों लोगों की जिंदगियों को प्रभावित कर सकता है।
जंग से शुरू होने से पहले तक खाड़ी देशों को ये उम्मीद थी कि अमेरिका की सुपरपॉवर नेवी ऐसा नहीं होने देगी और ज़रूरत पड़ी तो इस ब्लॉकेज को सैन्य प्रयोग से खोला जा सकेगा। लेकिन रिजीम चेंज जैसे शुरुआती लक्ष्य हासिल करने में नाकाम रहे ट्रम्प अब इतना बड़ा जुआं नहीं खेलना चाहते और ये एक तरह से खाड़ी देशों ही नहीं बल्कि भारत और दक्षिण एशिया के तमाम देशों के लिए एक बड़ा झटका है, ऊपर से ईरानी मिसाइलें और ड्रोन भले ही रणनीतिक ठिकानों (अमेरिकी सैन्य ठिकानों) पर न गिर रही हों, लेकिन उनकी दहशत बढ़ती ही जा रही है। 
ईरान द्वारा जंग का दायरा आम लोगों और दुबई जैसे शहर की अर्थव्यवस्था (बैंकिंग) तक पहुंचाने से भी UAE बुरी तरह बैकफ़ुट में आ चुका है।
जल्दी ही ओमान, कतर, बहरीन और कुवैत जैसे दूसरे खाड़ी देश भी ऐसे संकेत दे सकते हैं। सऊदी अरब के पास लाल सागर का विकल्प है, लेकिन वो भी महंगा है और वहां भी हूतियों का खतरा है, जबकि मौजूदा स्थितियों में इराक़ के पास अपनी कोई निजी राय नहीं है (कह सकते हैं कि उसकी राय का कोई अर्थ नहीं है) अगर ये देश अपना हवाई क्षेत्र भी अमेरिका और इज़रायल के लिए बंद कर देते हैं तो अमेरिका के पास ईरान पर हमला करने के विकल्प बेहद सीमित रह जाएंगे और तब ये हमले न सिर्फ बेहद महंगे, बल्कि चुनौतीपूर्ण भी हो जाएंगे। अमेरिकी एयरक्राफ्ट कैरियर B-2 जैसे बड़े बॉम्बर्स को लॉन्च नहीं कर सकते और ईरान की अंडरग्राउंड मिसाइल स्टोरेज फैसेलिटी या बंकर्स को तोड़ने के लिए GBU-52 जैसे जिन बड़े बमों की ज़रूरत होती है वो इन बॉम्बर्स से ही लॉन्च हो सकते हैं। अमेरिका हिंद महासागर में मौजूद डिएगो गार्सिया का इस्तेमाल कर कर सकता है, एक विकल्प पाकिस्तान भी हो सकता है (लेकिन लगता नहीं कि पाकिस्तान ख़ुद को इस जंग में झोंकना चाहेगा)

कुल मिलाकर तब अमेरिका और इज़रायल की ईरान पर सटीक कार्रवाई करने की क्षमताएं बुरी तरह प्रभावित होंगी और ईरान तेजी से अपनी खोई हुई क्षमता हासिल करने की कोशिश करेगा। ऐसे में काफी हद तक संभव है कि सभी पक्ष जल्दी ही बातचीत की मेज़ पर लौटते नज़र आएं (UAE की तरफ़ से भी कूटनीति पर विशेष ज़ोर दिया गया है) लेकिन याद रखिए इस बार गेंद ईरान के पाले में है और वो तब तक इन प्रेशर प्वाइंट्स का इस्तेमाल करता रहेगा, जब तक कि वो अपने लिए कुछ सम्मानजनक शर्तें सुनिश्चित नहीं करवा लेता।

क्या अमेरिका पर भरोसा कम हो रहा है?

यूएई के इस रुख को कई विशेषज्ञ एक बड़े भू-राजनीतिक संकेत के रूप में भी देख रहे हैं। यदि खाड़ी के देश अमेरिका को अपने सैन्य ठिकानों का इस्तेमाल करने की अनुमति देने से पीछे हट रहे हैं, तो यह इस बात का संकेत हो सकता है कि क्षेत्र में अमेरिकी सुरक्षा छत्र पर भरोसा पहले जैसा मजबूत नहीं रहा। इस पूरे परिदृश्य में डॉनल्ड ट्रम्प की रणनीति भी सवालों के घेरे में आ सकती है। अगर खाड़ी के सहयोगी देश ही सीधे टकराव से दूरी बनाने लगें, तो यह अमेरिकी कूटनीति के लिए एक चुनौती बन सकती है। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि युद्ध की स्थिति में अक्सर वही देश आगे बढ़ते हैं जिन्हें अपनी सुरक्षा पर पूरा भरोसा हो। लेकिन अगर सहयोगी देश ही जोखिम उठाने से बचने लगें, तो इसका मतलब है कि वे अपने हितों को किसी बड़े सैन्य एजेंडे से ऊपर रखने लगे हैं।

Tags: ecconomyirani missilesuperpowertrump harmunzUAEट्रम्पमिडिल-ईस्टलाना नुसैबेहहवाई क्षेत्र
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