12 साल की एक बच्ची ने आत्महत्या कर ली। उसके माता-पिता का कहना है कि मौत से पहले कई महीनों तक वह सोशल मीडिया पर अवसाद (डिप्रेशन) और आत्महत्या से जुड़े कंटेंट देखती रही। बच्ची की मौत के बाद जब परिवार ने उसका मोबाइल और अन्य डिवाइस देखे, तो उन्हें एक छिपा हुआ इंस्टाग्राम अकाउंट मिला, जिसका नाम “Just a dead pers0n“ था।
इस खुलासे के बाद माता-पिता को लगा कि उनकी बेटी की मानसिक परेशानी केवल व्यक्तिगत कारणों से नहीं थी, बल्कि सोशल मीडिया के एल्गोरिद्म ने भी उसकी स्थिति को और गंभीर बना दिया हो सकता है।
आरोप: एल्गोरिद्म ने बढ़ाया नुकसान
बच्ची के माता-पिता और इटली के कुछ अन्य परिवारों ने Meta और TikTok के खिलाफ अदालत में मामला दायर किया है।
उनका आरोप है कि जब बच्ची ने डिप्रेशन से जुड़े वीडियो और पोस्ट देखना शुरू किया, तो सोशल मीडिया के एल्गोरिद्म ने उसे लगातार उसी तरह का और कंटेंट दिखाना शुरू कर दिया। इससे वह धीरे-धीरे ऐसे कंटेंट में और अधिक डूबती चली गई।
माता-पिता का कहना है कि सितंबर 2023 में बच्ची ने पहली बार डिप्रेशन से जुड़ी सामग्री खोजी थी। इसके बाद अगले कई महीनों तक उसे लगातार वैसा ही कंटेंट सुझाया जाता रहा। लगभग पांच महीने बाद उसने आत्महत्या कर ली।
अब अदालत के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या एल्गोरिद्म सिर्फ एक तकनीकी व्यवस्था है या फिर वह लोगों के व्यवहार और फैसलों को प्रभावित करने में सक्रिय भूमिका निभाता है।
Meta और TikTok ने आरोपों से किया इनकार
Meta का कहना है कि उसने किशोरों की सुरक्षा के लिए Teen Accounts, कंटेंट मॉडरेशन और कई सुरक्षा फीचर बनाए हैं, ताकि बच्चों को नुकसान पहुंचाने वाली सामग्री कम दिखाई जाए।
कंपनी का कहना है कि किशोरों का मानसिक स्वास्थ्य केवल सोशल मीडिया से प्रभावित नहीं होता, बल्कि परिवार, स्कूल और आसपास का माहौल भी इसमें बड़ी भूमिका निभाता है।
वहीं TikTok का कहना है कि वह नियमों का उल्लंघन करने वाले 99 प्रतिशत से अधिक कंटेंट को हटा देता है। कंपनी का दावा है कि उसने ऐसे सिस्टम विकसित किए हैं जो हानिकारक कंटेंट की सिफारिश कम करते हैं, खतरनाक सर्च को रोकते हैं और जरूरत पड़ने पर लोगों को मदद के संसाधनों तक पहुंचाते हैं।
दोनों कंपनियों का कहना है कि पूरी जिम्मेदारी केवल प्लेटफॉर्म के डिजाइन पर नहीं डाली जा सकती।
दुनिया भर में सख्त हो रहे हैं नियम
यह मामला ऐसे समय सामने आया है जब कई देश सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर कड़े नियम लागू कर रहे हैं।
ब्रिटेन ने 16 साल से कम उम्र के बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर सख्त नियंत्रण की योजना बनाई है।
अमेरिका में भी कुछ मामलों में अदालतों ने युवा उपयोगकर्ताओं को होने वाले नुकसान के लिए बड़ी टेक कंपनियों की लापरवाही पर सवाल उठाए हैं।
यूरोपीय संघ (EU) भी Digital Services Act के तहत यह सुनिश्चित करने की कोशिश कर रहा है कि सोशल मीडिया कंपनियां अपने एल्गोरिद्म और कंटेंट सिफारिश प्रणाली के लिए अधिक जवाबदेह हों।
अब सरकारें एल्गोरिद्म को केवल एक तकनीकी सुविधा नहीं, बल्कि जिम्मेदारी से जुड़ा विषय मान रही हैं।
माता-पिता के सामने बड़ी चुनौती
मुकदमे में शामिल परिवारों का कहना है कि मौजूदा सुरक्षा उपाय पर्याप्त नहीं हैं।
उनके अनुसार, बच्चे आसानी से दूसरा अकाउंट बना सकते हैं, दूसरा डिवाइस इस्तेमाल कर सकते हैं या इंटरनेट पर उपलब्ध तरीकों से उम्र संबंधी प्रतिबंधों को पार कर सकते हैं।
कई माता-पिता का कहना है कि बच्चों की हर ऑनलाइन गतिविधि पर नजर रखना लगभग असंभव हो गया है।
कुछ परिवारों ने यह भी बताया कि उन्होंने बच्चों में ध्यान लगाने की क्षमता कम होते और किताबें पढ़ने की आदत की जगह लगातार मोबाइल स्क्रॉल करने की आदत बढ़ते हुए देखी।
वैज्ञानिक क्या कहते हैं?
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने चेतावनी दी है कि किशोरों में सोशल मीडिया का जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है। इससे नींद, मानसिक स्वास्थ्य और बच्चों के विकास पर नकारात्मक असर पड़ सकता है।
JAMA Pediatrics जैसी मेडिकल पत्रिकाओं में प्रकाशित शोध बताते हैं कि सोशल मीडिया का अत्यधिक इस्तेमाल करने वाले किशोरों के मस्तिष्क में कुछ अलग तरह के बदलाव देखे गए हैं।
कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि सोशल मीडिया का डिजाइन जुए (गैम्बलिंग) की तरह काम करता है, जहां लाइक, नोटिफिकेशन और नए कंटेंट की वजह से दिमाग में डोपामिन निकलता है और लोग बार-बार ऐप इस्तेमाल करने लगते हैं।
हालांकि, कुछ मनोवैज्ञानिक इस बात से सहमत नहीं हैं कि केवल सोशल मीडिया ही मानसिक समस्याओं का कारण है। उनका कहना है कि किशोरों का मानसिक स्वास्थ्य कई अलग-अलग कारणों से प्रभावित होता है और जरूरत से ज्यादा निगरानी भी नुकसानदायक हो सकती है। उनके अनुसार, बच्चों के साथ भरोसेमंद संवाद ज्यादा जरूरी है।
एक परिवार की लड़ाई, लेकिन सवाल पूरे समाज के लिए
बच्ची की मां का कहना है कि उनका उद्देश्य केवल किसी कंपनी को दोषी ठहराना नहीं है, बल्कि लोगों को यह समझाना है कि ऐसे खतरे वास्तव में मौजूद हैं।
उनका कहना है कि उन्हें इन जोखिमों का एहसास तब हुआ, जब बहुत देर हो चुकी थी। अब वह चाहती हैं कि किसी दूसरे परिवार को ऐसा दर्द न झेलना पड़े।
जो घटना एक परिवार की निजी त्रासदी थी, वह अब तकनीक, कानून और बच्चों की सुरक्षा से जुड़ी एक बड़ी बहस बन चुकी है।
सबसे बड़ा सवाल
अब अदालत, सरकारों और सोशल मीडिया कंपनियों के सामने सबसे अहम सवाल यही है कि जब एल्गोरिद्म यह तय करते हैं कि बच्चों को अगला कंटेंट क्या दिखाई देगा, तो यदि उसका असर उनकी मानसिक स्थिति पर पड़ता है, तो उसकी जिम्मेदारी आखिर किसकी होगी?


































