द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जर्मनी ने दुनिया से एक वादा किया था…वो कभी भी सैन्यवाद के रास्ते पर नहीं चलेगा। दशकों तक जर्मनी ने अपनी पहचान एक आर्थिक महाशक्ति के रूप में बनाई… लेकिन आज वही जर्मनी फिर से हथियार खरीद रहा है, सेना बढ़ा रहा है, अरबों यूरो रक्षा पर खर्च कर रहा है और यूरोप की सबसे शक्तिशाली पारंपरिक सेना बनाने की बात कर रहा है…
लेकिन इस पूरी कहानी में एक ऐसी विडंबना है, जो शायद बर्लिन की सरकार को भी परेशान कर रही होगी। दरअसल रिपोर्ट्स कहती हैं कि इतना करने के बाद भी जर्मनी की जनता खुद अपनी सेना पर भरोसा नहीं करती। YouGov के ताजा सर्वे के मुताबिक करीब 70 प्रतिशत जर्मनों का मानना है कि अगर उनके देश पर हमला हुआ, तो उनकी सेना उसकी रक्षा करने में सक्षम नहीं होगी। यानी जिस देश ने Leopard टैंक बनाए, अत्याधुनिक पनडुब्बियां बनाईं, जिसकी इंजीनियरिंग पूरी दुनिया में मशहूर है, उसी देश के नागरिक अपनी सेना की क्षमता पर सवाल उठा रहे हैं…. लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती।
जब उनसे पूछा गया कि क्या रक्षा बजट बढ़ाने के लिए टैक्स बढ़ाया जाए, तो 77 प्रतिशत लोगों ने मना कर दिया… सार्वजनिक सेवाओं में कटौती कर उसका पैसा सैन्य मद में खर्च किया जाए…तो 62 प्रतिशत ने इससे भी इनकार कर दिया…तो फिर क्या हो…सरकार ज्यादा कर्ज ले? 59 प्रतिशत इसके भी खिलाफ हैं।
यानी लोग मजबूत सेना भी चाहते हैं, मौजूदा स्थिति से डरे भी हैं…लेकिन उसकी कीमत चुकाने को तैयार नहीं हैं।
यही आज के जर्मनी का सबसे बड़ा विरोधाभास है।
दरअसल, रूस-यूक्रेन युद्ध ने पूरे यूरोप की सुरक्षा सोच बदल दी है… डोनाल्ड ट्रंप जिस तरह के तेवर दिखा रहे हैं, उससे यूरोप कम से कम इतना तो समझ ही चुका है कि आज नहीं तो कल उसे अपनी सुरक्षा की जिम्मेदारी खुद भी उठानी होगी…सिर्फ NATO के भरोसे नहीं बैठा जा सकता…
शायद इसीलिए जहां फ्रांस ख़ुद को यूरोप की न्यूक्लियर शील्ड के रूप में पेश कर रहा है तो वहीं जर्मनी यूरोप की सबसे बड़ी पारंपरिक सेना बनाने की तैयारी कर रहा है…
लेकिन एक समस्या है।
सेना केवल टैंक, मिसाइल और लड़ाकू विमान से नहीं बनती… सेना सैनिकों से बनती है…इसके लिए सेना को 1 लाख 83 हजार से बढ़ाकर 2 लाख 60 हजार सैनिकों तक ले जाया जाना है….जबकि रिजर्व फोर्स को भी 2 लाख तक बढ़ाने की योजना है….
लेकिन मज़े की बात ये है कि सैनिक मिल नहीं रहे….जर्मनी में सैन्य सेवा से छूट मांगने वाले युवाओं की संख्या लगातार बढ़ रही है। हजारों युवा Conscientious Objector यानी नैतिक या व्यक्तिगत आधार पर सैन्य सेवा से इनकार करने के लिए आवेदन कर रहे हैं… सरकार को मजबूर होकर सैन्य पंजीकरण प्रणाली दोबारा लागू करनी पड़ी है और अब अनिवार्य सैन्य सेवा की चर्चा भी फिर शुरू हो गई है… यानी सरकार युद्ध की तैयारी कर रही है, लेकिन समाज युद्ध के लिए तैयार नहीं दिखता। इसके पीछे केवल मानसिकता नहीं, आर्थिक कारण भी हैं…
रूस से सस्ती गैस बंद होने के बाद जर्मनी की ऊर्जा लागत बढ़ गई है… महंगाई बढ़ चुकी है…उद्योगों पर दबाव है…जीवन-यापन महंगा हुआ… ऐसे में आम नागरिक सरकार से पूछ रहा है कि पहले हम अपना घर, अपनी ज़ेब देखें कि आपके टैंक…. इसीलिए रक्षा खर्च बढ़ाने की राजनीतिक इच्छा और जनता की आर्थिक प्राथमिकताएं एक-दूसरे से टकरा रही हैं… और यह सिर्फ जर्मनी की कहानी नहीं है…पूरे यूरोप में यही सवाल खड़ा हो रहा है।
अगर अमेरिका पीछे हटता है, तो क्या यूरोप वास्तव में अपनी सुरक्षा खुद संभाल सकता है?
दूसरी ओर रूस लगातार कह रहा है कि तनाव उसकी नहीं बल्कि यूरोप के सैन्यीकरण की वजह से बढ़ रहा है। राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन का कहना है कि रूस किसी NATO सदस्य पर तब तक हमला नहीं करेगा, जब तक पहले उस पर हमला न किया जाए। लेकिन यूरोपीय सरकारें इस दावे पर भरोसा करने को तैयार नहीं हैं। उनके लिए रूस अब सबसे बड़ा सुरक्षा खतरा है… कहीं न कहीं जनता भी ये समझ रही है कि खतरा शायद मैन्युफैक्चर्ड है…हो न हो सरकारें उन्हें रूस का डर बेच रही हों, ताकि रक्षा खर्च को बढ़ाया जा सके…
फ़िलहाल पूरे यूरोप में ये स्थिति है…यानी एक तरफ खतरे की भावना है, दूसरी तरफ जनता का अविश्वास…
और शायद यही वजह है कि YouGov का यह सर्वे सिर्फ एक सर्वे नहीं है, बल्कि जर्मनी की राष्ट्रीय मनोदशा का आईना है…
क्योंकि सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि जर्मनी के पास कितने टैंक हैं या कितनी मिसाइलें हैं।
सवाल यह है कि क्या किसी देश की सेना वास्तव में मजबूत कही जा सकती है, अगर उसके अपने नागरिकों को ही उस पर भरोसा न हो?
और उससे भी बड़ा सवाल… क्या यूरोप एक नए सैन्य युग में प्रवेश कर रहा है, जबकि उसकी जनता अब भी शांति के युग में जीना चाहती है?
शायद आने वाले वर्षों में यही टकराव तय करेगा कि जर्मनी फिर से यूरोप की सैन्य महाशक्ति बनता है… या अपनी ही जनता की झिझक के सामने रुक जाता है।


































