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छात्र शक्ति से राष्ट्र शक्ति तक : अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की 77 वर्षीय वैचारिक यात्रा — चंद्रशेखर पटेल

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत राजनीतिक रूप से स्वतंत्र अवश्य हो गया था, किंतु शिक्षा व्यवस्था अब भी औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्त नहीं हुई थी।विश्वविद्यालय ज्ञान के केंद्र तो थे,

Chandra Shekhar Patel द्वारा Chandra Shekhar Patel
9 July 2026
in चर्चित
ABVP स्थापना दिवस की तस्वीर

ABVP स्थापना दिवस की तस्वीर

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भारत का इतिहास केवल राजसत्ताओं के उत्थान और पतन का इतिहास नहीं है।यह विचारों की विजय का इतिहास है।इस देश ने तलवार से अधिक कलम पर विश्वास किया है, सत्ता से अधिक संस्कार को महत्व दिया है और व्यक्तियों से अधिक पीढ़ियों के निर्माण को अपनी सभ्यता का आधार बनाया है।इसलिए जब भी भारत के पुनर्जागरण की चर्चा होगी, तब केवल संसद और सरकारों का उल्लेख पर्याप्त नहीं होगा,विश्वविद्यालयों, महाविद्यालयों और उन लाखों विद्यार्थियों का भी स्मरण करना होगा जिन्होंने अपने समय में राष्ट्र की चेतना को नई दिशा दी। इसी परंपरा का एक महत्वपूर्ण अध्याय है अखिल भारतीयविद्यार्थी परिषद, जो केवल एक छात्र संगठन नहीं, बल्कि स्वतंत्र भारत के छात्र जीवन की सबसे प्रभावशाली वैचारिक यात्राओं में से एक है।

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत राजनीतिक रूप से स्वतंत्र अवश्य हो गया था, किंतु शिक्षा व्यवस्था अब भी औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्त नहीं हुई थी।विश्वविद्यालय ज्ञान के केंद्र तो थे, परंतु उनमें भारतीयता, राष्ट्रीयआत्मविश्वास और सामाजिक उत्तरदायित्व की सशक्त अभिव्यक्ति अपेक्षित थी। ऐसे समय कुछ दूरदर्शी शिक्षकों और छात्रों ने अनुभव किया कि यदि भारत का भविष्य सशक्त बनाना है तो विद्यार्थियों को केवल परीक्षा देने वाला वर्ग नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण का सहभागी बनाना होगा।इसी चिंतन के साथ 1948 में परिषद की गति विधियाँ प्रारंभ हुईं और 9 जुलाई 1949 को अखिल भारतीयविद्यार्थी परिषद का औपचारिक पंजीकरण हुआ।प्रथम राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रो. ओमप्रकाश बहल और प्रथम राष्ट्रीय महामंत्री केशव देववर्माने जिस छोटे से पौधे को रोपा, वह आज विश्व के सबसे बड़े छात्रसंगठनों में से एकविशालवट वृक्ष बन चुका है।

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परिषद ने प्रारंभ से ही एक ऐसा विचार सामने रखा जिसने भारतीयछात्र आंदोलन की दिशा बदलदी“आज का विद्यार्थी, आज का नागरिक।” यह केवल एक नारा नहीं,बल्कि लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व का उद्घोष था। इस विचार ने विद्यार्थियों को यह बताया कि राष्ट्रनिर्माण की जिम्मेदारी भविष्य में नहीं आती वह विद्यार्थी जीवन से ही प्रारंभ होती है।विश्वविद्यालय केवल डिग्री देनेवाले संस्थान नहीं हैं, वे लोकतंत्रकी प्रयोगशालाएँ हैं जहाँ से समाज का भावी नेतृत्व तैयार होता है। यदि विद्यार्थी अपने समय की समस्याओं से विमुख रहेगा तो भविष्य का नागरिक भी संवेदन ही न होगा। अखिल भारतीय विद्यार्थीपरिषद का ध्येयवाक्य“ज्ञान, शील और एकता”भारतीय शिक्षा दर्शन का सार है।ज्ञान मनुष्य को सक्षम बनाता है, शील उसे श्रेष्ठ बनाता हैऔर एक ताउ से समाज तथा राष्ट्र से जोड़ती है।आधुनिक शिक्षा अक्सर कौशल पर बल देती है, किंतु भारतीय परंपरा कौशल के साथ चरित्र को भी उतना ही महत्वपूर्ण मानती है।परिषद ने इसी भारतीय दृष्टि को विद्यार्थी जीवन का आधार बनाने का प्रयास किया।उसने यह स्पष्ट किया कि शिक्षा का उद्देश्य केवलनौकरीप्राप्तकरनानहीं, बल्किसमाजकेप्रतिउत्तरदायीनागरिकतैयारकरनाहै।

यदि परिषद की स्थापना उसके जन्म की कथा है, तो प्रो. यशवंतराव केलकर उसके व्यक्तित्व के निर्माता हैं। उन्हें उचित ही परिषद का वैचारिक शिल्पकार कहा जाता है। उन्होंने छात्र संगठन को केवल चुनावी प्रतिस्पर्धा तक सीमित नहीं रहने दिया। उनके चिंतन में छात्र आंदोलन का अर्थ था—अध्ययन, संवाद, सेवा, संगठन और समाज के प्रति उत्तरदायित्व। वे कहा करते थे कि विश्वविद्यालयों में केवल नेता नहीं, विचारवान नागरिक तैयार होने चाहिए। उनका आग्रह था कि आंदोलन आवश्यक है, किंतु आंदोलन का उद्देश्य केवल विरोध नहीं, सकारात्मक परिवर्तन होना चाहिए। आज परिषद के प्रशिक्षण वर्ग, अध्ययन मंडल, व्यक्तित्व विकास कार्यक्रम और सेवा गतिविधियाँ उनके दूरदर्शी चिंतन की सजीव अभिव्यक्ति हैं।

प्रो. बाल आपटे ने परिषद को वैचारिक दृढ़ता और संवैधानिक दृष्टि प्रदान की। उनका मानना था कि छात्र राजनीति का उद्देश्य सत्ता प्राप्ति नहीं, समाज को सही दिशा देना है। वे अक्सर कहा करते थे कि अधिकारों की चर्चा जितनी आवश्यक है, कर्तव्यों की चर्चा उससे भी अधिक आवश्यक है। लोकतंत्र केवल विरोध करने का अधिकार नहीं देता, बल्कि व्यवस्था को बेहतर बनाने का दायित्व भी सौंपता है। उनके विचारों ने परिषद के हजारों कार्यकर्ताओं को बौद्धिक स्पष्टता प्रदान की।

स्वर्गीय मदन दास देवी ने परिषद को कार्यकर्ता निर्माण की अद्भुत संस्कृति दी। वे मानते थे कि संगठन का भविष्य उसके कार्यालयों में नहीं, बल्कि उसके कार्यकर्ताओं के चरित्र में बसता है। उन्होंने हजारों युवाओं को व्यक्तिगत जीवन में सादगी, संगठन के प्रति निष्ठा और समाज के प्रति समर्पण का संस्कार दिया। आज परिषद की सबसे बड़ी शक्ति उसका कार्यकर्ता है, जो किसी पद या प्रसिद्धि की अपेक्षा किए बिना समाज के बीच कार्य करता है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वर्तमान सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले ने अपने विद्यार्थी परिषद के लंबे अनुभव के आधार पर शिक्षा के भारतीयकरण, मातृभाषा, अनुसंधान और सांस्कृतिक आत्मविश्वास पर निरंतर बल दिया। उनका कहना है कि यदि भारत को विश्व में ज्ञान का नेतृत्व करना है, तो उसे अपनी शिक्षा व्यवस्था को अपनी सभ्यता और ज्ञान परंपरा से जोड़ना होगा। यही कारण है कि आज नई शिक्षा नीति पर होने वाले विमर्श में भारतीय दृष्टि की चर्चा अधिक मुखर होकर सामने आ रही है।

परिषद का इतिहास केवल विचारों का इतिहास नहीं है, बल्कि संघर्ष और सेवा का इतिहास भी है। जब-जब शिक्षा व्यवस्था में भ्रष्टाचार, अव्यवस्था या छात्र हितों की उपेक्षा हुई, परिषद ने लोकतांत्रिक तरीकों से अपनी आवाज उठाई। जब देश प्राकृतिक आपदाओं से जूझा, तब परिषद के कार्यकर्ता राहत कार्यों में सबसे आगे दिखाई दिए। रक्तदान, पर्यावरण संरक्षण, ग्राम विकास, जनजातीय क्षेत्रों में शिक्षा, पूर्वोत्तर भारत के विद्यार्थियों के साथ संवाद, छात्राओं की सुरक्षा, नवाचार, स्टार्टअप और सामाजिक समरसता जैसे विषय परिषद की कार्य संस्कृति का हिस्सा बने। यही कारण है कि इसे केवल आंदोलनकारी संगठन कहना उसके व्यापक योगदान के साथ न्याय नहीं होगा।

भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में आपातकाल का कालखंड सदैव स्मरण किया जाएगा। उस समय अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सीमित थी, लोकतांत्रिक संस्थाएँ दबाव में थीं और असहमति को अपराध माना जा रहा था। ऐसे कठिन समय में अनेक विद्यार्थी परिषद कार्यकर्ताओं ने लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए संघर्ष किया। अनेक जेल गए, अनेक ने अपने शैक्षणिक जीवन का नुकसान उठाया, किंतु लोकतंत्र के प्रति अपनी प्रतिबद्धता नहीं छोड़ी। यह अध्याय केवल एक संगठन का इतिहास नहीं, बल्कि भारत के लोकतांत्रिक चरित्र का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है।

समय के साथ शिक्षा की चुनौतियाँ बदली हैं। आज कृत्रिम बुद्धिमत्ता, साइबर सुरक्षा, जलवायु परिवर्तन, स्टार्टअप, अनुसंधान, कौशल विकास और वैश्विक प्रतिस्पर्धा जैसे नए विषय युवाओं के सामने हैं। परिषद ने इन विषयों पर भी संवाद और जागरूकता का वातावरण बनाया है। बदलते समय के साथ स्वयं को विकसित करना किसी भी जीवंत संगठन की पहचान होती है, और परिषद ने यह सिद्ध किया है कि मूल विचारों को सुरक्षित रखते हुए भी समय के साथ चला जा सकता है।

मेरे लिए अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद का संबंध केवल इतिहास या विचार से नहीं, बल्कि जीवन के अनुभव से है। विद्यार्थी जीवन में परिषद से जुड़ने का अवसर मिला। संगठन के विभिन्न दायित्वों का निर्वहन करते हुए मैंने अनुभव किया कि परिषद केवल भाषण देना नहीं सिखाती, बल्कि सुनना भी सिखाती है। केवल नेतृत्व करना नहीं सिखाती, बल्कि साथ लेकर चलना भी सिखाती है। केवल संघर्ष करना नहीं सिखाती, बल्कि संघर्ष के बीच संयम बनाए रखना भी सिखाती है। यही संस्कार जीवन की सबसे बड़ी पूँजी बने। आज जब रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय की कार्य परिषद का सदस्य होने के नाते उच्च शिक्षा से जुड़े विषयों पर विचार करने का अवसर मिलता है, तब बार-बार विद्यार्थी परिषद के वे दिन स्मरण हो आते हैं, जब विश्वविद्यालय को केवल शिक्षा का केंद्र नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण का केंद्र मानना सिखाया गया था। किसी भी नीति, किसी भी निर्णय और किसी भी व्यवस्था का अंतिम उद्देश्य विद्यार्थी का समग्र विकास होना चाहिए। यदि शिक्षा केवल रोजगार दे और चरित्र न बनाए, तो राष्ट्र की प्रगति अधूरी रह जाएगी।

आज भारत अमृतकाल की यात्रा पर है। वर्ष 2047 तक विकसित भारत का लक्ष्य केवल आर्थिक समृद्धि का लक्ष्य नहीं है; यह सांस्कृतिक, बौद्धिक और नैतिक नेतृत्व का भी लक्ष्य है। इस लक्ष्य को प्राप्त करने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका युवाओं की होगी। विश्वविद्यालयों में बैठा प्रत्येक विद्यार्थी भविष्य का वैज्ञानिक, शिक्षक, न्यायविद, प्रशासक, उद्योगपति, पत्रकार या जनप्रतिनिधि है। यदि उसके भीतर राष्ट्रभाव, सामाजिक संवेदनशीलता और चरित्र की दृढ़ता होगी, तो भारत का भविष्य भी उतना ही उज्ज्वल होगा।

अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की लगभग आठ दशकों की यात्रा हमें यही सिखाती है कि छात्र शक्ति तब राष्ट्र शक्ति बनती है, जब वह ज्ञान से प्रकाशित, शील से अनुशासित और सेवा से प्रेरित हो। किसी भी संगठन का मूल्य उसके कार्यालयों की भव्यता से नहीं, बल्कि उसके कार्यकर्ताओं के व्यक्तित्व से आँका जाता है। परिषद की सबसे बड़ी उपलब्धि यही है कि उसने लाखों युवाओं को केवल सफल बनने की नहीं, बल्कि उपयोगी बनने की प्रेरणा दी। सफलता व्यक्ति को ऊँचा बनाती है, पर उपयोगिता समाज को ऊँचा उठाती है।

स्थापना दिवस केवल अतीत का स्मरण करने का अवसर नहीं है। यह आत्ममंथन का भी अवसर है। प्रत्येक विद्यार्थी को स्वयं से पूछना चाहिए कि उसकी शिक्षा का लाभ केवल उसे मिलेगा या उसके माध्यम से समाज और राष्ट्र भी समृद्ध होंगे। यदि भारत का युवा इस प्रश्न का उत्तर ईमानदारी से खोज ले, तो विकसित भारत का स्वप्न केवल सरकारी दस्तावेज़ नहीं रहेगा, बल्कि राष्ट्रीय संकल्प बन जाएगा।

राष्ट्र का भविष्य संसद में जितना लिखा जाता है, उससे कहीं अधिक विश्वविद्यालयों के प्रांगण में लिखा जाता है। इसलिए आज आवश्यकता केवल डिग्रीधारी युवाओं की नहीं, बल्कि चरित्रवान, संवेदनशील, शोधशील और राष्ट्रनिष्ठ युवाओं की है। यही वह संदेश है, जिसे अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद अपनी स्थापना से लेकर आज तक निरंतर दोहराती आई है। समय बदलेगा, परिस्थितियाँ बदलेंगी, चुनौतियाँ भी बदलेंगी, लेकिन भारत को ऐसे युवाओं की आवश्यकता कभी समाप्त नहीं होगी, जो अपने व्यक्तिगत स्वप्नों से ऊपर उठकर राष्ट्र के सपनों को अपना सपना बना लें। यही विद्यार्थी परिषद की साधना है, यही उसकी विरासत है और यही उसकी सबसे बड़ी प्रासंगिकता भी।

चन्द्रगुप्त से हों अनुयायी, शिक्षक हों चाणक्य।

एकलव्य कोई छूट न जाए, चिंता करना भाई।

सुलभ हो शिक्षा, सबको शिक्षा का संकल्प हमारा।

भारत को भारत की शिक्षा का अधिकार हमारा।

नवयुग को भारत का अखंड दीप जला जाएंगे।

विश्वगुरु भारत का ध्वज आगे लेकर जाएंगे।

Tags: fake studentअखिल भारतीय विद्यार्थीछात्र शक्तिभविष्य संसदराष्ट्रीय संकल्प
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बैंक हड़ताल टली
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बैंक हड़ताल टली, 28 से 30 सितंबर तक सामान्य रहेंगी बैंकिंग सेवाएं; 26 अक्टूबर की हड़ताल भी स्थगित

28 September 2026

बैंकिंग सेवाएं आज सामान्य रूप से जारी रहेंगी। यूनाइटेड फोरम ऑफ बैंक यूनियंस (UFBU) ने 28 से 30 सितंबर तक होने वाली तीन दिवसीय देशव्यापी...

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