मुजफ्फरनगर की फास्ट ट्रैक कोर्ट के जज रवि कुमार दिवाकर एक बार फिर चर्चा में हैं। जिला जज ने उनकी अदालत से करीब 100 मुकदमों को वापस लेकर दूसरी अदालतों में ट्रांसफर कर दिया है। इनमें हत्या और दूसरे गंभीर अपराधों से जुड़े मामले भी शामिल हैं।
एक साथ इतने मुकदमों के ट्रांसफर के बाद स्थानीय कचहरी से लेकर न्यायिक हलकों तक चर्चा तेज है। हालांकि, इस प्रशासनिक फैसले की वजह को लेकर अभी कोई विस्तृत आधिकारिक स्पष्टीकरण सार्वजनिक नहीं हुआ है।
रवि कुमार दिवाकर वही न्यायिक अधिकारी हैं, जो वाराणसी में सिविल जज (सीनियर डिवीजन) रहते हुए ज्ञानवापी परिसर के एडवोकेट कमिश्नर सर्वे का आदेश देने के बाद देशभर में चर्चा में आए थे।
करीब 100 मुकदमे दूसरी अदालतों में क्यों भेजे गए?
जिला जज के स्तर से हुए इस प्रशासनिक बदलाव के तहत फास्ट ट्रैक कोर्ट से करीब 100 मुकदमे दूसरी अदालतों को सौंपे गए हैं। इनमें कई गंभीर आपराधिक मामले और हत्या से जुड़े मुकदमे बताए जा रहे हैं। कुछ मामलों में सुनवाई चल रही थी, जबकि कुछ मुकदमे अंतिम बहस के चरण तक पहुंच चुके थे। अब इनकी पत्रावलियां संबंधित नई अदालतों में जाएंगी और आगे की कार्रवाई वहीं होगी।
फिलहाल यह साफ नहीं है कि इतने बड़े पैमाने पर मुकदमों को ट्रांसफर करने के पीछे खास वजह क्या है। अदालतों में केस लोड का संतुलन, प्रशासनिक जरूरत या न्यायिक कार्य के पुनर्गठन जैसे कारणों से भी मुकदमों का बंटवारा किया जाता है। लेकिन एक साथ करीब 100 केस वापस लिए जाने से यह मामला चर्चा में जरूर आ गया है।
5 महीने में 9 केस और 22 दोषियों को फांसी
जज रवि कुमार दिवाकर का मुजफ्फरनगर कार्यकाल अपने सख्त फैसलों के कारण भी सुर्खियों में रहा है। बताया गया है कि पिछले करीब 5 महीनों में उनकी अदालत ने 9 अलग-अलग मुकदमों में सुनवाई पूरी की और कुल 22 दोषियों को मृत्युदंड की सजा सुनाई।
हत्या और अन्य जघन्य अपराधों से जुड़े मामलों में तेजी से सुनवाई और कड़े फैसलों के चलते उनकी अदालत लगातार चर्चा में रही। हालांकि, किसी अदालत द्वारा सुनाई गई फांसी की सजा अंतिम नहीं मानी जाती। ऐसे मामलों में ऊपरी अदालतों में अपील और कानूनी प्रक्रिया आगे जारी रहती है।
सुरक्षा को लेकर DGP को क्यों लिखा पत्र?
मुकदमों के ट्रांसफर के बीच जज दिवाकर की सुरक्षा को लेकर भी सवाल उठे हैं। उन्होंने अपनी सुरक्षा व्यवस्था में किए गए बदलाव पर आपत्ति जताते हुए उत्तर प्रदेश के DGP को पत्र लिखा है। पत्र में उन्होंने अपनी सुरक्षा में लंबे समय से तैनात मुख्य गनर कांस्टेबल रविंद्र सिंह ठकुंरैला को हटाए जाने का मुद्दा उठाया है। उनका कहना है कि गनर को उनकी सहमति या पूर्व सूचना के बिना बदला गया।
जज दिवाकर ने पत्र में ज्ञानवापी मामले के दौरान मिली सुरक्षा का भी जिक्र किया है। उनके मुताबिक उस समय उन्हें और उनके परिवार को इलाहाबाद हाईकोर्ट और शासन के निर्देशों के तहत विशेष सुरक्षा उपलब्ध कराई गई थी। उनका सवाल है कि अगर सुरक्षा खतरे के आकलन के आधार पर तय की गई थी, तो स्थानीय स्तर पर बिना उनकी जानकारी के सुरक्षा व्यवस्था में बदलाव किस आधार पर किया गया।
केस ट्रांसफर होने के बाद क्या बदलेगा?
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि इन मुकदमों पर ट्रांसफर का क्या असर पड़ेगा। जिन मामलों में गवाही पूरी हो चुकी है, उनमें नई अदालत को रिकॉर्ड और पत्रावली का अध्ययन करना होगा। इससे प्रक्रिया में कुछ अतिरिक्त समय लग सकता है। हालांकि, पहले से रिकॉर्ड पर दर्ज गवाहियों और दस्तावेजी साक्ष्यों को सिर्फ अदालत बदलने की वजह से अपने आप खत्म नहीं माना जाता।
नई अदालत में मुकदमे की आगे की प्रक्रिया तय होगी। पक्षकारों और उनके वकीलों को नई अदालत में अगली तारीख की जानकारी दी जाएगी। इसके बाद सुनवाई आगे बढ़ेगी और संबंधित न्यायिक अधिकारी मामले में कानून के मुताबिक आदेश पारित करेंगे।
यानी करीब 100 मुकदमों का ट्रांसफर अपने आप में किसी फैसले को रद्द नहीं करता। इसका सीधा मतलब इतना है कि इन मामलों की आगे की सुनवाई अब दूसरी अदालतों में होगी।
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही
एक तरफ जज रवि कुमार दिवाकर की अदालत से करीब 100 मुकदमों का ट्रांसफर हुआ है, दूसरी तरफ उनकी सुरक्षा में बदलाव को लेकर DGP को लिखे पत्र ने मामले को और चर्चा में ला दिया है। हालांकि, दोनों घटनाओं के बीच कोई सीधा संबंध है, ऐसा कहने के लिए फिलहाल पर्याप्त आधिकारिक जानकारी सामने नहीं आई है। इसलिए मुकदमों के ट्रांसफर की वास्तविक वजह और सुरक्षा व्यवस्था में बदलाव का पूरा कारण संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों के स्पष्टीकरण के बाद ही साफ हो सकेगा।
































